विचार मित्र

चुनाव के फेर में भाषा की मर्यादा भूलते नेता

राजेश माहेश्वरी

राजनीति गंदी है या राजनीतिक जुबान, यह एक अहम सवाल है, क्योंकि बीते कई सालों से देश में अक्सर राजनेताओं की जुबान बेलगाम होती नजर आ रही है। जिस तरह से देश के राजनेताओं की जुबान एक-दूसरे पर राजनीतिक वार करने के फेर में फिसलती नजर आ रही है, उससे एक और अहम सवाल पैदा होता है और वह यह कि आखिर देश के राजनेता बयानों की मर्यादा को क्यों लांघते जा रहे हैं? पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के बीच राजनीतिक सरगर्मी और सियासी बयानबाजी चरम पर पहुंच गई है। नेताओं के बीच तो आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल ही रहा है साथ ही पारिवारिक पृष्ठभूमि पर टिप्पणियां देखने को मिल रही हैं। कांग्रेस नेताओं ने प्रधानमंत्री की मां और पिता को लेकर टिप्पणी की है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता विलास मुत्तेमवार ने हाल ही में राजस्थान में कांग्रेस की एक जनसभा के दौरान कहा, ‘आपके (मोदी के) प्रधानमंत्री बनने से पहले आपको जानता कौन था? अब भी आपके पिता का नाम कोई नहीं जानता, लेकिन हर कोई कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के पिता का नाम जानता है।’

इस बयान से पूर्व प्रधानमंत्री मोदी की अत्यंत बूढ़ी मां के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किसी और ने नहीं, बल्कि उप्र कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर ने किया था। वह एक जिम्मेदार राजनीतिक पद पर हैं। कमोबेश संबंधों और बुजुर्गियत का तो ख्याल रखें। हम दुनिया के श्रेष्ठ लोकतंत्र होने का दावा करते हुए नहीं थकते। यह लोकतंत्र कैसे महान हो सकता है कि प्रधानमंत्री की मां, जो न तो राजनीति में हैं और न ही किसी पार्टी की विचारधारा से बंधी हैं, को सरेआम अपमानित किया जाए? क्या इस मवालीपन के व्यवहार को भी वोट मिलेंगे? तो यह श्रेष्ठ लोकतंत्र कैसे हुआ? ऐसे ही छोटे-छोटे उदाहरणों से लोकतंत्र या किसी व्यवस्था का क्षरण और पतन होता है। प्रधानमंत्री की मां वाकई राजनीति का ‘र’ तक नहीं जानतीं। उनसे कैसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता३!

अपने पिता का नाम बयानबाजी में घसीटे जाने पर प्रधानमंत्री ने इस बयान का जवाब मध्यप्रदेश के विदिशा में जनसभा को संबोधित करते हुए दिया। उन्होंने कहा, क्या कारण है कि मेरे पिता के देहांत के 30 साल बाद उन्हें राजनीति में घसीटा जा रहा है। कांग्रेस के नामदार कहते हैं कि मैं उनके परिवार के बारे में बोलता हूं। ऐसा इसलिए क्योंकि आपके परिवार के लोग प्रधानमंत्री रहे हैं, राजनीति में रहे हैं। मेरे परिवार का दूर-दूर तक राजनीति से कोई नाता नहीं। वह गरीबी का आम जीवन व्यतीत कर रहे हैं।’ असल में वोट के फेर में पड़े नेता भाषा की मर्यादा का शायद पूरी तरह भूल चुके हैं। विधानसभा चुनाव में तो भाषा की मर्यादा लांघते दिख रहे हैं

