प्रकृति का हरेक रूप पुराने का विस्तार है

हृदयनारायण दीक्षित

नया पुराने का रूपान्तरण है। प्रकृति का हरेक रूप पुराने का विस्तार है। प्रकृति सदा से है। समय बोध में हम वर्तमान को नया कहते हैं। नया देखना वस्तुतः काल बोध का परिणाम है। प्रकृति का हरेक अंग और अंश गतिशील है। इस गति की शाश्वत विधि है। गति इसी विधि का अनुसरण करती है और हम सबको समय का अनुभव होता है। अस्तित्व की गतिविधि के नियम शाश्वत हैं। आस्था के अनुसार ईश्वर ने अस्तित्व बनाया है। आस्तिक चित्त मानेगा कि अस्तित्व के अंगों की गति के नियम भी ईश्वर ने ही बनाए हैं।

अलबर्ट आइंस्टीन प्रख्यात वैज्ञानिक थे। उनका एक प्रश्न प्रसिद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञानी स्टीफेन हाकिंग ने अपनी चर्चित किताब ‘‘दि थ्योरी ऑफ इवरीथिंग’’ (अंग्रेजी संस्करण पृष्ठ 123) में उद्धृत किया है। प्रश्न यह है कि ‘‘ब्रह्माण्ड निर्माण के समय ईश्वर के समक्ष क्या विकल्प थे?’’ प्रश्न बड़ा है। शाश्वत नियम पहले से थे तो क्या ईश्वर नियमों में फेरबदल कर सकता था? स्टीफेन हाकिंग ने आईस्टीन के उद्धरण के बाद जोड़ा है ‘‘ईश्वर के पास प्राथमिक स्थितियाँ चुनने की स्वतंत्रता नहीं थी।” ऋग्वेद के एक सूक्त में विश्वकर्मा नाम के देवता हैं। ऋषि उनसे स्तुति करते हैं और प्रश्न करते हैं कि सृष्टि निर्माण के समय आप कहाँ बैठे? तब स्थान क्या था? निर्माण सामग्री कहाँ से लाए? आदि आदि। स्टीफेन हाकिंग प्रकृति में शाश्वत नियम खोज रहे थे। ऋग्वेद के ऋषि ने उन नियमों को ‘ऋत’ कहा हैं हाकिंग 21वीं सदी में जिज्ञासु थे। ऋग्वेद का ऋषि ईसा के 4 हजार वर्ष पहले।

ऋग्वेद का ऋत बड़ा प्यारा है। नदियां ऋतावरी हैं। नियमों में बहती हैं। अग्नि ऋत धारण करते हैं। ऋतस्यक्षतः हैं। प्रकृति की सभी शक्तियां सूर्य, चन्द्र और ग्रह नक्षत्र ऋत नियमों का पालन करते हैं। ऋत या ब्रह्माण्ड के नियम सदा से हैं। इन्ही नियमों के भीतर प्रकृति परिवर्तनशील है। गतिशील भी हैं। भारतीय साहित्य सृजन में भी ऋत का प्रवाह दिखाई पड़ता है। ऋग्वेद का काव्य ऋत की प्रथम उपलब्ध शब्द अभिव्यक्ति है। ऋषि इसके पहले की परंपरा का भी उल्लेख करते हैं। वैदिक संहिताओं के बाद ब्राह्मण, आरण्यक और विपुल उपनिषद् साहित्य हैं। यह साहित्य पुराने का पुनसृजन है। काल के प्रवाह में नया और ऋत के प्रभाव में शाश्वत पुरातन। चिरंतन और नूतन। रामायण और महाभारत दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सृजन और महाकाव्य हैं। इनमें घटनाएं बदल गई हैं। दिक्काल के प्रभाव में पात्र बदल गए हैं। ऋग्वेद के विष्णु नए रूप में श्री राम और श्री कृष्ण हो गए हैं। ऋत अपनी आचार सारिणी में धर्म हो गया है। भाषा और परिभाषा भी बदल गई है लेकिन शाश्वत नियमों के आदर्श और मूल्य बोध जस के तस हैं। सर्जक उन्हीं नियमों को नये रूप में प्रस्तुत करते हैं।

