ममता बनर्जी की विपक्षी एकता की कोशिशों का कितना असर होगा

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार 2019 आम चुनाव के लिए नरेन्द्र मोदी और भाजपा विरोधी विपक्षी गठबंधन की कवायदें कर रहीं हैं। अभी हाल में उनका दो दिवसीय दिल्ली प्रवास हुआ। इसमें उन्होंने लगभग सारे विपक्षी दलों के नेताओं से तो मुलाकात की ही, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शिवसेना और भाजपा के भी कुछ असंतुष्ट माने जाने वाले नेताओं से बातचीत की।

पिछले मार्च में भी उनका ऐसा ही राजनीतिक दौरा हुआ था। उस समय भी उन्होंने ज्यादातर विरोधी दलों के नेताओं से मिलकर एक महागठबंधन पर चर्चा की थी। हालांकि तब कांग्रेस उनकी सूची में सबसे बाद में आया और उन्होंने सोनिया गांधी से मुलाकात की।

उन्होनें बयान दिया कि भाजपा एवं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के खिलाफ हर जगह विपक्ष का एक उम्मीदवार उतारा जाए। इस बार वो एक कार्यक्रम लेकर आईं थीं। विपक्ष को एकजुट करने के नाम पर उन्होंने 19 जनवरी 2019 को कोलकाता में एक रैली का आयोजन किया है। उनको उम्मीद है कि वहां से विपक्षी एकता का एक संदेश देश मेें भर दिया जा सकेगा। यह तर्क पहली नजर में आकर्षिक करता है कि अगर भाजपा एवं राजग के खिलाफ हर क्षेत्र में विपक्ष का एक उम्मीदवार उतारा जाए तो विजय प्राप्त की जा सकती है। उसी तरह इस तर्क को भी आसानी से काटना मुश्किल है कि अगर भाजपा एवं राजग से परे सारे दल एक साथ आ जाएं तो वाकई 2019 का किला फतह हो जाएगा। किंतु क्या वाकई यह इतना ही आसान है?

इसका सही उत्तर पाने के लिए ममता बनर्जी और उनके जैसे कुछ नेताओं के उत्साह को राजनीतिक हकीकत के आईने में देखना होगा। मान लीजिए, 19 जनवरी 2019 की रैली में विपक्षी दलोे के ज्यादातर नेता शामिल हो जाएं तो उसका अर्थ क्या होगा? क्या वह वाकई एक महागठबंधन का आधार बनेगा? ध्यान रखिए, तेलांगना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव ने सबसे पहले चुनाव पूर्व एक मोर्चा की बात की और उसके बाद उन्होंने कोलकाता आकर ममता बनर्जी से मुलाकात की।

दोनों एक साथ मीडिया के सामने आए और जो बयान दिया उसमें साफ था कि यह मोर्चा गैर भाजपा के साथ गैर कांग्रेस भी होगा। चन्द्रशेखर राव ने भी इसके लिए कोलकाता के बाद दिल्ली से चेन्नई तक की यात्रा की। बेंगलूरु में एच. डी. कुमारस्वामी के शपथग्रहण समारोह में विपक्षी दलों के एकत्रीकरण में वे कांग्रेस के साथ न दिखें इसलिए शामिल नहीं हुए। शपथग्रहण से पहले ही जाकर कुमारस्वामी को शुभकामनाएं दीं।

ममता बनर्जी अभी भी भाजपा विरोधी गैर कांग्रेसी मोर्चा के ही पक्ष में हैं या बदल गईं हैं इस पर उन्होंने अपना मत स्पष्ट नहीं किया है। हालांकि पिछली बार से विपरीत उन्होंने एक साथ सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी से मुलाकात की। पिछली बार उन्होंने राहुल गांधी की अनदेखी की थी। उस समय सोनिया गांधी से मिलने के बाद उन्होंने कहा था कि मिलकर उन्होंने उनके स्वास्थ्य का हालचाल लिया, जबकि अन्य नेताओं से मिलने के बाद उन्होंने राजनीतिक बयान दिया था। इस तरह थोड़ा बदलाव तो दिखता है, पर ममता की तरफ से अस्पष्टता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।

हालांकि इस बीच कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक राहुल गांधी की अध्यक्षता में हुई जिसमेें गठबंधन में चुनाव लड़ने की बात की गई लेकिन इस समय गठबंधन की सम्पूर्ण कवायद के केन्द्र में ममता बनर्जी हीं हैं। कोलकाता में उन्होंने स्वयं बयान दिया है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ेगी। वह कांग्रेस या वामदलों के साथ गठबंधन नहीं करेगी। अगर अपने प्रदेश में उनका यह रवैया है तो फिर अन्य प्रदेशों के नेतृत्व को वे कैसे गठबंधन के लिए तैयार कर पाएंगी? वैसे भी पश्चिम बंगाल में कांग्रेस एवं वामदल दोनों तृणमूल कांग्रेस के साथ संघर्ष कर रहे हैं। ममता की सोनिया एवं राहुल से मुलाकात के बाद पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष सुधीर रंजन मजुमदार ने विस्तृत बयान दिया।

