विचार मित्र

राजस्थान में कांग्रेस की बढ़त रोकने के लिए मोदी का पासा


बाल मुकुन्द ओझा

सात दिसंबर को होने जा रहे राजस्थान विधान सभा के चुनावों पर देशभर की निगाह टिकी हुई है। यहाँ हर रोज सत्ता के समीकरण बदल रहे है। चुनावों की घोषणा के समय लगभग सभी खबरिया चैनलों के सर्वे में निर्विवाद रूप से कांग्रेस की बढ़त दिखाई गई थी। सत्ता विरोधी लहर का दबदबा भी स्पष्ट रूप से देखा गया था। मगर जैसे जैसे चुनावों की सरगर्मी बढ़ी वैसे वैसे लोगों का रुझान भी बदलने लगा। टिकटों के लिए सत्ता की दावेदार कांग्रेस और भाजपा में मची मारकाट से मतदाताओं में इन पार्टियों के प्रति कोई अच्छा सन्देश नहीं गया। तीसरा मोर्चा भी कोई सशक्त आकार नहीं ले पाया। घनश्याम तिवाड़ी और हनुमान बेनीवाल का मोर्चा ले देकर एक दर्जन सीटों पर दोनों मुख्य दलों को टक्कर देने की स्थिति में पहुँच पाया है। वामपंथी और बसपा भी अलग अलग चुनाव लड़कर बेहतर स्थिति में नहीं आ पाए है। निर्दलीय चुनाव लड़ रहे भाजपा और कांग्रेस के बागी भी एक दर्जन सीटों पर त्रिकोणात्मक मुकाबला कर पाए है। कुल मिलकर देखा जाये तो दोनों मुख्य दलों के इतर चुनाव लड़ रहे छोटे दल और बागी दो दर्जन सीटों पर अच्छी स्थिति में है।

भाजपा के पक्ष में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के धुँआधार प्रचार के बाद एक माह पूर्व कांग्रेस को 150 से 160 सीटें देने वाले रणनीतिकार और सट्टा बाजार अपनी पूर्व घोषणाओं को बदलने में मजबूर हो गए है। आज की स्थिति में सट्टा बाजार में कांग्रेस की सुई 120 पर आकर अटक गई है। भाजपा भी अपनी स्थिति में सुधार कर 70-75 तक पहुँच गई है।

पेट्रोल और डीजल के गिरते भावों ने भी भाजपा को राहत पहुंचाई है। महंगाई भी कमोवेश पहले के मुकाबले घटी है। हालाँकि बेरोजगारी और किसानी के मुद्दों पर भाजपा घिरती हुई नजर आरही है। जनहितों के बदले राजनीतिक पार्टियां जाति और धर्म की बातें कर मतदाताओं को लुभाने में लगी है। चुनावी प्रचार अपने निम्न स्तर तक जा पहुंचा है। जनता के वास्तविक मुद्दे गौण हो रहे है। मतदान में अब तीन दिन शेष रहे है। कांग्रेस और भाजपा अपने अपने जीत के दावे कर रही है। चुनाव में सभी दलों ने अपनी सम्पूर्ण ताकत झोंक दी है। इसी बीच 1957 से अब तक के समस्त चुनावों पर पैनी नजर रखने वाले सट्टा बाजार के एक महारथी ने अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया की कोई आश्चर्य नहीं होगा राजस्थान अपने 1993 के इतिहास को एक बार फिर दुहराए।

गौरतलब है 1993 के विधान सभा चुनाव में भाजपा को 95 और कांग्रेस को 76 सीटें हासिल हुई थी। उस समय भाजपा नेता भैंरोसिंह शेखावत ने निर्दलीय विधायकों के सहयोग से प्रदेश में भाजपा की सरकार बनाई थी जो पूरे पांच साल चली। हालाँकि फिलहाल सरकार विरोधी लहर के कारण कांग्रेस की बढ़त दिखाई दे रही है मगर मोदी के करिश्में से भाजपा की स्थिति पहले के मुकाबले सुधरी है। 1993 में भाजपा सत्ता के नजदीक पहुंची थी और आज स्थिति उसके ठीक उलट है। जन रुझान आज कांग्रेस के पक्ष में दिखाई दे रहे है।

राजस्थान के पिछले पांच चुनावों पर गौर करें तो पाएंगे यहाँ हर बार सरकार बदलती रही है। 1993 में भाजपा, 1998 में कांग्रेस, 2003 में भाजपा, 2008 में कांग्रेस सत्ता में आ गई। इसके बाद 2013 में फिर भाजपा ने कब्जा कर लिया था। अगर इतिहास अपने को दोहराता है तो ये माना जा सकता है कि कांग्रेस फिर से इस बार सत्ता पर काबिज हो सकती है।

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