विचार मित्र

जब गुरु की इच्छा पूर्ति के लिए आधी रात को निकला बालक

*शिक्षक दिवस पर विशेष*

हरदोई। जिस गुरु को ब्रह्मा और विष्णु का रूप कहा जाता था और जिस गुरु शिष्य के रिश्ते की दुहाई दी जाती थी, उस रिश्ते की डोर आज कमजोर हो चुकी है। आज ना तो गुरु अपनी मर्यादा को कायम रख पा रहे हैं और न ही शिष्य उनके अहमियत समझ पाते हैं ।जिसका असर पूरे देश पर हो रहा है।
जिस देश में शिक्षकों का मान सम्मान होता है वह मुल्क तरक्की में कभी पीछे नहीं रहते। ऐसे कई मुल्क हैं जो आज तरक्की कर चुके हैं और हर लिहाज से हम से आगे निकल चुके हैं। उनकी तरक्की और खुशहाली का राज यही है कि वहां शिक्षकों को मंत्रियों से ज्यादा इज्जत दी जाती है। पर अफसोस! हमारे मुल्क में शिक्षकों की इज्जत को तार-तार किया जाता है उन पर हर तरफ लाठियां भांजी जा रही है और उनके साथ अत्याचार किया जा रहा है। इस देश में शिक्षकों से ज्यादा अहमियत भ्रष्टाचारी सांसद और विधायकों को दी जा रही है तो सोचो फिर देश तरक्की कैसे कर सकता है ,जब हम अपने गुरुओं का आदर सत्कार ही नहीं कर पायेगे तो ऐसे में उनसे मिलने वाली शिक्षा हमे गुमराहियों की तरफ ले जायेगी, जिससे फायदा कम नुकसान ज़्यादा होगा। कहने वालों ने कहा है कि गुरु एक दीपक है जो अंधेरी राहों में रोशनी के वजूद को बरकरार रखता है।गुरु वो फूल है जो अपनी खुश्बू से पूरे समाज में अमन और मोहब्बत दोस्ती का पैगाम पहुंचाता है। उस्ताद बादशाह नहीं होता पर बादशाह पैदा करता है। बिलग्राम के मशहूर सूफी संत मीर अब्दुल वाहिद अपनी किताब में अपने ही पीर (गुरु) का एक किस्सा लिखते हुए कहते हैं कि मेरे पीर शेख शफी अल्प आयु में अपने पैतृक गांव कस्बा शफीपुर उन्नाव से शिक्षा ग्रहण करने के लिए शेख साद के पास खैराबाद पहुंचे और वहां पर वो शिक्षा प्राप्त करने लगे, एक दिन गुरु ने इस होनहार बालक को देख कर परीक्षा लेने का निर्णय किया। गुरु ने शेख शफी को बुला कर अपने कमरे में रात गुजारने का आदेश दिया और जब आधी रात बीती तो अचानक उठ कर गुरु शेख साद ने मूली खाने की इच्छा प्रकट की जबकि वो मौसम मूली का नहीं था। आज्ञाकारी शिष्य शेख शफी की उम्र उस वक्त छः या सात वर्ष की थी। आवाज सुनते ही रात के बारह बजे बिना खौफ एवं डर के उठकर अपने गुरु की इच्छा पूर्ण करने के लिए खैराबाद की गलियों में मूली ढूँढ कर लाने के लिए निकल पड़े। तमाम कोशिशों के बावजूद जब मूली नहीं मिली तो मजबूर होकर एक मकान के दरवाजे पर बैठ कर रोने लगे। मकान के अंदर सो रही महिला को बाहर जब किसी बच्चे के रोने की आवाज़ मिली तो उसने अपने पति को जगा कर ये बात बताई और दोनों निकल कर बाहर आये ।बच्चे को रोता हुआ देख कर पति पत्नी ने रोने का कारण पूछा, जिस पर बच्चे ने जवाब दिया कि मेरे गुरु जी ने मूली खाने की इच्छा जताई और मुझे मूली नहीं मिल रही है मै कैसे बिना मूली लिये गुरु जी के पास जाऊँ। ये सब बातें हो ही रही थी कि आसपास के लोग भी जग कर बच्चे के पास आ गये और सबने सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि ये मौसम मूली का नहीं है जो आपको मूली मिल सके। ये सुनकर शेख शफी मायूस हो गये, तभी एक व्यक्ति और आ पहुंचा और कहने लगा कि मैने फला व्यक्ति के घर मे एक मूली का पौधा देखा है सब लोग बच्चे के साथ उस घर पहुंचे और उस मूली को मांग उस बच्चे को दी गई। शेख शफी उस मूली को लेकर अपने गुरु के पास पहुंचे। गुरु शेख साद ने शिष्य को मूली के साथ देखकर खुश हुए और गले से लगा लिया ,दुआएं दी ।गुरु की इज्जत और उनका मान सम्मान करने की वजह से शेख शफी इस्लाम के बहुत बड़े आलिम और सूफी बने। जिनको आज भी लोग याद करते हैं और शफीपुर जाकर उनके दरबार में हाजिरी लगाते हैं।
गुरु को लेकर मीर मधनायक बिलग्रामी कुछ यूँ लिखते हैं। *नमो नमो गुरु भारथी बरनि बानि बरदान* *प्रभु दयाल प्रतिपाल कर करौं रुचिर रस सान*

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