वर्तमान राजनीति और नोटबंदी का कड़वा सच

श्याम सुन्दर मिश्र
राजनीति को जनसेवा का सशक्त माध्यम बताने वालों की भीड़ ज्यों-ज्यों बढ़ रही है भ्रष्टाचार एवं व्यभिचार भी उसी अनुपात में बढ़ रहा है। जब कि होना ये चाहिये कि जनसेवकों की बाढ़ से जन समस्याओं में कमी आनी चाहिये। पर ऐसा नहीं हो रहा क्योंकि इक्के दुक्के राजनेता ही सेवाभाव से राजनीति में कूदते हैं किन्तु वे भी काजल की कोठरी में प्रवेश करते ही उसी रंग में रँग जाते हैं। गुलजारी लाल नंदा, लालबहादुर शास्त्री और नरेन्द्र दामोदर दास मोदी इसके अपवाद हो सकते हैं किन्तु श्री नंदा भ्रष्टाचार मिटाते-मिटाते स्वयं मिट गये, लालबहादुर शास्त्री को न केवल जीता हुआ भू-भाग छोडऩा पड़ा बल्कि राजनैतिक षडय़ंत्र के तहत जान भी गँवानी पड़ी। और श्री मोदी स्वयं भ्रष्टïाचारियों एवं सत्ता की महत्वाकाँक्षा पाले हुवे राजनेताओं से घिरे हैं। अन्यथा कालेधन कोबाहर लाने हेतु नोटबंदी की अचानक घोषणा ब्रह्मïास्त्र से कम नहीं थी। काबिल आर.बी.आई. गवर्नर रघुराम राजन या तो नोटबंदी के पक्ष में नहीं थे अथवा देश में व्याप्त भयंकर भ्रष्टïाचार के चलते वर्तमान दौर में इसके विरुद्घ थे। बस यही बात मोदी के चाटुकारों को खल गई और षडय़ंत्र के तहत उन्हें हटने को मजबूर किया गया। अन्यथा वे दूसरी पारी में ऐसा कुछ कर सकते थे जिससे श्री मोदी की मंशा भी पूरी हो जाती और झेली गई त्रासदी से भी मुक्ति मिल जाती। च्च् अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकताज्ज् वाली कहावत को दरकिनार करते हुवे श्री मोदी ने भाजपा के भ्रष्टï घटकों को किनारे कर न केवल गुजरात में मुख्य मंत्री की कुर्सी हासिल की बल्कि देश के प्रधानमंत्री बनकर राजनैतिक क्षितिज में नया इतिहास रचा। भाजपा ही नहीं रघुराम राजन को हटाने में उन्हीं तत्वों की महत्वपूर्ण भूमिका रही मोदी की लोकप्रियता और कठोर निर्णय की मानसिकता से भयभीत उनके यही घटक आस्तीन में साँप की तरह छिपे हुवे हैं और गलत समय पर नोट बंदी की वकालत करके अपने मकसद में काफी हद तक कामयाब हो गये। उर्जित पटेल इन्ही तत्वों के सशक्त मोहरा बने। इनका सपोर्ट और गवर्नर की कुर्सी के मोह ने उर्जित पटेल का विवेक हर लिया अथवा वे दबाव में थे ये ता ेवे ही जानते होंगे किन्तु चतुर्दिक व्याप्त भ्रष्टïाचार के दौर में नोट बंदी आत्मघाती कदम था इसे अच्छी तरह जानते होंगे। इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है कि स्वयं आर.बी.आई. में भी इस योजना की हवा निकालने वाले पकड़े गये। देश का शाायद ही कोई बैंक ऐसा रहा हो जो कमीशन खोरी अथवा गबन के आरोप से मुक्त हो। तनखाहें बढ़ाने एवं सुविधायें देने से मानसिकता बदल जाती है ये फलसफा पुराना हो चुका है। अब हालात ऐसे हो चले हैं कि जितनी ही सुविधायें उतनी ही ऐयाशी। नेताओं अद्योगपतियों एवं व्यापारियों का बैंको से चोलीदामन का साथ रहता है। वे जानते हैं कि सरकारें तो आती जाती रहती हैं पर इनसे संबंध बिगाडऩा घाटे का सौदा है। अत: बैंक कर्मियों ने भी बहती गंगा में जी भर कर हाथ धोया। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है आर.बी.आई. द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट जिसमें घोषित किया गया है कि प्रतिबंधित नोटों में से 99.3 प्रतिशत नोट बैंको में वापस लिये गये। शेष नेपाल एवं भूटान के बैंकों द्वारा बदले जाने के कयास लगाये जा रहे है। डिटेल आने पर इसका भी खुलासा हो जायेगा। पर ये बात दावे के साथ कही जा सकती है कि मोदी के ब्रह्मïास्त्र को उन्हीं के सहयोगियों एवं सिस्टम ने नष्टï कर डाला। उसके बाद से व्यापारिक जगत में जो उदासी छाई है वो टलने का नाम ही नहीं ले रही।