उन्होंने ममता को गिरगिट की संज्ञा देते हुए कहा कि यहां वो हमारी पार्टी को खत्म करने पर तुली हैं और दिल्ली में गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहीं हैं ताकि सबके सहयोग से प्रधानमंत्री बन सकें। उन्होंने और भी कई आरोप लगाए। केवल भाजपा नहीं कांग्रेस और वामदल भी ममता पर पश्चिम बंगाल में राजनीतिक आतंक पैदा कर लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगाते हैं। अपने कार्यकर्ताओं की हत्या का आरोप ये तृणमूल कांग्रेस पर लगा रहे हैं।

इस माहौल के रहते हुए प्रदेश में इनके साथ गठबंधन की कितनी संभावना बन सकती है इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने तो साफ कह दिया है कि चुनाव पूर्व किसी महागठबंधन की संभावना नहीं है। जो भी होगा वो चुनाव के बाद होगा। निस्संदेह, इस समय कोई निश्चित अनुमान लगाना कठिन है, पर कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व इसे लेकर उहापोह में है। उनको लग रहा है कि प्रदेश में गठबंधन करने से उनकी बची-खुची पार्टी भी टूट का शिकार हो सकती है। इसलिए होगा क्या कहना जरा कठिन है।

ममता बनर्जी की निजी महत्वाकांक्षा को लेकर भी कई दल आशंकित है। इसको ध्यान में रखते हुए ही उन्होंने यह बयान दिया कि वो प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार नहीं हैं। देखना होगा इसका असर कितना होता है। कार्यसमिति की बैठक से बाहर निकले कांग्रेस के नेताओं ने भी यह कहना आरंभ कर दिया है कि हम प्रधानमंत्री पद को लेकर कोई मतभेद नहीं चाहते। इसका फैसला चुनाव के बाद होगा।

कांग्रेस ने फरबरी महीने में ही राहुल गांधी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया था। चाहे तृणमूल कांग्रेस हो या कांग्रेस पार्टी या बसपा…..कोई भी पार्टी अपने नेता के अतिरिक्त आसानी से किसी को स्वीकार नहीं कर सकती। नेता कौन होगा यह चुनाव परिणाम के बाद की स्थिति पर निर्भर करेगा। चुनाव में ये उतनी सीटें ले आएं यह आवश्यक है। इस संदर्भ में तत्काल मूल प्रश्न यह है कि आखिर विपक्षी गठबंधन की मुहिम की कोशिशों में सबसे आगे दिख रहीं ममता के पास ऐसी विचारधारा, देश को लेकर व्यापक विजन और राजनीतिक एकता के सूत्र हैं जिनसे भाजपा विरोधी सारी पार्टियां एक छाते के नीचे आ सके? अभी तक उन्होंने मोदी विरोध के अलावा कोई विचार देश के सामने नहीं रखा है। ममता स्वयं भी विचारधारा को लेकर अस्पष्ट है।

ममता ने दिल्ली में ही बयान दिया कि वो शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को भी कोलकाता रैली में आने निमंत्रण देंगी। इसका सीधा अर्थ तो यही निकाला जाएगा कि वो गठबंधन में शिवसेना को भी शमिल करना चाहती हैं। शिवसेना सांसद संजय राउत से भी उनकी भेंट हुई। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के बाद कांग्रेस ने साफ किया शिवसेना से वो किसी प्रकार का गठबंधन नहीं कर सकते, क्योंकि उससे विचारधारा पर मतभेद है। ऐसा मत रखने वाले दूसरे दल भी हैं। वास्तव में ममता अगर भाजपा को सांप्रदायिक पार्टी कहतीं हैं तो फिर उससे ज्यादा मुखर रुप से हिन्दुत्व की बात करने वाली शिवसेना इस तथाकथित सेक्यूलर खेमे का सदस्य कैसे हो सकती है?

ममता के इस रुख से संदेश यह निकलता है कि उनक पास विचार, विजन और सूत्र के रुप में सिर्फ मोदी विरोध है। इसके आधार पर निर्मित होने वाली छोटी-बड़ी एकता बहुत ज्यादा असरकारक नहीं हो सकती। वैसे भी आज की स्थिति में अपना अस्तित्व बचाने के लिए कुछ दल किसी-किसी राज्य में साथ आ सकते हैं, पर इससे देशव्यापी चुनाव पूर्व महागठबंधन बनना मुश्किल है। दलों की अपनी राजनीतिक पहचान और जनाधार भी ऐसे महागठंधन के मामले में बाधा है। उदाहरण के लिए आंध्रपदेश से तेलुगू देशम एवं वाईएसआर कांग्रेस दोनों ममता की रैली में आ सकते हैं, पर न ये दोनों एक साथ चुनाव लड़ सकते हैं और न ही ये कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सकते हैं। तेलांगना राष्ट्र समिति के के. चन्द्रशेखर राव अपना मत पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं। बीजू जनता दल ऐसी किसी गठंबंधन का अंग बनने से परहेज कर रहा है। असम एनसीआर को लेकर ममता के बयानों से उनकी पार्टी के राज्य अध्यक्ष ही सहमत नहीं है। तो पहले ममता को ही अपनी विचारधारा और वक्तव्यों को लेकर कहीं ज्यादा स्पष्ट और संयत होने की आवश्यकता है जिसका संकेत नहीं मिल रहा। इसलिए उनकी लाख कवायदों के बावजूद मोदी विरोधी किसी महागठबंधन की ठोस संभावना परिलक्षित नहीं हो रही है।

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