योगी के फरमान क्यों नहीं चढ़ रहे परवान, अफसरों की कार्यशैली से विकास योजनाएं खटाई में

अशोक सिंह विद्रोही /कर्मवीर त्रिपाठी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश लगभग 20 माह की हो चुकी भगवा सरकार के मुखिया योगी आदित्यनाथ एक पखवारे से फिर एक्शन मूड में हैं। सरकार के मंसूबों व कानून व्यवस्था में पलीता लगा रहे अफसरशाही को दो टूक शब्दों में सुधर जाए नहीं तो हम सुधार देंगे की चेतावनी दे चुके योगी के लोक कल्याणकारी योजनाओं में हिला हवाली करने वाले अफसरों में खलबली मची हुई है। यही कारण है कि पंचम तल से लेकर सफेद हाथी बन चुके पुलिस महकमे में मुख्यमंत्री के आदेशों की फाइलें खंगाली जा रही हैं । वहीं सरकार तथा योगी के नीतियों को अपने करतूतों से शर्मसार करने को आमादा बीजेपी विधायकों की संख्या बढ़ते जाने से सत्ता और संगठन में सब कुछ ठीक नहीं का संदेश जनता में जाना शुभ संकेत नहीं है।
शीर्ष स्तर पर पहली बार हंटर चलाते हुए योगी ने बदहाल यातायात व्यवस्था को लेकर साफ तौर पर एडीजी ट्रैफिक को हटाने का फरमान दिया । गृह विभाग के सूत्रों की मानें तो अभी तक एडीजी के हटाए जाने का आदेश जारी ही नहीं हो सका है। एनेक्सी मीडिया सेंटर में होने वाले दैनिक प्रेस वार्ता के दौरान सोमवार को इस विषय में पूछने पर पुलिस प्रवक्ता ने एडीजी को हटाने की पुष्टि ही नहीं की। हकीकत में योगी ब्यूरोक्रेसी के जाल जंजाल में इस तरह उलझ गए हैं कि उनके आदेशों को अफसरशाही फाइलों में घुमा देती है। पुलिस महकमे में मनमाने कार्यशैली का यह ताजा उदाहरण है। जिसकी चर्चा सत्ता के गलियारों में दिन भर रही।
ज्यादा जोगी मठ उजाड़ वाली कहावत के साथ भाजपा गठबंधन के विधायक- मंत्री ही आए दिन सरकार के लिए मुसीबत का सबब बन रहे हैं। नानपारा से विधायिका पति पूर्व विधायक दिलीप बर्मा, लखीमपुर खीरी श्रीनगर विधायिका मंजू त्यागी, करनैलगंज गोंडा विधायक बावन सिंह के पुत्र वैभव सिंह जैसे तमाम भाजपा विधायक, पार्षद और नेताओं की करतूतें योगी की विकास नीतियों वन डिस्टिक वन प्रोडेक्ट जैसे जनउपयोगी योजना जिलों में पार्टी संगठन तथा अधिकारियों के बीच तालमेल की कमी से दम तोड़ रही है। वही अवैध खनन, ट्रांसफर -पोस्टिंग की मलाई के लिए आए दिन बढ़ती तकरार रामराज्य और सुशासन के पहियों में स्पीड ब्रेकर का काम करने लगती है । सत्ता के गलियारों में दखल रखने वाले जानकारों की मानें तो बड़ी तादाद में चुनकर आए सत्ता पक्ष के 324 विधायकों की अपेक्षाएं एवं क्षेत्रीय हनक बनाने की हड़बड़ाहट सरकार और अफसरशाही के सामंजस्य पर भारी पड़ रही है। वहीं भीतर खाने पार्टी संगठन के एक ताकतवर पदाधिकारी की समानांतर सरकार चलाने की बातें भी गाहे- बगाहे गूंजती रहती हैं।

लगभग डेढ़ दशक से सत्ता से दूर रही भाजपा की सबसे बड़ी समस्या बाहरी पार्टियों से आए नेताओं के पुराने चहेतो से मोह और जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा है। जिससे निजात पाने के लिए पार्टी संगठन से लेकर सरकार तक कुछ खास कर पाने में अभी तक नाकाम ही साबित हुई है।

योगी आदित्यनाथ के बीस महीनों के फरमानों की जमीनी हकीकत अगर टटोली जाए तो आधे से अधिक आदेशों पर अफसरों तथा पार्टी संगठन ने कोई रुचि नहीं दिखायी। दुनिया की सबसे अनुशासित बड़ी पार्टी का दावा करने वाली बीजेपी और सरकार के लोक कल्याणकारी योजनाओं को अमलीजामा पहनाने वाले ब्यूरोक्रेसी के लचर व महज खानापूर्ति के चलते ही पॉलिथीन बंदी, सुबह नौ से ग्यारह बजे तक दफ्तरों में अधिकारियों की उपस्थिति, बदहाल यातायात और कानून व्यवस्था जैसे तमाम कारगर आदेश सरकारी फाइलों और विपक्षी पार्टियों के लिए महज मुद्दे बनकर ही रह गए ।

पूर्वांचल के फायर ब्रांड नेता सीएम योगी आदित्यनाथ अफसरों के गुलाटी मार शैली से दशकों से वाकिफ हैं। यही वजह है कि योगी पंचम तल पर भी महत्वपूर्ण फाइलों पर स्वयं नोटिंग करते हैं। सरकार में सत्ता सुख की मलाई खा रहे मंत्रियों के बिना तैयारी केबिनेट प्रेस वार्ता के दौरान कई बार असहज स्थिति का सामना कर रही सरकार के लिए ऐसे मौकों पर प्रमुख सचिव सूचना अवनीश अवस्थी संकट मोचन हनुमान की भूमिका में आकर सरकार की किरकिरी होने से बचाते रहते हैं । अपने बड़बोले भोलेपन और चुपचाप लूट खसोट की कोशिशों में लगे योगी के मंत्री तथा घर में सामिल विरोधी ओमप्रकाश राजभर के बयान सरकार के लिए बडी मुसीबतें हैं। यही वजह है कि सरकार की हनक न तो अधिकारियों में ही चल पा रही है और ना ही पार्टी संगठन स्तर पर।

योगी पर खूब चलते हैं अखिलेश के तीर
मुख्यमंत्री योगी के आदेशों पर पैनी नजर रख रहे सपा मुखिया अखिलेश यादव आए दिन सरकार के फरमानों के बाल की खाल निकालकर ट्वीट और बयान जारी करने से नहीं चूकते। योगी को नसीहत के तौर पर कभी ब्यूरोक्रेसी को आफ्टर इनविजिबल सरकार कहने वाले अखिलेश मुख्यमंत्री को कुछ पता ही नहीं होने की बात को जिस ब्यगात्मक लहजे में बताते हैं वह योगी सरकार के विश्वासपात्र आला अधिकारियों के बीच की रस्साकशी की ओर इशारा करती है। राजनीति के माहिर खिलाड़ी बन चुके सपा सुप्रीमो यह बखूबी जानते हैं कि जनता का रूख कब और कैसे बदलता है।

=>
loading...
WP Twitter Auto Publish Powered By : XYZScripts.com
E-Paper