उत्तर प्रदेशलखनऊ

सियासी चौसर में शिवपाल – राजा की पारी, बीजेपी या सपा-बसपा गठबंधन पर भारी

किसका नफा किसका नुकसान,चाचा-राजा का अरमान

अशोक सिंह विद्रोही /कर्मवीर त्रिपाठी
राजनीति का अखाड़ा और यूपी का सियासी पारा दोनों की थाह नहीं। यूपी में दशकों से सियासी अहम की संतुष्टि और बड़े वोट बैंक में सेंधमारी को लेकर पार्टी बनाओ वोट ,ओट पाओ और सत्ता में अपनी पैठ जनाओ का खेल चल रहा है । चुनावी मौसम आने से पहले ही सूबे में नए दलों के बादलों का बनना शुरू हो चुका है। भतीजे अखिलेश ने चाचा से साइकिल की हैंडल छीनी तो शिवपाल ने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनायी। राजा कुंडा को सियासी हनक में कमी का ख्याल आया तो उन्होंने भी पार्टी का ऐलान अपनी अजीज दुश्मन मायावती के बनवाए रमाबाई अंबेडकर मैदान में खचाखच भरी भीड़ के बीच कर दिया। वहीं दूसरी तरफ सूबे में लगभग 19 पार्टियों के छोटे समूह का गठबंधन भी सत्ता के संग्राम में कूदने को बेताब है।

दिल्ली की दौड़ का निर्णय यूपी करता है। जिसकी सियासत की थाह पाने के चक्कर में कई पार्टियां बनी और डूब गयी कई बड़े सियासी चेहरे सत्ता की धुरी बने तो कुछ को अपनी पहचान तक गंवानी पड़ी। सुनहरे भविष्य का सपना जनता को दिखाने वाले नरेश अग्रवाल व हरिशंकर तिवारी की पार्टी लोकतांत्रिक कांग्रेस, कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी, अमर सिंह की राष्ट्रीय लोक मंच, बेनी प्रसाद वर्मा की समाजवादी क्रांति दल,स्0 नारायण दत्त तिवारी द्वारा बनाई गई तिवारी कांग्रेस, डॉक्टर अयूब की पीस पार्टी अब अतीत की बातें हो गई है। वजह साफ है सियासी नफा नुकसान के हिसाब से रातों-रात दल बनाकर- भीड़ जुटाकर किसी खास दल से छिटक रहे वोट बैंक को साधने का यह सबसे कामयाब नुस्खा बन चुका है। जिसके जाल में वोटर चाहे अनचाहे फस ही जाता है।

यूपी में यह फॉर्मूला दशकों से खेला जा रहा है। माहिर खिलाड़ी नेता बखूबी जानते हैं कि यूपी के जातीय वोट बैंक के उंट को किस करवट बैठाना है। तकरीबन 8 फीसद यादव, 3 फीसदी कुर्मी, 10 पीसदी ब्राह्मण व 8 फीसद ठाकुरों का वोट समूह शह और मात के शतरंज में हारी बाजी को जिताने में बहुत बड़ी भूमिका अदा करता है।
लगभग ढाई दशक से बिना किसी पार्टी के विधानसभा का सुख भोग रहे रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को अचानक क्या जरूरत पड़ी कि उन्हें रजत जयंती सम्मान समारोह के बहाने पार्टी बनाने की घोषणा करनी पड़ गयी। एससी एसटी एक्ट के बहाने बीजेपी के गोदी से छिटक कर दूर सवर्ण वोटरों को जाते देख राजा भैया ने सियासी दांव खेलने का फैसला किया। वजह साफ है 90 के दशक से लेकर आज तक हर सरकार में राजा भैया की हनक और उनकी एक अलग पहचान का कायल पूरा यूपी रहा है। साल 2007 की सरकार को छोड़ दें तो ऐसी कोई सरकार नहीं रही है जिसमें राजा भैया का दखल न रहा हो या राजा भैया के बिना वह सरकार चल पायी हो। जानकारों की मानें तो पिछली सपा सरकार के जमाने से ही राजा भैया और सपा मुखिया अखिलेश यादव के बीच मनमुटाव का बीज पनपने लगा था। यही वजह रही कि बीते राज्यसभा तथा विधान परिषद के चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी मुखिया के लाख अपील करने के बावजूद राजा भैया अपने समर्थक विधायकों समेत भाजपा खेमे में देखे गए। अपना स्वयं का तथा अपने समर्थक विधायकों का वोट भी भाजपा खेमें को ही दिलवाया ।इससे अखिलेश खासा परेशान और नाराज भी हुए। काफी दिनों से सत्ता के गलियारे में खामोशी और बेचैनी के चादर को ओढे बैठे राजा भैया के लिए एससी एसटी एक्ट मानो संजीवनी बूटी का काम कर गया। राजनीतिक पंडितों की मानें तो भले ही शिवपाल यादव या राजा भैया द्वारा पार्टी बनाने को लेकर लोगों में भाजपा की फिक्सिंग की बात कही जा रही हो। लेकिन एक बात तो पक्की है कि इन नए-नए पार्टियों के गठन से सपा और बसपा के गठबंधन पर जरूर कुछ न कुछ असर पड़ेगा।