भक्तिकाल शाश्वत के प्रति गाढ़े प्रेम रसायन से भरा-पूरा है। अभिव्यक्ति बिल्कुल ताजी। गीत, काव्य का प्रवाह सरस ललित। लेकिन शाश्वत जस का तस हैं। उपनिषदों का ‘रसों वैसः-वह रस’ यहा भी प्रवाहित है। आधुनिक काल के कवि ‘निराला’, डा0 रामधारी सिंह, धर्मवीर भारती या अन्य महानुभाव अपनी प्रेम अभिव्यक्ति के लिए वैदिक काल की उर्वसी के साथ चलते हैं। या श्रीमद्भागवत की राधा के संग। शाश्वत आधुनिक काल तक प्रवाहित है। निराला ‘राम की शक्तिपूजा’ और तुलसीदास में रमते हैं। प्राचीनता नवसृजन में प्रकट होती है। ओशो रजनीश प्रख्यात दार्शनिक थे।

उन्होंने कठोपनिषद गीता, कबीर, मीरा आदि प्राचीन दार्शनिक प्रतीकों तत्वों का सहारा लिया। चीनी दार्शनिक लाउत्सु की ‘ताओ’ धारणा का उपयोग भी किया। इस प्रवचन का नाम ताओ उपनिषद् रखा। मौलिक सृजन की बातें बहुत चलती हैं। मित्र ‘मौलिक’ शब्द पर ध्यान नहीं देते। मौलिक मूल से जुड़ा है और मूल है भारतीय तत्वज्ञन का ऋत। सदा से विद्यमान रीति। तुलसी के अनुसार रघुकुल रीति। सूर्य, चन्द्र और अग्नि, जल का मूल गुण है। दिक्काल के प्रवाह में रूप अभिव्यक्ति बदल जाती है। हमारा मन बार-बार प्रश्न करता है कि यहां नया क्या है? पुराना क्या है? क्या बार-बार रूप प्रतिरूप आता जाता यह शाश्वत अस्तित्व नया या पुराना हो सकता है?

भारतीय अभिव्यक्ति का सुंदर तत्व दर्शनीय है। इसका सम्बन्ध रूप से है। इस अभिव्यक्ति का शिव तत्व श्रेयस् है। शिव सदा से है। अजन्मा और अज। पुराणों में वही शिव रूप है। रूप का भी मूल होता है। मूल का दर्शन आसान नहीं। रूप चाक्षुस है, आंख और प्रकाश की सहायता से दर्शनीय है लेकिन मूल देखने के लिए अन्तःकरण की अनुभूति चाहिए। यजुर्वेद में एक साथ 6 मंत्रों के अंत में ‘तन्मे मनः शिवसंकल्प अस्तु’ आया है। सभी मंत्रों का सारांश है-यह हमारा मन यहाँ, वहाँ, वन, पर्वत, धरती, आकाश से भागता है। ऐसा हमारा मन शिवसंकल्प से भरा-पूरा हो। मन संकल्प का केन्द्र है। मूल है। इसे शिव से भरने की स्तुति रम्य है। प्रश्न उठता है कि ये शिव क्या है? ये शिव वैयक्ति सत्ता नहीं है। यह प्रकृति का लोकमंगल तत्व है। यही लोक श्रेय तत्व है। हमारा व्यक्तिगत अन्तःकरण प्रेय में रमता है। शिवतत्व श्रेय की ओर ले जाता है। तव शिव प्रेय भी हो जाता है और प्रेय सुंदर भी होता है। लेकिन शिव और सुंदर का मूल सत्य है। सत्य प्रथमा है और वही अंतिम भी है। सत्य शिव और सुंदर भारतीय ऋत परंपरा के तीन प्राप्य हैं। गढ़ी अनुभूति में वे तीन नहीं एक ही हैं।

