देश में नई तिलहन क्रांति की आवष्यकताः डॉ. आनंद सिंह

मथुरा। सरसों अनुसंधान निदेषालय की स्थापना के बाद देष में विषेशकर
राजस्थान में राई-ंसरसों की खेती को नई दिषा मिली और इस प्रदेष के
किसानों की आर्थिक तरक्की में सरसों फसल का विषेश योगदान रहा।
राई-ंसरसों की उन्नत किस्मों एवं वैज्ञानिक तकनीकों के विकास और
उनको किसानों द्वारा अपनाये जाने से इस फसल की उत्पादकता में पिछले बीस वर्शो में 5 से 6 क्विटंल प्रति हैक्टेयर तक बढोत्तरी हुई है। इसके लिए राई-ंसरसों के वैज्ञानिक, विभिन्न विभागों के कृशि प्रसार कर्मी एवं किसानों की अथक मेहनत है जिसकी वजह से देष के खाद्य तेलों के उत्पादन में इस फसल का विषेश योगदान रहा है। लेकिन इसके साथ ही यह भी एक चिंता का विशय है कि बढती जनसंख्या एवं बदलती खाद्य षैली के कारण देष को करीब 76 हजार करोड का खाद्य तेलों का आयात करना पड़ रहा हैं । इसलिए देष में खाद्य तेलों की आवष्यकता पूरी करने एवं तिलहनी फसलों विषेशकर राई-ंसरसोें की उत्पादकता एवं उत्पादन बढाने के लिए विषेश प्रयासों के साथ आज एक नई तिलहन क्रांति की आवष्यकता है। यह बात सरसों अनुसंधान निदेषालय की स्थापना के रजत जयंती समारोह में भारतीय कृषि अनुसंधान परिशद नई दिल्ली के उपमहानिदेषक, उद्यान एवं फसल विज्ञान डॉ. आनंद कुमार सिंह ने प्रतिभागियों को सम्बोधित करते हुये कही।
इस अवसर पर निदेषालय के निदेषक डॉ. पी. के. राय ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और निदेषालय द्वारा किये गये कार्यों से अवगत करवाया उन्होने कहा कि तिलहनी फसलों की उत्पादकता एंव उत्पादन बढाने के लिए अनुसध्ंाान निदेषालय के साथ-ंसाथ कृषि विज्ञान केन्द्र, कृषि अनुसंधान केन्द्र, बीज निगमों एवं किसानों के समन्वित प्रयासों की आवष्यकता है।

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