राजा भैया ने एससी-एसटी एक्ट पर केंद्र सरकार के विधेयक को गलत बताकर अगड़ी जातियों को लामबंद करने की कोशिश की तो वहीं दलितों को समाज का अभिन्न अंग बताकर उन्हें साधने का दाव भी खेला। कुण्डा लिखेगा रजनीति की कुंडली के अस्त्र से राजा की सियासत और विरासत का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता हैं। सियासी पंडितों की माने तो रैली के दौरान प्रतापगढ़ के एक बड़े हिस्से के घरों में ताले पड़े थे ।वज़ह थी राजा की राजनीति चमकाने के लिए लखनऊ की दौड़ में शामिल होना।

रजत जयंती समारोह पर नयी पार्टी बनाने की घोषणा के बाद राजा भैया आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गये हैं। एक ओर जहां वह बीजेपी से नाराज सवर्णों को लामबंद करने में जुटे हैं, वहीं खास रणनीति के तहत सपा-बसपा से नाराज नेताओं को भी साथ ला रहे हैं। राजनीतिक जानकारों की मानें तो लोकसभा चुनाव में भले ही राजा भैया अपने दम पर समूचे सूबे में ज्यादा कमाल न कर सकें, लेकिन वह कुछ खास दलों का सियासी समीकरण जरूर गड़बड़ा सकते हैं, जो कभी उनके हम राह हुआ करते थे। सूत्रों की माने तो लखनऊ में भले ही राजा भैया ने एक लाख के करीब समर्थक इक्ट्ठे कर लिये हों, लेकिन यह भीड़ मतदाताओं में तब्दील हो पाएगी, ये अभी दूर की कौड़ी है क्योंकि आम चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है।

बीजेपी को लेकर रघुराज प्रताप सिंह का रुख भले ही भविष्य के गर्त में हो, लेकिन चित भी अपनी और पट भी अपनी में माहिर बीजेपी राजा भैया के इस ऐलान को अपने लिए एक मौके के तौर पर देख रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा चुनाव में अगर राजा भैया भाजपा का समर्थन करते हैं तो एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के कारण जिस वोट बैंक के छिटकने का आसार बीजेपी को सता रहा है, वह राजा भैया के जरिये भगवा खेमे में ही रह सकता है। चर्चा है कि भारतीय जनता पार्टी यूपी के दो रजनीतिक धुरंधरों राजा भैया और शिवपाल यादव के सियासी महत्वकांक्षा के जरिये यूपी में सपा-बसपा के संभावित गठबंधन से निपटने की रणनीति पर भी फोकस कर रही है।

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