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Today's Paper

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एक काँव-काँव यह भी सुनिए…

एक काँव-काँव यह भी सुनिए…

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा- ‘उरतृप्त’

 

जी हाँ मैं कौआ हूँ। काला हूँ। वर्णभेद का मारा हूँ। किसी के कालेपन की उपमा हूँ। किसी के दुष्चरित्र का प्रतीक हूँ। जी हाँ मैं कौआ हूँ। मुझे काला कह-कहकर बड़ा चिढ़ाया जाता है। मेरी खूब खिंचाई की जाती है। अपनी हंसी के लिए मेरा परिहास उड़ाया जाता है। अपने झूठे अहंकार के लिए मुझे नीचा दिखाया जाता है। मैं आपकी छत पर बैठकर काँव-काँव करता हूँ तो किसी अतिथि को संग लेकर आने वाला कूरियर वाला सा लगता हूँ। क्या कभी काँव-काँव के पीछे मेरी पीड़ा को समझने की कोशिश की है? क्या कभी सोचा है कि मेरी काँव-काँव संसद में होने वाली काँव-काँव से अलग होती है?

 

दुनिया के सर्वश्रेष्ठ स्वार्थजीवियों! मेरी काँव-काँव के बिना आपकी सुबह नहीं होती। देश का एक तबका भूखमरी, लाचारी, बेरोजगारी, अत्याचार के हाहाकार से त्रस्त होकर कराहता रहता है। जोर-जोर से विलाप करता रहता है। इस कराह और विलाप को मोटी चमड़ी वालों ने काँव-काँव का नाम दिया है। वह काँव-काँव नहीं हृदय का घाव है। उनके विरह में अपने उज्ज्वल भविष्य को खोजने वाले स्वार्थजीवियों में और मुझमें ज्यादा अंतर नहीं है। मैं काला तो वे भूरे हैं। बनारस में भी हम काले होते हैं। उनकी तरह नहीं कि गिरगिट की तरह रंग बदलते फिरें। दोनों दुनिया की परवाह किए बिना काँव-काँव करने के आदी हो चुके हैं। मैं उनसे कई गुना बेहतर हूँ। मैं नियमित रूप से काँव-काँव करता हूँ। वे केवल पाँच साल में एक बार काँव-काँव करते हैं। मेरी काँव-काँव हर कोई सुन सकता है। उनकी काँव-काँव सुनने के लिए भीड़ को भाड़े पर जुटाया जाता है। मैं शवों की राजनीति नहीं करता। शवों पर फेंका पैसा नहीं चुनता। मैं शवों को केवल शव की तरह देखता हूँ। किंतु स्वार्थी जीव शव का लिंग, धर्म, जात-पात, प्रांत, भाषा खोजने में लग जाता है। वे शवों की ठंडाहट में अपने स्वार्थ की गरमाहट भर देते हैं। फिर अपनी-अपनी रोटी सेंककर खाने लगते हैं। मैं बरसों से अपनी रोटी लोमड़ी को देती आयी हूँ।

 

स्वार्थजीवियों की काँव-काँव से पितरों के पितर भी यही मारे-मारे फिरते हैं। बरक्स मेरी काँव-काँव से पितरों की तो मुक्ति होती है। मेरे सेंके हुए अंडों से कोयल निकलकर कूहू-कूहू करती है, जबकि आपकी छत्रछाया में पले बढ़े लोग राग-द्वेष, स्वार्थ, कुटिलता, चपलता, ईर्ष्या, मोह के बंधन में बंधकर झगड़ालू बोली बोलने लगते हैं। एक-दूसरे को लड़ाते हैं। मरवाते हैं। पिटवाते हैं। कटवाते हैं। मेरी काँव-काँव को समझने की कोशिश करें। मैं तो केवल लोगों के कान ले जाता हूँ, आप तो पूरा का पूरा शरीर बेच देते हैं। मैं किसी की भूख को देखकर तो किसी की लाचारी को समझकर काँव-काँव करता हूँ। किसी की बदहाली तो किसी की बेरोजगारी को देखकर काँव-काँव करता हूँ। किसी अत्याचार की शिकार अबला तो किसी गरीब की दरिद्रता से पसीजकर काँव-काँव करता हूँ। मैं कभी हंस की चाल चलना चाहता था। आप तो मुझसे भी गए बीते हैं। आप तो केवल ‘चाल पर चाल’ चलते हैं। मेरी काँव-काँव अब मेरा नहीं रहा। मेरी काँव-काँव को मात्र काँव-काँव मत कहें। काँव-काँव तो आप करते हैं। मेरे रोने से ढोल फूटे न फूटे किंतु आपके रोने में अहंकार फूटता है। मैं अवसरवादी नहीं हूँ। स्वार्थ साधने के लिए बीस-बीस चेहरे लेकर नहीं घूमता। अब झूठ बोलने पर मैं नहीं काटता बल्कि झूठ बोलने वाले, लड़ाने वाले, मारने-पीटने वाले देश को काटते हैं।  

 

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