त्रिकोण के लिए लाखों श्रद्धालु आते हैं मॉ विन्ध्यवासिनी सिद्धपीठ

विन्ध्याचल-मिर्जापुर। काशी प्रयाग के मध्य स्थित भारत के शक्तिपीठों, शक्तिक्षेत्र, शक्तिधाम, देवीतीर्थ, सिद्धपीठ एवं देवी स्थानों में मॉ जाह्वी के अंकपास में आबद्ध विन्ध्यपर्वत पर स्थित मॉ विन्ध्यवासिनी का महात्म्य सर्वोपरि है। शक्ति एवं शान्ति की साधना के लिए विख्यात तपोभूमि विन्ध्य पर्वत आदिकाल से ऋषियों, मुनियों और ध्यानार्थियों के लिए श्रद्धा की केन्द्र भूमि रहा है। इस तपोभूमि का वर्णन वेदों, पुराणों, महाभारत, दुर्गासप्तशती आदि पवित्र ग्रन्थों में वर्णित है।
14 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में प्रकृति हरतिमा के बीच श्रद्धालु त्रिकोण परिक्रमा पूर्ण करते है। त्रिकोण के एक बिन्दु पर सतोगुण प्रधान महासरस्वती बुद्धि प्रदायनी योगमाया अष्टभुजा देवी, द्वितीय बिन्दु पर स्त्रीगुण प्रधान ऐश्वर्यप्रदात्री महालक्ष्मी मॉ विन्ध्यवासिनी तथा तृतीय बिन्दु पर तमोगुण शत्रुसंहारिणी महाकाली विद्यमान है। निशुम्भ-शुम्भ मर्दनी, प्रचण्ड मुण्डखण्डिनी बने रणे प्रकाशिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी। शुम्भ निशुम्भ राक्षसों का वध करने के बाद सिद्धपीठ में मॉ विन्ध्यवासिनी विराजमान है। साल भर यहां श्रद्धालु दर्शन-पूजन को आते रहते है, परन्तु नवरात्र में दर्शन करने वालों की संख्या बढ़ जाती है। जब देवी भक्त मॉ विन्ध्यवासिनी के दर्शन-पूजन के लिए आते है तो यहां पर त्रिकोण भी करते हैं।
त्रिकोण में तीन देवियों का दर्शन किया जाता है जो विन्ध्याचल पर्वत के तीन कोनों पर स्थित हैं उत्तर में मॉ विन्ध्यवासिनी, पूरब में मॉ काली तथा पश्चिम में अष्टभुजा देवी विराजमान है। सर्वप्रथम विन्ध्याचल में मॉ विन्ध्यवासिनी फिर कालीखोह में काली इसके बाद अष्टभुजा पहाड़ी मॉ अष्टभुजा का पूजन-अर्चन होता है। इसके बाद पुनः मॉ विन्ध्यवासिनी का दर्शन करने के पश्चात् ही त्रिकोण पूर्ण होता है। विन्ध्य क्षेत्र की महत्वता के बारे में अनेक आख्यान भरे पड़े है। मान्यता है कि मॉ विन्ध्यवासिनी यहां महालक्ष्मी रूप में भक्तों को साहस समृद्धि प्रदान करती है। कालीखोह स्थित मॉ काली महाशक्ति प्रदायक हैं जबकि सरस्वती स्वरूपा मॉ अष्टभुजा महाविद्या व बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी है। अधिकांश मनुष्य की आकांक्षा होती है सम्पदा व समृद्धि दोनों मिले।
शास्त्रों के अनुसार मनुष्य तभी समृद्ध होता है जब वह तन, मन, धन तीनों से समृद्ध हो। इसलिए त्रिकोण में भक्त धन व भौतिक समृद्धि के लिए मॉ विन्ध्यवासिनी का दर्शन करते हैं, उसकी रक्षा के लिए मॉ काली से शक्ति तथा अन्त में अष्टभुजा के दर्शन कर बृद्धि प्राप्त कर मानसिक समृद्धि प्राप्त करते हे। तीनों देवियों सतोगुण, रजोगुण व तमोगुण से युक्त है। इसी कारण इन्हें महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकाली के नाम से पूजा जाता है। भैरव इस त्रिकोण यंत्र की बराबर रखवा करते है। मॉ विन्ध्यवासिनी धाम में लघु त्रिकोण स्थित है।

