बालिका गृहों में नारकीय जीवन जीने को मजबूर किशोरियां

राजेश माहेश्वरी

बिहार के मुजफ्फरपुर में बालिका गृह में किशोरियों के साथ लंबे समय तक बलात्कार और गर्भपात कराने की खबर से पूरा देश सन्न रह गया। मुजफ्फरपुर बालिका गृह की घटना के बाद अब नया मामला उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद में बालिका गृह में अनैतिक कार्यों के तौर पर प्रकाश में आया है। इस मामले को लेकर पूर्वांचल के देवरिया से राजधानी लखनऊ तक हडकंप मचा हुआ है। जो खबरें देवरिया बालिक गृह से छनकर बाहर आ रही हैं वो रोंगटे खड़े कर देती हैं। यूपी सरकार ने प्रदेश के समस्त जिलाधिकारियों से बालिका संरक्षण गृहों की रपट तलब की है। वास्तव में मुजफ्फरपुर और देवरिया में बालिका गृह में छोटी बच्चियों से दुष्कर्म की घटनाएं समाज की संवेदनहीनता और चारित्रिक पतन की हद है। उस पर राजनीति करना तो संवेदनहीनता और नैतिक पतन की पराकाष्ठा ही हैं।

बालिका गृह में बच्चियां अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए लायी जाती हैं, पर जहां उनका वर्तमान ही सुरक्षित नहीं हो, वहां भविष्य कैसा होगा? ऊपर से सूचना क्रांति के इस युग में इस मामले के सामने नहीं आने से इसमें बड़े-बड़े लोगों की संलिप्तता का संदेह तो पैदा होता ही है। बिहार के मुजफ्फरपुर का मामला अब सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है और सीबीआइ इस मामले की जांच कर रही है। इसी बीच बिहार के गोपालगंज के एक बालिका गृह से दो बच्चियों के पिछले कुछ महीनों से गायब होने की खबर भी प्रकाश में आयी थी। उस बालिका गृह के प्रशासक ने रपट दर्ज करवाने के अलावा कुछ भी खास नहीं किया। फिर मुजफ्फरपुर बालिका गृह के पीछे स्थित स्वाधार केंद्र से 11 महिलाओं के गायब होने की खबर आयी। जांच में कई आपत्तिजनक सामान भी मिले हैं।

किशोरियों से बलात्कार के अपराध में दोषियों को मृत्युदंड देने संबंधी केन्द्रीय कानून अभी लोकसभा से पारित हुआ है। कठुआ में आठ साल की बच्ची और इसी दौरान उ.प्र. के उन्नाव में एक महिला से बलात्कार की घटना के बाद एक अध्यादेश जारी किया गया था। अब सरकार ने लोकसभा में अपराध कानून (संशोधन) विधेयक पारित किया है जो इस अध्यादेश का स्थान लेगा। इस कानून में 12 साल की आयु तक की बच्चियों से बलात्कार के अपराध में कम से कम 20 साल की कैद और इस आयु वर्ग की बच्चियों से सामूहिक बलात्कार के अपराध में जीवन पर्यंत कैद या मृत्युदंड का प्रावधान किया गया है। इसी तरह से 16 साल से कम आयु की किशोरी से बलात्कार के जुर्म में कम से कम दस साल की सजा का प्रावधान है, जिसकी अवधि 20 साल अथवा उसे बढ़ाकर जीवनपर्यंत कैद की जा सकती है। इसी बीच बिहार के मुजफ्फरपुर में बालिका गृह में किशोरियों के साथ लंबे समय तक बलात्कार और उनका गर्भपात कराने का मामला चर्चा में आ गया है। निर्भया कांड के बाद कठोरतम सजा देने के प्रावधान के बावजूद आज तक ऐसे जघन्य अपराधों की संख्या में कमी नहीं आई है।

मध्य प्रदेश के बाद राजस्थान और हरियाणा में बच्चियों और 12 साल तक की किशोरियों से बलात्कार के अपराध में मौत की सजा का प्रावधान करने के बाद केन्द्र सरकार ने भी इस तरह के अपराध के लिए मृत्युदंड संबंधी एक अध्यादेश अप्रैल में जारी किया था। इसके बावजूद विकृत मानसिकता वाले आपराधिक तत्वों पर इसका कोई असर नजर नहीं आया बल्कि यौन हिंसा की शिकार बच्चियों की हत्याओं का सिलसिला बढ़ गया है। पिछले दो-तीन साल के दौरान बच्चियों और किशोरियों के यौन शोषण और उनके साथ सामूहिक बलात्कार की घटनाओं में जिस तरह से वृद्धि हुई है, उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि ऐसे आरोपियों पर त्वरित मुकदमा चलाने और उन्हें सजा देने की जरूरत है।

