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बाबा सेमराधनाथ धाम

बाबा सेमराधनाथ धाम

 

जिन जगहों पर भगवान शिव के साथ मां पार्वती विराजती हैं, वहां की बात ही निराली है। ऐसी ही एक जगह भदोही का सेमराधनाथ धाम है, जहां शिवलिंग अर्धनारीश्वर हैं। मान्यता है कि यहां मिट्ïटी के बर्तन में जल, ऊपर से बेलपत्र, आक व धतूरे के पुष्प तथा चावल आदि डालकर भगवान भोलेनाथ पर चढ़ाने मात्र से ‘कैलाश परिक्रमाÓ पूरी हो जाती है। यहां महाशिवरात्रि को तो पूरे दिन शिवभक्तों का जमघट होता है। सावन के हर सोमवार को जलाभिषेक के लिए कांवरियों का तांता लगा रहता है।
जहां कहीं भी स्वयंभू शिवलिंग अथवा ज्योतिर्लिंग है, उसे महातीर्थ का दर्जा मिला हुआ है। सेमराधनाथ धाम भी ज्योतिर्लिंग अथवा स्वयंभू शिवलिंग के रूप में भदोही मुख्यालय से 18 किमी दूर जंगीगंज-धनतुलसी मार्ग पर दक्षिण-पश्चिम त्रिकोण पर गंगा के किनारे एक कुएं में प्रकट है। मंदिर में जो शिवलिंग है, वह लगभग एक इंच दक्षिण की ओर झुका हुआ है। पावर्ती यहां शिव के बाएं भाग में विराजती हैं। शिवलिंग का आकार अर्धनारीश्वर है। यही स्थान सेमराधनाथ धाम से जाना जाता है। सेमराध यानी समरादि दो शब्दों समर और आदि से मिलकर बना है। समर यानी ‘मध्यÓ और आदि यानी दोनों का मध्य अर्थात भगवान शिव की नगरी काशी और प्रयाग के मध्य स्थित होने के कारण ही इसे सेमराध कहा जाता है। भक्ति व श्रद्धा के वशीभूत श्रद्धालु यहां दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। सावन के महीने में कांवडि़ए प्रयाग से कांवड़ लेकर बाबा सेमराधनाथ धाम में जलाभिषेक के बाद काशी में बाबा विश्वनाथ को जल चढ़ाते हैं।
पौराणिक कथा
द्वापर युग में काशी पर एक दुराचारी राजा पौंड्रक ने आक्रमण किया। उसके आतंक से चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। भदोही जो पहले काशी अंग था और अब अलग होकर जिला बन गया है, उसके आतंक से अछूता नहीं था। पौंड्रक भगवान कृष्ण से भी बैर रखता था। प्रजा से अपने को श्रीकृष्ण बताते हुए पूजने के लिए कहता था। इसके चलते द्वारका से लेकर प्रयाग तक की प्रजा उसके आतंक से व्याकुल थी। पौंड्रक कहता था कि एकमात्र मैं ही वासुदेव हूं, दूसरा कोई नहीं है। प्राणियों पर कृपा करने के लिए मैंने ही अवतार लिया है। श्रीकृष्ण ने झूठ-मूठ में अपना नाम वासुदेव रखा है। अब उसे छोड़ दो। उसके आतंक से प्रजा को छुटकारा दिलाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने भगवान भोलेनाथ से विचार-विमर्श किया। इसके बाद श्रीकृष्ण ने काशी पर चढ़ाई कर दी। भगवान श्रीकृष्ण के आक्रमण का समाचार पाकर महारथी पौंड्रक भी दो अक्षौहिणी सेना के साथ शीघ्र ही नगर से बाहर निकल आया। काशी का राजा पौंड्रक का मित्र था, अत: वह भी उसकी सहायता के लिए तीन अक्षौहिणी सेना के साथ उसके पीछे-पीछे आया। पौंड्रक भी शंख, चक्र, तलवार, गदा, शारंग धनुष और श्रीवत्स चिन्ह आदि धारण कर रखे थे। उसके वक्षस्थल पर बनावटी कौस्तुभमणि और वनमाला