बैंकों एवं सरकारी संस्थानों का डिजिटलीकरण अच्छीबात है इससे काम में तेजी एवं पारदर्शिता की उम्मीद की जाती है। कई मायनों में ये सुरक्षा की दृष्टिï से भी मुफीद है। किन्तु इस हेतु पूर्णत: ट्रेंड लोगों की नियुक्ति के बजाय अधिकतर पुराने लोगों को ही कामचलाऊ ट्रेनिंग के बाद काम पर लगा दिया गया। भ्रष्टïाचार के चलते उपकरण भी सामान्य श्रेणी के ही खरीदे गये। कई जगहों पर सौभाग्य से उच्चकोटि के उपकरण लगे भी तो बिजली फेेल, सरवर डाउन एवं आपरेशन तकनीक के अभाव में उपभोक्ताओं को लम्बी-लम्बी लाइनों में घंटों लगना पड़ रहा है। ऐसे समय में मैनुअल सिस्टम से काम लिया जाय तो काफी राहत हो सकती है किन्तु नियम का हवाला देकर ऐसा नहीं किया जाता। कामचोर कर्मचारियों के लिये तो ऐसे अवसर वरदान से कम नहीं हैं क्योंकि चाय-नाश्ते, आपसी गपबाजी अथवा मोबाइल पर चिट-चैट करने का मौका उन्हें अनायास ही मिल जाता है। अत: कई बार सही उपकरण को खराब बतलाकर कुछ लोगों से ऊपरी कमायी भी कर ली जाती है। जो सुविधा शुल्क के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुकी है। इस अर्थ प्रधान युग में बिना अर्थ का व्यय किये सुविधायें प्राप्त करना इंसानियत के विरुद्घ ही तो है। सीधा सा फंडा है कि जब तरह-तरह के टैक्सों से भी सरकारी योजनायें परवान नहीं चढ़ती तो सेवा शुल्क लगाने की प्रथा अस्तित्व में आयी। जो दिन-प्रतिदिन विस्तार पा रही है। फिर सुविधा शुल्क को अपराध की श्रेणी में कैसे गिना जा सकता है? अत: जिसे भी अवसर मिला खूब कमाई की। विदेशों से कालाधन तो न आ सका पर लगभग सारा काला धन सफेद हो गया। अत: इस आरोप को नकारा नहीं जा सकता कि नोटबंदी से थोड़ी बहुत परेशानी के बाद कालाधन सफेद हो गया और जमाखोरों को सर पर लटकती तलवार से मुक्ति मिल गई। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो नोटबंदी भ्रष्टïाचारियों के लिये तोहफा बन गई और इससे लाभान्वित लोग केंद्र सरकार के बिना मोल के गुलाम हो गये। आम जनता की बात करें तो वो इसी मुगालते में है कि कालाधन निकालने के लिये नोटबंदी से अच्छा विकल्प हो ही नहीं सकता था। किन्तु दुर्भाग्यवश सफलता नहीं मिली। इस प्रकार सत्ता के दोनों हाथ लड्डुओं से भर गये। विपक्षियों के चिल्लाने का जनता पर विशेष असर इसलिये नहीं पड़ा कि सत्ता में रहने के दौरान उन्होंने भी जी भर कर लूटा था। आम जनता इसलिये मजबूर है कि उन्हें साँपनाथ और नागनाथ दोनों में से किसी एक को चुनना ही है। फिर नागराज के बजाय साधारण साँप को ही क्यों न चुने? ताकि खतरा कम रहे। सादगी, सरलता और ईमानदारी वर्तमान राजनीति में घोर मूर्खता और शासकीय मानसिकता के सर्वथा विपरीत है। लम्बे समय तक गुलामी का दंश झेलने वाली आम जनता अभी भी ये मानती है कि शासन व सत्ता सँभालने का माद्दा शक्तिशालियों में ही होता है। रही-सही कसर स्वार्थपरता और चारित्रिक शिक्षा के अभाव ने पूरी कर दी। सिर्फ जी.डी.पी. और सरकारी आँकड़ों की ग्रोथ का ढिंढोरा पीटकर भारत को आर्थिक महाशक्तियों में शामिल करने का स्वप्न देखना खूबसूरत धोखा है। सत्य बिना प्रचार के ही विस्तार पाता है और असत्य काठ की हाँडी के समान है जिसका जलना तय है।

 

श्याम सुन्दर मिश्र
वरिष्ठ लेखक एवं समाज सेवी
मो0- 8005107299
=>
loading...
WP Twitter Auto Publish Powered By : XYZScripts.com
E-Paper