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जानिए, आख़िर अब तक कोई भारतीय प्रधानमंत्री ने इसराइल का दौरा क्यों नहीं किया

नई दिल्ली। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन दिवसीय दौरे पर इसराइल पहुंच गए हैं। इसराइल प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने मोदी का गर्मजोशी से तेल अवीव एयरपोर्ट पर स्वागत किया।

बीते 70 साल में इसराइल का दौरा करने वाले नरेंद्र मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री है।. इस बात को ज़ोर शोर से प्रचारित भी किया जा रहा है, लेकिन सवाल ये है कि आख़िर अब तक कोई भारतीय प्रधानमंत्री ने इसराइल का दौरा क्यों नहीं किया।

इस सवाल के जवाब में जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में इसराइली भाषा हिब्रू के सहायक प्रोफ़ेसर खुर्शीद इमाम कहते हैं, “भारत और इसराइल के बीच राजनयिक संबंधों को बने अभी 25 साल ही हुए हैं। ऐसे में बहुत लंबा वक्त लगा हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता।” लेकिन भारत-इसराइली संबंधों के जानकार और जवाहर लाल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आफ़ताब कमाल पाशा के मुताबिक इसराइल जाने से भारतीय प्रधानमंत्री अब तक बचते रहे हैं।

इसकी वजह बताते हुए पाशा कहते हैं, “उसकी सबसे बड़ी वजह भारत की अपनी घरेलू स्थिति रही है। इसराइल से संबंध जब शुरू हुए उसके बाद देश में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हो गया था और कोई भी दल देश के मुसलमानों को नाराज़ नहीं करना चाहता था।”

दरअसल इसराइल और फ़लीस्तीनी क्षेत्र का विवाद भारत की आज़ादी से भी पुराना है और भारत हमेशा से अरब देशों का हिमायती रहा है। महात्मा गांधी इसराइल और फ़लीस्तीन के झगड़े पर कई बार ये कह चुके थे उनकी सहानुभूति यहूदियों के साथ है लेकिन फ़लीस्तीनी क्षेत्र तो अरब के लोगों का ही है और इस विवाद का कोई सैन्य हल नहीं होना चाहिए।

1947 में भारत की आज़ादी के बाद जवाहर लाल नेहरू ने इसराइल के प्रति महात्मा गांधी के रुख़ को कायम रखा। यही वजह रही कि अल्बर्ट आइंस्टीन के अनुरोध के बावजूद भारत ने इसराइल के गठन के प्रस्ताव का विरोध किया था।

29 मई, 1947 को भारत ने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा की बैठक में फ़लीस्तीन के विभाजन का विरोध किया था। भारत के विरोध के बाद भी 14 मई, 1948 को इसराइल का गठन हुआ।
दरअसल विश्लेषकों की राय के मुताबिक ये संयोग था कि जब धार्मिक आधार पर इसराइल और फ़लीस्तीनी क्षेत्र का विभाजन हो रहा था, उसी दौर में धर्म के आधार पर भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ था।

पाकिस्तान के साथ सीमा पर तनाव बना हुआ था, आज़ादी के तुरंत बाद युद्ध भी हो गया था, लिहाजा नेहरू को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अरब देशों के सहयोग की ज़रूरत भी थी। हालांकि भारत ने सितंबर, 1950 में इसराइल को मान्यता दे दी। लेकिन भारत की विदेश नीति फ़लीस्तीनी लोगों के पक्ष में रही। प्रोफेसर ख़ुर्शीद इमाम के मुताबिक, “दरअसल उस दौर में हमारी प्राकृतिक तेल और ऊर्जा के मामले में ज़रूरत के हिसाब से भी हमें अरब देशों पर निर्भर रहना पड़ रहा था।”

लेकिन भारत चीन के बीच 1962 में युद्ध शुरू हुआ तो भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने तत्कालीन इसराइली प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन को पत्र लिख कर हथियारों की आपूर्ति का अनुरोध किया था। इसराइली अर्काइव्स के इंटरनेट पर मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक बेन गुरियन ने पहले नेहरू को खत लिखकर मदद की पेशकश की थी।

नेहरू ने जवाबी ख़त में समुद्री जहाज़ से हथियार भेजने का अनुरोध तो किया लेकिन कहा कि जहाज़ पर इसराइली झंडा ना हो ताकि अरब देश नाराज़ ना हों। गुरियन ने इसके लिए मना कर दिया था।