लटक रही थी। उसने रेशमी पीले वस्त्र पहन रखे थे और रथ की ध्वजा पर गरुड़ का चिन्ह भी लगा रखा था। उसके सिर पर अमूल्य मुकुट था और कानों में मकराकृत कुंडल जगमगा रहे थे। उसका यह वेश बनावटी था, मानो कोई अभिनेता रंगमंच पर अभिनय करने आया हो। उसकी वेशभूषा अपने समान देखकर श्रीकृष्ण खिलखिलाकर हंसने लगे। श्रीकृष्ण ने पौंड्रक से कहा- पौंड्रक! अब तेरा अंत है। श्रीकृष्ण व शिव के बीच हुए गुप्त संवाद के बाद शिव ने काशी से त्रिशूल छोड़ा और श्रीकृष्ण ने प्रयाग से सुदर्शन चक्र, दोनों सेमराध में ही टकराए। इनकी टकराहट से उत्पन्न प्रकाश के बीच शिवलिंग रूप बना और पृथ्वी के नीचे समा गया। जबकि इस वार को पौंड्रक सहन नहीं कर सका और उसका धड़ व सिर अलग हो गया। जिस जगह उसका धड़ व सिर कटा, वह सेमराध ही था।
दो सौ साल पुराना मंदिर
जहां तक मंदिर के निर्माण की बात है तो मंदिर दो सौ साल पुराना है। कहते हैं कि एक व्यापारी आयुर्वेदिक दवाओं का व्यापार करता था और प्राय: यहीं गंगा के रास्ते आया-जाया करता था। एक दिन जब वह नदी के रास्ते जा रहा था, तब उसकी नाव इस स्थान पर अकारण ही रुक गई। पूजन-अर्चन के बाद वह किसी तरह पार तो हो गया, लेकिन रात में उसे स्वप्न आया कि तू जिस जंगल से होकर आता है, वहां भगवान भोलेनाथ का ज्योतिर्लिंग है। सुबह व्यापारी वहां पहुंचा तो उसे दिव्य ज्योति का एहसास हुआ, पास गया तो देखा सचमुच वहां अद्ïभुत ज्योतिर्लिंग है। चूंकि वहां घना जंगल था तो व्यापारी ने सोचा कि आखिर यहां कौन पूजा-पाठ करेगा, सो वह ज्योतिर्लिंग की खुदाई कराके उसे अपने गांव ले जाना चाहा। कई दिनों तक खुदाई के बाद जब ज्योतिर्लिंग टस से मस नहीं हुआ तो उसने वहीं पर मंदिर का निर्माण कराया। वहां आज भव्य मंदिर है।
माघ में लगता है मेला
यहां माघ मास में प्रतिवर्ष मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से लोग बड़ी संख्या में आते है। पूरे महीने यहां लोग यहां ठहरते हैं। गंगा के किनारे यहां विस्तृत बालुकामय भूभाग में झोपडिय़ों व तंबू-कनात में बसी माघ नगरी का आकर्षण अनुपम हो उठता है। मान्यता है कि यहां माघ मास में गंगा क्षेत्र में व्रतनिष्ठ होकर कल्पवास करना बड़ा फलदायी है। उस दौरान सेमराधनाथ धाम में आस्था और भक्ति का अद्ïभुत संगम देखने को मिलता है। भोले भंडारी के इस धाम में सूरज की किरणों के साथ ही बढऩे लगता है भक्ति और श्रद्धा का सैलाब। हर जुबान पर होता है हर हर महादेव का जयकारा।
अक्षय वट
पद्ïम पुराण में ही सेमराध तट पर स्थित अक्षय वट के पत्तों पर भगवान विष्णु के शयन की बात कही गई है। मेले में पहुंचने वाले श्रद्धालु यहां स्थित वटवृक्ष की परिक्रमा भी करते हंै। इसकी छांव में बैठने से बहुत शांति मिलती है। माघ में कल्पवास मेले के समय सेमराध में खुद उत्तरवाहिनी गंगा नदी के बीच अपना स्थान छोड़ देती है। ऐसा सालों से हो रहा है। क्षेत्रवासी इसे भगवान सेमराधनाथ महादेव की कृपा मानते हैं।

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