पाकिस्तान में इमरान खान की ताजपोशी के निहितार्थ

डॉ.दीपकुमार शुक्ल

विगत 22 वर्षों से राजनीति में सक्रिय पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की पाकिस्तान के 22वें प्रधानमन्त्री के रूप में ताजपोशी हो चुकी है। उन्होंने ऐसे समय में सत्ता संभाली है जबकि पाकिस्तान कई गम्भीर समस्याओं का सामना कर रहा है। जिनमें से दिन प्रति दिन कमजोर होती आर्थिक स्थिति, पड़ोसी देशों से ख़राब रिश्ते और आतंकवादियों को प्रशय देने के कारण वैश्विक प्रतिबन्ध लगाये जाने की आशंका आदि प्रमुख हैं। अब देखना यह है कि इमरान खान इन चुनौतियों से कैसे निपटते हैं।

पाकिस्तान की नेशनल असेम्बली की कुल सदस्य संख्या 342 है। सत्ता प्राप्त करने के लिए 172 सदस्यों की आवश्यकता होती है। पाकिस्तानी संविधान के अनुसार 342 में से मात्र 272 सीटों के लिए ही चुनाव होते हैं। जबकि शेष 70 सीटें अल्पसंख्यकों तथा महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। 25 जुलाई को सम्पन्न हुए चुनाव में इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ 116 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन पूर्ण बहुमत से काफी दूर थी। नेशनल असेम्बली में 17 अगस्त को हुए प्रधानमन्त्री के चुनाव में इमरान खान को 176 मत हासिल हुए। इससे स्पष्ट हैं कि उनकी पार्टी के अतिरक्त अन्य सदस्यों ने भी उनके पक्ष में मतदान किया है। पूर्व आशंका के अनुरूप इमरान को अन्य सदस्यों का समर्थन सेना के इशारे पर ही प्राप्त हुआ है। अर्थात सत्ता की चाभी सदैव सेना के पास ही रहेगी। जैसी कि सेना की रणनीति भी थी। सेना के दबाव के चलते इमरान खान के लिए पड़ोसी देशों खासकर भारत से रिश्ते सुधारना जहाँ चुनौतीपूर्ण है वहीं आतंकवाद के मुद्दे पर विश्व का विश्वास जीत पाना बेहद कठिन है।

पूर्व भारतीय थलसेना अध्यक्ष जनरल दीपक कपूर के शब्दों में ‘वे छद्म युद्ध जारी रखेंगे। वे जम्मू-कश्मीर में अशान्ति पैदा करना भी जारी रखेंगे। मुझे नहीं लगता कि दोनों देशों के सम्बन्धों में किसी तरह का कोई सुधार होगा।’ इस्लामाबाद में भारत के उच्चायुक्त रह चुके पूर्व राजनयिक जी.पार्थसारथी के अनुसार इमरान खान सेना के आदमी हैं। उनसे वही करने की उम्मीद की जाती है जो पाकिस्तानी सेना उनसे कहेगी। इमरान खान चुनाव जीतने के बाद अपने प्रथम सम्बोधन में कश्मीर का राग छेड़कर सेना और आतंकवादियों को खुश करने का पहले ही प्रयास कर चुके हैं। इसके बावजूद भारत ने उम्मीद जताई है कि पाकिस्तान की नयी सरकार दक्षिण एशिया को सुरक्षित, स्थिर और आतंकवाद से मुक्त करने की दिशा में रचनात्मक कदम उठाएगी। पाकिस्तान का मुख्य मददगार अमेरिका भी आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तानी नीतियों के चलते इस समय नाराज चल रहा है। ऐसे में आर्थिक सुधार की दिशा में सकारात्मक कदम उठा पाना नयी सरकार के लिए काफी मुश्किल भरा है।