प्रधानमंत्री की मां देश की ‘प्रतीकात्मक मां’ मानी जाती हैं। क्या लोकतंत्र में प्रधानमंत्री की मां को गाली देकर भी सियासत की जा सकती है? माता जी की तुलना रुपए की कीमत से की गई है। कांग्रेस के चिल्ला-चोट वाले प्रवक्ता इस मुद्दे पर जवाब देने के बजाय वे अपशब्द गिनाने लगते हैं, जो खुद मोदी के मुंह से निकले हैं या उनके सहयोगी मंत्रियों ने इस्तेमाल किए हैं। हमारा सरोकार उनसे भी है, लेकिन मां का संदर्भ अभूतपूर्व और अस्वीकार्य है। क्या प्रधानमंत्री की मां डालर-रुपए की कीमत तय करती हैं? क्या पेट्रोल-डीजल की कीमतें भी वही तय करती रही हैं? क्या नोटबंदी का निर्णय माता जी ने लिया और प्रधानमंत्री मोदी ने उसे लागू किया? बूढ़ी मां को प्रधानमंत्री आवास में उनके पीएम पुत्र ने व्हील चेयर पर खुद ही घुमाया था। क्या वह भी अनैतिक था? अपशब्दों का इस्तेमाल तब भी किया गया। यह कैसा लोकतंत्र और कौन-सी सियासत है? यह कांग्रेस की बौखलाहट और हताशा है। अलबत्ता चुनावों के मुद्दे तो तय हो चुके हैं। इससे पहले मुंबई में कांग्रेस नेता संजय निरूपम ने भाषा की मर्यादा लांघते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विवादित टिप्पणी की थी।

एक समय था, जब 31 अक्टूबर, 1984 को पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने विवादित बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा कि श्जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती थोड़ी हिलती ही है। उस समय उनके इस बयान को राजनीतिक मर्यादा के विपरीत माना गया था और उसकी तीव्र भर्त्सना की गयी थी। राजनीति के जानकार बताते हैं कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्रीत्व काल ही की बात है, जब उस समय बक्सर के सांसद और केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री केके तिवारी ने विवादित बयान दिये थे। उन्होंने उस समय दूरदर्शन पर केवल राजीव गांधी से संबंधित खबरों को दिखाये जाने पर विपक्ष के सवालों के जवाब में कहा था-‘राजीव गांधी सुंदर हैं और विपक्ष बदसूरत।’ उस समय भी उनके इस बयान की काफी निंदा की गयी थी।

राजनीति के जानकार यह भी बताते हैं कि 20वीं सदी के भारत में अगर किसी नेता की जुबान फिसलती भी थी, तो उसमें शालीनता बरकरार रहती थी, लेकिन 21वीं सदी के भारत और खासकर बीते दो-तीन सालों के दौरान राजनेताओं की जुबान में कड़वाहट और फिसलन में फूहड़ता अधिक समा गयी है। वे बताते हैं कि जिस समय आज के केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भाजपा के अध्यक्ष हुआ करते थे, तब उन्होंने राजद सुप्रीमो लालू यादव और सपा प्रमुख मुलायम सिंह के बारे में कहा था-‘ये दोनों सोनिया गांधी के तलवे चाटते थे।’ उनके इस बयान के जवाब में आज के केंद्रीय मंत्री और भाजपा के नेता एवं तब के राजद नेता रामकृपाल यादव ने कहा बिहार में प्रचलित मुहावरा है, छछूंदर के माथे चमेली का तेल।

ऐसा व्यवहार असभ्य, अभद्र, अश्लील, अनैतिक तो है, लेकिन बेहद अलोकतांत्रिक और शर्मनाक भी है। प्रधानमंत्री मोदी को गालियां देने की कांग्रेस की एक परंपरा है और वह सिलसिला जारी है, क्योंकि मां को अपमानित करने के साथ-साथ प्रधानमंत्री को भी ‘महामनहूस’ कहा गया है। बहरहाल इसका विश्लेषण बाद में करेंगे। वैसे भी हम इस मुद्दे पर कई बार टिप्पणी कर चुके हैं। दरअसल लोकतंत्र और राजनीति में भाषा की मर्यादा और संबंधों का सम्मान अनिवार्य है।

