साहित्य साकेत: गांव में साहित्य की सुगंध बिखेरती एक निष्ठा

जौनपुर। गांव के परिवेश में जहा साहित्य का कोई दिशा बोध नही, कुंठा के कांटे जहा साहित्यिक अनुभूतियों को पग-पग पर मर्माहत करते रहते हो।ऐसे में साधना की निष्ठा से जुड़ा साहित्यकार अपने गांव में साहित्य का संग्रहालय बना कर ।वहा नब्बे दशक पुराने अखबार ,पत्र पत्रिकाओं के साथ दुर्लभ पुस्तकों का संग्रहालय खड़ा कर, गांव में साहित्य की सुगंध बिखेर दें, तो निश्चय ही उसका यह प्रयास स्तुत्य है।

जिला मुख्यालय से 45 किमी दूर डोभी के हरिहरपुर गांव में स्थित ‘साहित्य साकेत सेवा संस्थान’ पुस्तकालय एवं संग्रहालय इस बात का जीता जागता उदाहरण है। इस संस्था के संस्थापक वरिष्ठ साहित्यकार ,लेखक एवं पत्रकार स्व .स्वामीनाथ पाण्डेय का जन्म में 1930 में हुआ था।साहित्य से अनुराग के कारण कलमकार ने नही छोड़ी गांव की अड़ी। लिखने पड़ने का शौक प्रो.पाण्डेय को बचपन से ही था। बाल्यवस्था में ही पिता द्वारा बनवाये, कच्चे मकान की एक कोठरी में सजा रखी थीं कुछ पुस्तकें। यही था उनका वह बाल पुस्तकालय जिसने उनमे साहित्य के प्रति निष्ठा एवं अनुराग की प्रेरणा उत्पन्न की। यही से उन्हें साहित्य देवता की देहरी तक पहुँचने की राह मिली। प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद अनेक विश्वविद्यालयों की स्नातकोत्तर उपाधिया प्राप्त करने के उपरांत भी उनका स्वाध्यायी मन थका नही। उनकी इस अध्ययन शीलता का परिणाम था ‘साहित्य साकेत’। कुछ ही दिनों में यहा पुस्तकों की संख्या बहुत काफी हो गयी।उन्हें व्यवस्थित कर अपने उस बाल पुस्तकालय को उन्होंने संग्रहालय बना दिया और उसे नाम दिया ‘साहित्य साकेत’। यहां अनेक प्राचीन पत्र पत्रिकाएं, अखबार, पान्डुलिपिया, शोध सामग्रियां, लेखकों द्वारा हस्ताक्षरित पुस्तकें एवं अनेक सम्मानित साहित्यकारों के समय समय पर लिखे व्यक्तिगत पत्र संरक्षित हैं। 27अक्टूबर 2017को साहित्य साकेत का यह संस्थापक पहरुआ स्मृतिशेष हो गया।

विरासत बचाने की चिंता
ग्रामीण परिवेश में स्थापित साहित्य साकेत जैसे दुर्लभ संग्रहालय को बचाने की अति आवश्यकता है। बिना किसी सरकारी सहायता एवं सहयोग के वे उसे संभालते एवं उसकी देख रेख करते थे।गांव का परिवेश ,पुराना कच्चा मकान (अब पक्का) दीमक और पुस्तक कीटों की तत्परता ने यद्यपि बहुत कुछ नष्ट कर दिया है ।फिर भी जो कुछ शेष है, वह बहुत महत्वपूर्ण एवं रक्षणीय है।

साहित्य साकेत में हुआ था इन विभूतियों का आगमन
प्रो. स्वामीनाथ पाण्डेय द्वारा स्थापित साहित्य साकेत पर कभी पं. दीनदयाल उपाध्याय, पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी आये थे तो पूर्वमन्त्री देवराम, पूर्वमन्त्री महेंद्रनाथ पाण्डेय, पूर्व सांसद राजनाथ सोनकर, डा .कैलाशनाथ, प्रो. विनय कुमार, डा.मारकण्डे सिंह आदि राजनीतिज्ञों के अतिरिक्त डा. दूधनाथ चतुर्वेदी, डा.त्रिभुवन सिंह, महान साहित्यकार त्रिलोचन, डा.शम्भूनाथ सिंह, राम प्रताप त्रिपाठी, विजय देवनारायण शाही, रवीन्द्र भ्रमर, गीतकार अंजान, डा.श्रीपाल सिंह क्षेम, रूपनारायण त्रिपाठी आदि की उपस्थित चिर स्मरणीय है।

साहित्य साकेत में अध्यन से मिला मुकाम
विद्यार्थी जीवन में शोध कार्यो एवं अध्यन के लिए आनेवाले छात्रों की इस संस्था ने भरपूर मदद किया। नवगीत एवं दसकेतर नवगीतकारों पर शोध करने वाले डा. बृज किशोर एवं नवगीत में लोकचेतना विषय पर डा. इंदीवर ने इस संग्रहालय में अध्यन कर पी यच डी उपाधि प्राप्त किया।आई ए एस ईश्वरचंद श्रीवास्तव, विष्णुचंद श्रीवास्तव, डा .बदरीनाथ शास्त्री के अतिरिक्त क्षेत्र के दर्जनों युवकों ने यहा पठन पाठन कर उच्च मुकाम हासिल किया था। वर्तमान समय में इस महान संस्था की व्यवस्था एवं प्रबंधन कर रहे वारीन्द्र पाण्डेय पिछले महीने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक से मुलाकात कर संस्था को बचाए जाने हेतु ज्ञापन दिया था। उन्हें इस बात का दंश है कि शासन सत्ता एवं जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के कारण आर्थिक विपन्नता से जूझ रही यह संस्था भी न दम तोड़ दें। राज्यपाल श्री राम नाइक ने इसका दायित्व प्रदेश के शिक्षा मंत्री डा. दिनेश शर्मा को दे दिया है। अब तो इंतजार है कि इस संग्रहालय का दिन कब फिरेगा।

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