सरकार के तमाम प्रयासों और जागरूकता कार्यक्रमों के बावजूद बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा धीरे-धीरे शर्मिंदगी का कारण बनता जा रहा है। आंकड़ों के मुताबिक 2014 से बच्चियों से बलात्कार और यौन हिंसा के अपराध निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने हालांकि अभी तक 2017 के आंकड़े जारी नहीं किये हैं लेकिन 2018 में ऐसे अपराधों में तेजी से हो रही वृद्धि बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही है।

वर्ष 2018 के पहले छह महीनों में कठुआ, जींद, पानीपत, सूरत तथा राजस्थान के झालावाड़ जिलों में बच्चियों के साथ बेहद घृणित और बर्बर तरीके से हुए अपराध किसी भी सभ्य समाज को शर्मिंदा करने के लिये पर्याप्त हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार बच्चियों से अपराध की घटनाओं में 2016 में जबरदस्त वृद्धि हुई। इस दौरान यौन अपराध से बच्चों का संरक्षण कानून (पोक्सो) के तहत 19765 मामले दर्ज किये गये जबकि 2015 में इस अवधि में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और पोक्सो कानून के अंतर्गत 10,854 बलात्कार के मामले दर्ज हुए थे। बच्चियों से बलात्कार और यौन हिंसा के मामले में मध्य प्रदेश सबसे आगे है जबकि इसके बाद उत्तर प्रदेश, ओडिशा और तमिलनाडु का स्थान रहा है। आंकड़ों के अनुसार देश में प्रति आठ मिनट पर एक बच्ची गुम होती और हर घंटे दो बच्चे दुष्कर्म के शिकार होते हैं। इसी तरह हर घंटे करीब आठ बच्चे अपनी मां के आंचल से बिछुड़ जाते हैं। ये बच्चे मानव तस्करी के शिकार होते हैं। इन घटनाओं को रोकने के लिए कानून के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता भी जरूरी है। सरकार को इस दिशा में कदम उठाना चाहिए।

मुजफ्फरपुर बालिका गृह की घटना समाज को आइना दिखाती है। इससे पता चलता हैं कि स्त्रियों को भोग-विलास की वस्तु से ज्यादा तवज्जो नहीं दिया जा रहा है। समाज में महिलाओं के प्रति हिंसा पहले ही बहुत है। बिहार के अलावा देशभर के बालिका गृहों की भी जांच होनी चाहिए। इसके साथ ही सभी बालिका गृहों की ईमानदार मॉनीटरिंग जरूरी हो गयी है।

सरकार को तुरंत इस संदर्भ में निर्णय लेकर इस सिलसिले पर विराम लगाना चाहिए। बेहतर जिंदगी की उम्मीद में इस बालिका गृह में पहुंची बेसहारा लड़कियों के साथ किया गया घृणित व्यवहार जितना शर्मनाक है, उतने ही गंभीर सवाल इससे पैदा हो रहे हैं। सरकार, प्रशासन, एनजीओ, समाज और मीडिया, सभी कटघरे में हैं। अंतिम उम्मीद केवल न्यायपालिका है।

इन तमाम नकारात्मक खबरों के बीच, थोड़ा संतोष देने वाली खबर मध्य प्रदेश से मिली है जहां ग्वालियर और कटरी की त्वरित अदालतों ने आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल होने के मात्र 36 और 46 दिन के भीतर ही सुनवाई पूरी की और इन सभी को मौत की सजा सुनाई। इतनी तेेजी से सुनवाई पूरी होने में निश्चित ही पुलिस की तत्परता से जांच पूरी करने का भी योगदान रहा है। अगर पुलिस इतनी संवेदनशीलता से बच्चों और किशोरियों के साथ होने वाले यौन अपराधों की जांच करने लगे तो निश्चित ही ऐसे अपराधों में कमी आ सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना पर स्वतः संज्ञान लिया है। कोर्ट ने मीडिया की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े किये हैं। उसे कहना पड़ा है कि मीडिया बालिका गृह की पीड़िताओं के इंटरव्यू और उनकी तस्वीरें न दिखाये-छापे। यह एक बड़ा मुद्दा है। मीडिया को इस पर आत्ममंथन करना चाहिए कि कोर्ट को ऐसा क्यों कहना पड़ा? तमाम बातों के बावजूद यह भी सही है कि इस घटना पर राजनीति हो रही है, जो नहीं होनी चाहिए।

जरूरत है कि ऐसी व्यवस्था का कोई मार्ग निकले, जिससे भविष्य में ऐसी घटना न हो। शारीरिक शोषण से पीड़िता शायद उबर भी जाएं (हालांकि यह भी उनके लिए बहुत आसान नहीं होगा), पर भावनात्मक आघात तो जिंदगी भर भुगतना उसकी मजबूरी होगी। ऐसे मामलों में समाज को पूरी ताकत के साथ आगे आना ही होगा। तभी ऐसे तत्वों और उन्हें संरक्षण देने वालों पर दबाव बन सकेगा। साथ ही, हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हाल ही में संसद में पास हुए बिल से, जो बाल शोषण के मामलों की फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई की वकालत करता हैं, कोई हल निकल सकेगा।

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