कांग्रेस के ही महासचिव सीपी जोशी ने परोक्ष शब्दों में प्रधानमंत्री को ‘पिछड़ा’ करार देकर इस मानवीय व्यवहार का उल्लंघन किया है। जोशी ने सवाल किया है कि उमा भारती लोध हैं, साध्वी ऋतंभरा न जाने किस जाति की हैं और प्रधानमंत्री का भी धर्म क्या है, लेकिन वे हिंदू धर्म की बात करते रहते हैं। जोशी ने व्याख्या दी कि हिंदू धर्म की जानकारी सिर्फ ‘पंडितों’ (ब्राह्मणों) को ही होती है। वाह कैसा ब्राह्मणवाद है३! क्या लोध, यादव, गुर्जर, कुशवाहा और मोदी सरीखी छोटी जातिवाले ‘ब्राह्मण’, यानी शिक्षित और ज्ञानवान, नहीं हो सकते? बेशक राहुल गांधी की आपत्ति के बाद सीपी जोशी ने अपने कथन पर खेद जताया, लेकिन तीर तो कमान से निकल चुका था।

ऐसा नहीं है कि भाषा की मर्यादा कोई एक पार्टी का नेता लांघता है। इस हमाम में लगभग सभी दल नंगे हैं। कांग्रेस और भाजपा समेत तमाम दलों के नेता सियासी नफे-नुकसान के हिसाब से व्यक्तिगत कीचड़ उछालने से लेकर अमर्यादित भाषा का प्रयोग करने में तनिक भी परहेज नहीं करते हैं। चुनावी मौसम में नेताओं की जुबान में अधिक तेजी देखने को मिलती है। वास्तव में हमारे देश मे कई ऐसे दिमागी दिवालियेपन के शिकार हैं जो स्वस्थ आलोचना और गाली गलौज में अंतर नही समझ पाते, ऐसे लोग इसी गाली गलौज से देश के प्रधानमंत्री का अपमान कर के अपनी रोजी रोटी भी चला रहे है। आलोचना से किसी को भी दिक्कत नही होती क्योकि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आलोचना बेहद आवश्यक हैं पर जब आलोचना में नफरत हावी हो जाये भाषा निम्नतर हो जाये तो यह आलोचना नही बल्कि अपमान हैं और ऐसा करने वाले लोगो को तमाम विपक्ष और एन्टी मोदी ब्रिगेड का भी समय समय पर साथ मिलता रहा है। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति से आपके विचारधारा को लेकर गहरे मतभेद हो सकते हैं और उसकी आलोचना करने कभी आपको पूरा अधिकार है, पर सभ्य समाज मे प्रधान मंत्री के पद पर आसीन व्यक्ति के लिए ऐसी भाषा !

यह कैसा लोकतंत्र और कांग्रेस की सियासत है कि जाति और धर्म को भुनाकर वोटों का जुगाड़ किया जा रहा है? क्या 21वीं सदी में भी देश के सामाजिक और जहरीले विभाजन की कोशिश की जाती रहेगी? बहरहाल मप्र में प्रचार करने के दौरान प्रधानमंत्री मोदी अपनी मां को अपमानित करने के मद्देनजर आहत दिखाई दिए। उन्होंने सवाल भी किया कि क्या ऐसा करने से कांग्रेसियों की जमानत बच जाएगी? बहरहाल यह तो चुनाव तय करेंगे कि 11 दिसंबर को जनादेश कैसे आते हैं, लेकिन हमारी चिंता लोकतंत्र को लेकर है। लोकतंत्र है, तो चुनाव भी हैं, लेकिन जरूरत सियासी मानसिकता बदलने की है। राहुल कांग्रेस को इस पहलू पर गंभीर चिंतन करना चाहिए। लोकतंत्र में नेताओं का मर्यादित आचरण और भाषा इसके अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक मानी जाती है।

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