राष्ट्र जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहता। प्रकृति परिवर्तनशील है ही। दिक्काल भी स्थाई नहीं। सूर्य उगते हैं, अस्त होते है। दिवस बनते हैं। अस्त काल से उदयकाल तक रात्रि रहती है। अग्नि तत्व अपना काम करते हैं। ताप बढ़ता है। जलों को आकाश ले जाता है। आकाश के जल पृथ्वी पर अपना जीव वनस्पति परिवार देखते हैं। वे वर्षा करते हैं। कभी-कभी बाढ़ बनते हैं। वायुदेव आंधी लाते हैं। मनुष्य इस ऋत-चक्र के साथ अनुकूलन नहीं करता। संघर्ष करता है। संघर्ष की लत परस्पर युद्धों को जन्म देती है। महाभारत होता है। अपने से अपने ही लड़ते हैं। अपनों द्वारा अपने मारे जाते हैं। धरती रक्तरंजित होती है। विषाद आते हैं, अवसाद सिर चढ़ते हैं। मूल फिर फिर प्रकट होता है अपने मूल चरित्र में। श्री कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि ‘‘यह ज्ञान सर्वप्रथम सूर्य के पास था। फिर मनुष्य-मनु के पास आया। परम्परा से विस्तृत हुआ। काल के प्रभाव में नष्ट हो गया। वे वही ज्ञान अर्जुन के लिए फिर से दोहरा रहे हैं।

ज्ञान नया नहीं होता। पुराना भी नहीं होता। पुराना होने के लिए पहले उसे नया होना चाहिए, लेकिन वह सदा से एक है-एक सद् विप्रा बहुधा बदन्ति। विद्वान उसी एक को अपने ढ़ंग से गाते हैं।  स्टीफेन हाकिंग निराश थे कि दार्शनिक कोई नयी बात नहीं कर रहे हैं, ‘‘जबकि यहाँ अरस्तू से लेकर कान्ट तक दर्शन की श्रेष्ठ परम्परा है।’’ उन्होंने विटगेन्सटीन को उद्घृत किया है, ’’अब दर्शन का मुख्य काम भाषा का विश्लेषण ही रह गया है।’’ विज्ञान और दर्शन अंततः एक ही ध्येय पर काम करते हैं। सृष्टि निर्माण के मूल तत्व का ज्ञान दोनों का साझा विषय है। इसमें जोड़ सकते हैं कि क्या यही मूल तत्व आदि तत्व भी है? यदि हां, तो आदि तत्व अस्तित्व में कब और कैसे आया? शून्य कभी नहीं हो सकता। शून्य से सृष्टि का उद्भव भी नहीं हो सकता। ऐसे सामन्य ध्येय के बावजूद दर्शन और विज्ञान की कार्य पद्धति एक जैसी नहीं है। वैज्ञानिक पदार्थ का विश्लेषण करते हैं, निष्कर्ष देते हैं।

दार्शनिक इन निष्कर्षों का उपयोग करते हैं। दर्शन के ज्ञान में निजी अनुभूति भी काम करती है। व्यक्तिगत अनुभूति को सार्वजनिक अनुभूति के परीक्षण की कसौटी पर सही उतरना चाहिए। ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी। यह कहना गलत है कि दर्शन केवल भाषा या शब्दों का ही विवेचन है। भारत में एकं सद् या एक सत्य का विचार ऋग्वेद से लेकर आचार्य शंकर तक एक जैसा है। विज्ञान और दर्शन के सत्य अलग-अलग नहीं हो सकते। अस्तित्व एक ही सत्ता है।

=>
loading...
WP Twitter Auto Publish Powered By : XYZScripts.com
E-Paper