राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बने बढ़ते पेट्रोल-डीजल की कीमतें

शकील सिद्दीकी

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की परेशानी बढ़ा दी है। आने वाले दिनों में आम आदमी पर मंहगाई का बोझ बढ़ेगा ये तय है। लेकिन पेट्रोल डीजल की कीमतों को लेकर जिस तरह की सियासत हो रही है, उससे न तो कीमतें कम होंगी और न ही आम आदमी को कोई राहत पहुंचेगी। उलटा भारत बंद के नाम पर देश के खजाने को चूना और आम आदमी को परेशानी जरूरत हुई। अगर बंद करने से कीमतों का समाधान होना होता तो यह देश काफी समय पहले ही तमाम चीजोें पर काबू पा लेता। बीते 10 सितंबर को जिस कांग्रेस के नेतृत्व में ‘भारत बंद’ का आह्वान किया गया है और उसके 18 सहयोगी दलों ने भी समर्थन किया है, उसके बाद पेट्रोल-डीजल एक पैसा भी सस्ते नहीं हुए, उल्टा बढ़ोत्तरी जरूर हुई है। यह भी नहीं है कि कांग्रेस नेतृत्व की केंद्र सरकार के दौरान पेट्रोलियम पदार्थ महंगे नहीं हुए। आज दाम 80-90 रुपए के बीच हैं, तो तब भी 70 रुपए के करीब रहे। बल्कि एक दौर में तो पेट्रोल 83 रुपए लीटर तक बिका।

दरअसल बंद विरोध प्रदर्शन के बजाय शक्ति प्रदर्शन ज्यादा है। कांग्रेस इस ‘भारत बंद’ के जरिए अपनी राजनीतिक ताकत दिखाना चाहती थी और विपक्ष की गोलबंदी भी साफ करना चाहती थी, लेकिन दरारें स्पष्ट रहीं। जमीन पर साथ और सहयोग में गहरे फासले सामने आए। बंद के दौरान जो हिंसात्मक घटनाएं प्रकाश में आई वो शर्मनाक हैं। वास्तव में पेट्रोल की कीमत का 25 फीसदी केंद्र सरकार और 21 फीसदी राज्य सरकारें टैक्स लगाती रही हैं। डीजल पर केंद्र 22 फीसदी कर वसूलता है। पेट्रोल-डीजल के दाम तय करने का अधिकार यूपीए सरकार के दौरान तेल कंपनियों को ही दिया गया था।

केंद्र सरकार का इतना ही दखल है कि वह कंपनियों से अनुरोध ही कर सकती है कि दामों पर पुनर्विचार किया जाए। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कच्चे तेल के दाम हमारे रोजाना के दामों को प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित नहीं करते, क्योंकि उनमें वैट, उत्पाद कर, बेसिक और एडीशनल कस्टम ड्यूटी, स्पेशल सेनवेट ड्यूटी और प्रदूषण अधिभार आदि शामिल किए जाते हैं। वित्त मंत्री अरुण जेतली ने एक्साइज टैक्स कम करने से इनकार किया है। उनका सवाल है कि फिर विकास कार्य और विभिन्न लाभ कैसे दिए जा सकते हैं? बहरहाल ये दाम बढ़ने का एक अर्थशास्त्र यह भी है कि हमारे वित्तीय और चालू खाते के घाटे बेहद बढ़ गए हैं, लिहाजा सरकार घाटों की पूर्ति के लिए पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने के पक्ष में है। बीती 16 अगस्त से ये दाम रोजाना बढ़े हैं या स्थिर रहे हैं, लेकिन घटे नहीं हैं। 2018 में ही अभी तक पेट्रोल 15 फीसदी महंगा हो चुका है। कच्चे तेल की कीमतें भी करीब 125 फीसदी बढ़ी हैं।

बहरहाल तेल की कीमतों का मुद्दा एक अर्थशास्त्रीय सवाल है। 2017-18 में सरकार को पेट्रोल से ही 5.53 लाख करोड़ रुपए की कमाई हुई, जबकि 2013-14 में यूपीए सरकार के दौरान 3.32 लाख करोड़ रुपए की कमाई की गई। यूपीए सरकार के 10 सालों में पेट्रोल करीब 112 फीसदी और डीजल करीब 160 फीसदी महंगे हुए, जबकि मोदी सरकार के साढ़े चार साल के दौरान करीब 14 फीसदी ही महंगे हुए हैं। सरकारें इस मुनाफे को कैसे छोड़ सकती हैं। सरकार कोई भी हो, लेकिन आम आदमी की नियति यही रहना तय है।

अहम सवाल यह भी है कि देश में हिंसात्मक आग लगाने के बाद क्या अब तेल की कीमतें घटेंगी? बंद, बवाल, विरोध और अमानवीय प्रदर्शनों के बाद क्या अब पेट्रोल-डीजल सस्ते होंगे? ऐसा बिलकुल नहीं होगा, क्योंकि मोदी सरकार ने इनकार कर दिया है, बल्कि अपनी असमर्थता जता दी है। दरअसल पेट्रोल-डीजल की अर्थव्यवस्था क्या है और केंद्र-राज्यों के राजस्व में उनकी कितनी हिस्सेदारी है, यह हम अपने पिछले संपादकीय में विस्तार से स्पष्ट कर चुके हैं। इसे विडंबना या विवशता ही मानेंगे कि सरकार को तेल की कीमतें बढ़ानी पड़ती हैं और विपक्ष को आंदोलन करना पड़ता है। विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने भी यह भूमिका खूब निभाई है, लेकिन ‘भारत बंद’ का मतलब गुंडागर्दी और हिंसक होना नहीं है। हिंसक तत्त्वों के हाथों में कांग्रेस, राजद, पप्पू यादव की पार्टी, राज ठाकरे की एमएनएस पार्टी और कहीं-कहीं बसपा के झंडे दिखाई दे रहे थे। फिर आरएसएस और भाजपा के कार्यकर्ताओं ने हिंसा कैसे की? दरअसल संघ-भाजपा को हरेक हिंसा के एवज में कोसना एक फैशन बन गया है।

