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महिलाएं टीके पर भरोसा करने में आगे…

महिलाएं टीके पर भरोसा करने में आगे…

न्यूयॉर्क। भारत में कोरोना टीकाकरण का दूसरा दौर शुरू हो चुका है। इसके तहत 60 साल से अधिक उम्र वालों और कई बीमारियों से ग्रस्त 45 साल से ऊपर के लोगों को टीका लगाने का काम चल रहा है। इसके साथ ही टीके की विश्वसनीयता को लेकर कई तरह की टीका-टिप्पणियां भी हो रही हैं। इससे कई लोग टीका लगवाने से हिचक भी रहे हैं। इन सबके बीच एक अध्ययन का निष्कर्ष उत्साह बढ़ाने वाला है। हार्वर्ड के शोधकर्ताओं ने एक सर्वे में पाया है कि कोरोना के टीके पर भरोसा करने के मामले में भारतीय महिलाएं दुनियाभर में आगे हैं।

16 देशों की करीब 18,000 हजार महिलाओं पर अध्ययन का निष्कर्ष

हार्वर्ड टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में 16 देशों की करीब 18,000 हजार महिलाओं को शामिल किया। उनसे काल्पनिक तौर पर सुरक्षित, मुफ्त और 90 फीसद प्रभावी टीके के बारे में उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए प्रश्न पूछे गए। अध्ययन में शामिल गर्भवती महिलाओं में 52 फीसद और 73 फीसद सामान्य महिलाओं ने कहा कि वे टीका लगवाएंगी। जबकि सर्वे में शामिल कुल महिलाओं में से 69 फीसद ने कहा कि वे अपने बच्चों का भी टीकाकरण कराएंगी।

भारत में 75 फीसद महिलाएं अपने बच्चों के भी टीकाकरण के लिए सहमत

इस सर्वे का निष्कर्ष यूरोपीयन जर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। इसके अनुसार, टीके की स्वीकार्यता भारत, फिलीपींस और लैटिन अमेरिकी देशों में गर्भवती महिलाओं में 60 फीसद से अधिक और अन्य महिलाओं में यह 78 फीसद से ज्यादा रही। वहीं, 75 फीसद माताओं ने इस बात के संकेत दिए कि वे अपने बच्चों का टीकाकरण कराएंगी। वहीं दूसरी ओर, अमेरिका और रूस जैसे सर्वाधिक प्रभावित देशों में महज 45 फीसद गर्भवती महिलाओं ने टीके की स्वीकार्यता पर हामी भरी। जबकि इन देशों में अन्य महिलाओं में इसकी स्वीकार्यता 56 फीसद से भी कम रही। उल्लेखनीय है कि यह स्थिति आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की भी रही, जहां अपेक्षाकृत प्रकोप कुछ कम रहा।

गर्भवती महिलाओं को गर्भस्थ शिशु की चिंता

टीके को लेकर अनिच्छा जताने वाली गर्भवती महिलाओं की मुख्य चिंता गर्भस्थ शिशु पर होने पर प्रभाव को लेकर थी। उन्हें टीके से अपने बच्चे को नुकसान होने की आशंका थी। गर्भवती महिलाओं पर टीके के असर संबंधी कोई डाटा नहीं होना भी इसके कारण थे।

टीके को लेकर हिचक के कई कारण

शोधपत्र की लेखिका जुलिया वू का कहना कि टीके के प्रति हिचक के कई कारण सामने आए। इनमें कोरोना संक्रमण का आशंकित खतरा, सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियों पर भरोसे का स्तर तथा मौजूदा टीके के प्रति रवैया मुख्य कारक शामिल हैं। इसलिए जरूरी है कि टीके को लेकर लोगों की सभी चिंताओं के समाधान के लिए अभियान चलाया जाना चाहिए। वू और उनकी सहयोगियों ने टीकाकरण और कोरोना से संबंधित कई बिंदुओं पर सवाल पूछे थे। इनमें सबसे अहम मामला महिलाओं में टीके की स्वीकार्यता और उस पर भरोसे का था, जिसमें उसके सुरक्षित होने और प्रभाव को लेकर चिंताएं जताई गईं।

 

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