इसके बाद 1971 के भारत-पाकिस्तान के युद्ध के दौरान भी इसराइल भारत की मदद के लिए सामने आया था. श्रीनाथ राघवन की किताब ‘1971’ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सलाहकारों के हवाले कहा गया है, “इसराइल उस वक्त हथियार देने की स्थिति में नहीं था लेकिन तब इसराइल की प्रधानमंत्री गोल्डा मायर ने भारत को हथियारों का जहाज़ भेजा था. बदले में गोल्डा मायर भारत के साथ राजनीतिक रिश्ता चाहती थीं।”

भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने बातचीत में बताया, “1977 जनता पार्टी की सरकार के दौरान मैंने इसराइल के साथ संबंधों को बेहतर बनाने की बात कही थी, तब प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई तैयार थे, लेकिन विदेश मंत्री के तौर पर अटल जी ने कहा था कि 25 अरब देश नाराज़ हो जाएंगे।”

बहरहाल, भारत और इसराइल के बीच राजनयिक संबंधों की शुरुआत 29 जनवरी, 1992 में जाकर हुई। 1971 में इंदिरा के विदेश मंत्री रहे पीवी नरसिम्हाराव जब प्रधानमंत्री बने तब। 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान भारत और इसराइल का सैन्य सहयोग बढ़ा. 2000 में भारत के गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी और विदेश मंत्री जसवंत सिंह इसराइल के दौरे पर गए थे।

आफ़ताब कमाल पाशा कहते हैं, “वाजपेयी के समय ही भारत और इसराइल के रिश्ते बेहतर होने लगे थे, लेकिन तब वो गठबंधन की सरकार थी। मोदी जी को पूरा बहुमत मिला है लिहाजा वो उस वक्त की दक्षिणपंथी नीति को बढ़ावा दे रहे हैं।”

अटल बिहार वाजपेयी की सरकार के समय में अरियल शेरॉन 2003 में भारत का दौरा करने वाले पहले इसराइली प्रधानमंत्री बने थे। तेल अवीव में हुए चरमपंथी हमले के चलते शेरोन को दौरे के बीच से ही लौटना पड़ा था। इसी दौरे पर उनके उप प्रधानमंत्री योसेफ़ लापिड ने माना था कि इसराइल भारत को हथियारों की आपूर्ति करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है।

2004 में मनमोहन सिंह की सरकार आ गई और फिर से भारत का इसराइल के प्रति रूख संतुलित हो गया। आफ़ताब कमाल पाशा के मुताबिक बीते 25 सालों में ये पहला मौका है जब इस तरह के हालात बने कि कोई भारतीय प्रधानमंत्री इसराइल का दौरा कर सकें। वे कहते हैं, “सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, तुर्की और मिस्र जैसे देशों का नज़रिया अब इसराइल के प्रति बदला है और भारत भी इन लोगों के साथ शामिल है।”

आफ़ताब कमाल पाशा की इस राय से ख़ुर्शीद इमाम सहमत दिखते हैं. वे कहते हैं, “नरेंद्र मोदी एक तरफ़ तो सऊदी अरब का दौरा करते हैं, संयुक्त अरब अमीरात के सुल्तान को गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बनाते हैं और इसराइल का दौरा भी करते हैं।”

पाशा ये कहते हैं कि इन क़दमों के ज़रिए मोदी परंपरागत सोच को बदल रहे हैं, एक तो वे दिखा रहे हैं कि उन्हें मुस्लिम देशों से कोई आपत्ति नहीं है और दूसरी ओर इसराइल जाकर वे ये भी दिखा रहा हैं भारतीय मुसलमानों नाराज़गी का कोई असर नहीं पड़ रहा।

पाशा के मुताबिक ये सब इसलिए भी संभव हो रहा है क्योंकि अमरीका यही चाहता है। वे कहते हैं, “अमरीका ने मध्य पूर्व एशिया में ईरान-रूस-चीन-इराक के सामने उसने सऊदी अरब-संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र के समूह को खड़ा कर दिया है।”

ख़ुर्शीद इमाम कहते हैं, “बदलते समय में अरब देशों की ताक़त कमज़ोर हुई है और तेल एवं ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत भी आ गए हैं, लिहाजा भारत अब इसराइल से संबंधों को अफोर्ड कर सकता है।”

 

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