दूसरी तरफ सरकार की तरफ से सफाई दी गई कि मूल्य वृद्धि चूंकि अंतर्राष्ट्रीय कारणों से हो रही है अतरू वह उसे रोक पाने में पूरी तरह लाचार है। उसका ये तर्क गलत नहीं है क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में आ रहा उछाल अमेरिका द्वारा चलाए जा रहे ट्रेड वार के कारण हो रहा है जिसके पीछे ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध भी हैं जिसने भारत को मिल रहे सस्ते कच्चे तेल का रास्ता रोक दिया। इस पूरे खेल में केन्द्र सरकार की इस मजबूरी को स्वीकार कर भी लें कि यदि पेट्रोल-डीजल पर एक्साईज व अन्य कर घटाए जाते हैं तब उसके राजस्व में कमी आयेगी जिसका असर सीधे विकास कार्यों पर पड़ेगा लेकिन जैसी जानकारी आ रही है उसके अनुसार तो कच्चे तेल की कीमतें बढने से आम जनता की जेब भले ही हल्की होती हो परन्तु केन्द्र और राज्य दोनों का खजाना भरता है क्योंकि इन वस्तुओं पर लगने वाले करों की राशि बिना कुछ किए बढ़ती जाती है।

अधिकृत तौर पर प्राप्त आंकड़ों ने भी ये बात स्पष्ट कर दी है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि से केन्द्र और राज्यों का भंडार लबालब हो गया है। ऐसे में जब केन्द्र सरकार कर घटाने पर अपनी कमाई कम होने का तर्क देती है तब वह ये तथ्य छिपा लेेती है कि पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले कर प्रति लिटर के हिसाब से न होकर प्रतिशत के आधार पर हैं। इसलिए जब दाम बढ़ते हैं तब उसी अनुपात में कर की राशि भी बढ़ जाती है। वहीं यदि केन्द्र व राज्य ये तय कर दें कि एक्साईज तथा वैट आदि की राशि प्रति लिटर निश्चित रहेगी तब उपभोक्ता दोहरी मार से बच जायेगा। इस दृष्टि से देखें तो विकास कार्य रुक जाने का बहाना गले नहीं उतरता लेकिन सरकार चाहे केन्द्र की हो या राज्यों की, दोनों अपना आर्थिक प्रबंधन सुधारने की बजाय आम जनता को निचोडने पर आमादा हैं।

‘भारत बंद’ से पेट्रोल-डीजल के दामों पर रत्ती भर भी फर्क नहीं पडा, बल्कि देश के विकास, व्यापार, जीवन की रवानगी जरूर प्रभावित हुआ। ‘भारत बंद’ ही एकमात्र लोकतांत्रिक तरीका नहीं है। यह पूरी तरह से राजनीति है और ऐसे आह्वानों से शायद वोट भी ज्यादा हासिल न हों! पेट्रोल-डीजल न तो केंद्र और न ही राज्य सरकारों के विषय हैं। अलबत्ता उन पर टैक्स राज्य सरकारें अपनी नीति और राजस्व के हिसाब से लगाती रही हैं। राज्यों का करीब 50 फीसदी राजस्व पेट्रो पदार्थों पर लगाए करों से ही प्राप्त होता है। यदि इसे ही समाप्तप्रायः कर दिया जाए, तो राज्य सरकारें कंगाल हो जाएंगी। सामाजिक, कल्याण, विकास कार्य ठप हो जाएंगे, लेकिन मनोहर परिकर के मुख्यमंत्रित्व में ही पिछली गोवा सरकार ने करों को कम करने का उदाहरण भी पेश किया था।

इन तमाम बिंदुओं के मद्देनजर कहा जा सकता है कि ‘भारत बंद’ कोई समाधान नहीं है। जनता सड़कों पर बिछा दी जाएगी, तो उससे क्या होगा? बेहतर यह होगा कि विभिन्न विपक्षी दलों को जिला और राज्य स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक बहस का आगाज करना चाहिए। और फिर वह बहस मीडिया में जाए। यदि कांग्रेस पेट्रोल-डीजल के दाम कम करने के ठोस सुझाव देती है और मोदी सरकार अपने फैसलों पर अड़ी रहती है, तो फिर अनशन किए जाएं, विरोध-प्रदर्शन किए जाएं। यह ऐसा मुद्दा है, जिससे आम आदमी भी सीधा प्रभावित है। वह ऐसी बहस को गंभीरता से ग्रहण करेगा और अपने चुनावी फैसले भी ले सकता है। रुपये की विनिमय दर में निरंतर गिरावट तथा पेट्रोल-डीजल की अनियंत्रित होती कीमतों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कारण निरूसंदेह जिम्मेदार हैं परन्तु जिस तरह प्राकृतिक आपदाएं रोकना अपने बस में नहीं होने पर भी सरकार प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने के हरसंभव प्रयास करती है ठीक वैसे ही आर्थिक विपदाओं के समय भी कोई आपदा प्रबंधन तो होना ही चाहिए। यदि है तो वह कहीं नजर नहीं आ रहा और नहीं है तो क्यों नहीं, इसका उत्तर देश मांग रहा है।

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