नवरात्र में पताका में निवास करती है मॉ विन्ध्यवासिनी
विन्ध्याचल। मॉ विन्ध्यवासिनी दोनों नवरात्र भर पताका पर निवास करती हैं। मान्यता है कि पताका का दर्शन भर कर लेने से मॉ का दर्शन हो जाता है। जो भक्त मॉ के धाम में आकर मॉ के चरणों में मत्था टेक सकते है। वे ट्रेनों, बसों से सफल के दौरान दूर से ही पताका का दर्शन कर लेते है।
तीर्थ पुरोहितों के अनुसार नवरात्र में मॉ पताका में भी निवास करती है। बताया कि पताका का दर्शन कर लिया जाये तो मॉ के दर्शन का फल मिलता है। इसी मान्यता को लेकर देवी भक्त दूर से ही पताका को देख सिर झुकाकर मॉ की आराधना कर लेते है। दर्शन-पूजन कर लौटते समय भक्त गली में खड़े होकर पताका का दर्शन करना नहीं भुलते है। आस-पास कई मंजिला घर बन गया है, लेकिन पताका का दर्शन किसी के लिए दुर्लभ नहीं है।

108 सिद्धपीठों में एक है विन्ध्याचल
विन्ध्याचल। मॉ विन्ध्यवासिनी धाम 108 सिद्धपीठों में एक है। पुराणों में इस क्षेत्र को तीन उपाधियों से विभूषित किया गया है, शक्तिपीठ, सिद्धपीठ और मणिद्वीप। सृष्टि के प्रारम्भ से लकर प्रलय तक यह क्षेत्र समाप्त नही होता है।
कहा जाता है कि एक बार वशिष्ठ मुनि ने तीनों लोको को भ्रमण करने वाले नारद ऋषि से पृथ्वी पर सबसे उत्तम क्षेत्र के विषय पर जिज्ञासा प्रकट की। इस पर नारद ऋषि ने कहा कि ब्रहांड में विन्ध्य क्षेत्र सर्वोत्कृष्ट है। देवी भागवत के अनुसार जहां विन्ध्य पर्वत व भगवती सुरसरि का संगम होता है वह स्थान है मणिद्वीप। यह स्थल विन्ध्याचल में स्थित है।
जानकारों का कहना है कि हिमालय से गंगा सागर तक गंगा का विन्ध्य पर्वत से संगम सिर्फ विन्ध्याचल में ही होता है। यहां स्नान पूजन करने से सभी बंधन कट जाता है। तीर्थ पुरोहित व पण्डा समाज के पूर्व अध्यक्ष राजन पाठक ने कहा कि देवी पुराण में 108 सिद्धपीठों का उल्लेख है जिसमें विन्ध्याचल भी शामिल है। यहां के कण-कण में ईश्वर का निवास है। कहते है कि भगवान राम ने भी वन गमन के समय विन्ध्य क्षेत्र में अनुष्ठान पूजन किया था।

मां की हर आरती का है अलग-अलग महत्व
विन्ध्याचल। जगत जननी मॉ विन्ध्यवासिनी की चारों आरती चार पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करने वाली है। जो भक्त जिस आरती में उपस्थित होता है उसे उसी प्रकार फल की प्राप्ति होती है।
ब्रह्मामुहुर्त में भोर में चार बजे मंगला आरती होती है। मान्यता है कि इस आरती में मॉ का स्वरूप बाल्यावस्था का होता है। इस आरती में शामिल होने पर भक्तों को धर्म की प्राप्ति के साथ उसका भविष्य मंगलमय हो जाता है। दोहपर 12 बजे मॉ की मध्यान्ह आरती होती है। जिसे राजश्री आरती कहा जाता है। इसमें मॉ का स्वरूप युवावस्था का होता है। इस आरती से भक्त को समृद्धि व वैभव मिलता है। जिससे भक्त धन धान्य से पूर्ण होता है। रात सवा सात बजे मॉ की छोटी आरती की जाती है। इस आरती में मॉ का स्वरूप प्रौढ़ावस्था का होता है। इस आरती में शामिल होने से भक्त को संतान की मनोकामना पूरी होती है। रात को साढ़े नौ बजे मॉ की बड़ी आरती होती है। इसमें मॉ का स्वरूप वृद्धावस्था का होता है। इस स्वरूप में मॉ का दर्शन करने और आरती में शामिल होने से भक्तों को मोक्ष मिलता है। जो जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर मॉ के चरणों में स्थान पाता है। प्रत्येक आरती का अपना अलग-अलग महत्व है। सभी आरती में भक्तों का सैलाब उमड़ता है। जिसे जो पाने की इच्छा रहती है वह उसी आरती में मॉ का स्मरण करता है।
तीर्थ पुरोहित पं. राजन पाठक कहते हैं कि ऐसा स्थल तो पूरे बं्रहांड में कही नहीं है। यहां आने मात्र से भक्तों की मनोकामना पूरी हो जाती है। मॉ के सभी स्वरूप का दर्शन करने से सब कुछ मिल जाता है। यहां आने से भक्त निहाल हो जाते है।

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