नये प्रधानमन्त्री का मानना है कि देश के आर्थिक हालात सुधारने के लिए सबसे अधिक चोट भ्रष्टाचार पर करनी होगी। विपक्ष में रहते हुए वे कई बार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर तत्कालीन सरकार को घेर चुके हैं। सन 2014 में उन्होंने भ्रष्टाचार को लेकर नवाज शरीफ सरकार के विरुद्ध आजादी मार्च भी निकाला था। पाकिस्तान के इतिहास का यह सबसे बड़ा आन्दोलन था, जो 126 दिन चला था। नवाज शरीफ के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने वालों में इमरान खान भी शामिल थे। जिसके तहत नवाज शरीफ को प्रधानमन्त्री पद छोड़ना पड़ा था।

इमरान खान ने शपथ लेने के बाद अपने पहले सम्बोधन में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही सर्वाधिक चर्चा भी की। उन्होंने कहा कि देश को लूटने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना मेरा पहला काम होगा। देश की चुनावी प्रक्रिया पर लगातार उठ रहे सवालों के दृष्टिगत उन्होंने इसमें सुधार की बात करते हुए कहा कि मैं ऐसी चुनाव प्रणाली बनाऊंगा जिससे कोई भी व्यक्ति भविष्य में चुनावों में खामियां न तलाश पाए।
नये प्रधानमन्त्री का यह विचार निश्चित ही उच्च है और वे इस पर अमल करने का प्रयास भी करेंगे। लेकिन इस दिशा में उन्हें किस हद तक सफलता मिलेगी यह कहना कठिन है। क्योंकि पाकिस्तान का संवैधानिक ढांचा ही ऐसा है जिसके कारण पूर्ण बहुमत वाली सरकारें भी वहां सकारात्मक कदम उठाने में प्रायः विफल ही रही हैं। ऐसे में इमरान खान के लिए कुछ भी सकारात्मक या सृजनात्मक कर पाना आसान नहीं है। इसके बावजूद विश्व भर की निगाहें उन पर टिकी हुई हैं।

पाकिस्तान प्रगति और सृजन के क्षेत्र में तभी आगे बढ़ सकता है जबकि वहां प्रजातान्त्रिक सरकारों पर से सेना का नियन्त्रण हटे। जो फिलहाल सम्भव नहीं है। इमरान खान को चाहिए कि वे अन्य मुद्दों पर सकारात्मक कदम उठाने के साथ-साथ पाकिस्तानी सेना और आइएसआई की सोच को इस्लामिक कट्टरता के दायरे से बाहर निकालने की दिशा में भी प्रयास करें। यदि पाकिस्तानी सेना और खुपिया एजेंसी आइएसआई इस्लामिक कट्टरता के दायरे से बाहर निकलकर सोचना शुरू कर दे तो पाकिस्तान की आधी समस्याएं स्वतः ही समाप्त हो जाएँगी। कट्टरपन्थी सोच के कारण ही पाकिस्तान आतंकवाद का गढ़ बना हुआ है।

आतंकवाद के बढ़ते दायरे का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस बार के चुनाव में आतंकवादियों ने भी खुले आम भाग लिया था। जिससे अमेरिका तक चिन्तित हो उठा है। लेकिन पाकिस्तानी जनता ने आतंकवादियों को पूरी तरह से ख़ारिज करके यह सिद्ध कर दिया है कि पाकिस्तान का आमजन आतंकवाद के पूरी तरह खिलाफ है। नयी सरकार चाहे तो जनता की इसी सोच को हथियार बनाते हुए आतंकवाद को पाकिस्तान की जमीन से उखाड़ फेंके। विश्व स्तर पर अलग-थलग पड़ चुका पाकिस्तान तभी विश्व के साथ कदमताल करते हुए प्रगति के नवीन सोपान चढ़ पायेगा, जबकि नयी सरकार कट्टरपन्थ और आतंकवाद की पूर्णतया उपेक्षा करते हुए आगे बढ़ेगी।

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