धारा 377 समाप्त होना यानि अप्राकृतिक यौन संबंध की छूट, समाज के लिए दीमक का आरम्भ…!

एसएन लाल

धारा 377 समाप्त होने पर देश में इतनी खुशी देखी गयी कि शायद किसी और न्याय के फैसले पर दिखी हो, जबकि इसके पक्षधर देश में मात्र 7 से 8 प्रतिशत लोग होंगे। अब मीडिया द्वारा खुशी को बढ़ाकर व्यापार बनाने की होड़ है या ….! इस धारा के समाप्त होने पर कौन सा देश का विकास हो जायेगा, और कौन क्या कर लेगा, ये समझ के परे है ? बल्कि कही विकास रुकेगा ही…! कोई धर्म समलैंगिकता पक्ष में नही है, समलैंगिकता पक्ष करने वाले किस धर्म के है ये भी प्रश्न है..! अब जब आप विरोध में आवाज़ उठायेंगे, तो उधर से एकता – यूनीटी की आवाज़ उठेगी…साथ-साथ अपनी आज़ादी की! अब देखना ये है कि समलैंगिकता कितनी सही है…, ऐसी एकता तो वैश्यालयो, शराबखानों व जुआखानों पर भी नज़र आती है और वह भी आज़ादी चाहते है…, वह भी मिल बैठकर काम करते है किसी से ज़बरदस्ती तो नहीं करते।

ये प्रकृतिक की देन है…इसको रोकना मुश्किल होता है उस दौर में। बात बहुत सच लेकिन लोग स्वीकारेंगे नही…,समलैंगिकता के दौर से लगभग 75 प्रतिशत लोग गुज़रते है, बचपन में व लड़कपन में… मै यहां जगहों के नाम नहीं लूंगा क्योंकि सब लाठी लेकर चढ़ बैठेगे। लेकिन ये अपनी मर्ज़ी से समलैंगिकता के दौर से गुज़रने वाले 75 प्रतिशत लोग जब समझदार और बड़े हो जाते है, तो उसको बुरे सपने की तरह भूल जाते हैं। इन्ही 75 प्रतिशत लोगो में से कुछ लोग कभी बड़े नहीं होते और उन छोटे लोगो के साथ मिलकर अपनी आयु को छुपाकर मज़ा (?) लेते है।

ब्रिटेन में 25 अक्टूबर, 1800 को जन्मे लॉर्ड मैकाले एक राजनीतिज्ञ और इतिहासकार थे, मै समझता हूॅं समाज को समझते होंगे अच्छी तरह से। वह 1834 में गवर्नर-जनरल के एक्जीक्यूटिव काउंसिल के पहले कानूनी सदस्य नियुक्त होकर भारत आए। भारत में वह सुप्रीम काउंसिल में लॉ मेंबर और लॉ कमिशन के हेड बने। इस दौरान उन्होंने 1861 में इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) ड्राफ्ट करते वक्त धारा-377 में समलैंगिक संबंधों को अपराध की कैटेगरी में डाला गया। जिसके अनुसार आपसी सहमति के बावजूद दो पुरुषों या दो महिलाओं के बीच सेक्स, पुरुष या महिला का आपसी सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध, पुरुष या महिला का जानवरों के साथ सेक्स या फिर किसी भी प्रकार की अप्राकृतिक हरकतों को इस र्श्रेि में रखा गया है, इसमें सज़ा बहुत सख़्त रख दी गयी।

1990 में बनी एक लन्दन की संस्था भारत में जो एच.आई.वी./एड्स पर काम कर रही थी, जिसको भारत सरकार ने उसके कार्य पर सम्मनित भी किया, वह धीरे-धीर समलैंगिक पर ज़ोर देने लगी, क्योंकि उसे भी बाज़ार चाहिए था, जबतक एच.आई.वी./एड्स लोगों में फैलेगा नहीं तो पैसा कहां से आयेगा, इसी रोग के नाम पर तो पैसा आता है, इस संस्था के पास। इससे सम्बन्धित अधिकारी करोड़ो में खेलते है और बेवकूफ नौजवान समलैंगिकता का मज़ा (?) लेकर खुश है और अपना जीवन नर्क बना रहें है।

मुस्लिम धर्म के अनुसार एक पैग़म्बर हज़रत लूत गुज़रे है जिनका ज़िक्र कुरान मजीद (पारा 11 सूरा हूद रूकू 7 आयत 77) में और बाइबिल में भी आया है। इन्होंने समलैंगिकता जैसे अपराध के लिए कौम को समझाया, जब कौम नहीं मानी तो अल्लाह (भगवान) से दुआ की और ऐसी पूरी कौम प्रकृतिक मार से समाप्त हो गयी। ऐसी घटनायें और भी धर्मो में अंकित होगी। अब ऐसे पैदा होने वाली क़ैम नौजवान नस्लों और देश को बरबाद करेंगी।

आईपीसी की धारा 377 के तहत अप्रकृतिक संबंध बनाने के मामले में पिछले करीब 150 सालों में सिर्फ 200 लोगों को ही दोषी करार दिया गया है। 150 वर्षो में सिर्फ 200 लोग, अप्रकृतिक संबंध बनाने वालों को प्रतिशत तो 75 रहा है लेकिन…! यानि लोग जानते है, ये ग़ल्त है अपराध है… सेक्स शरीर की आवश्कता है ग़ल्ती से हो गया, तो उसके लिए लोग अपनी से स्वयं माफी मांग लेते, और बुरा सपना समझकर भूल जाते। लेकिन समाज में अपनी हरकतों को छुपाते हैं, प्रचार नहीं करते… क्योंकि ग़ल्त ग़ल्त ही है। इस फैसले के बाद तो समलैंगिकता पक्षधर हर जगह नज़र आने लगेंगे और बाक़ी लोगों के लिए प्रश्न खड़ा हो जायेगा।

=>
loading...
WP Twitter Auto Publish Powered By : XYZScripts.com
E-Paper