विचार मित्र

चाहत मन भर, श्रम छटांक भर भी नहीं

घनश्याम भारतीय
बात-बात में हम अपनी तुलना कई विकसित देशों से करते हैं परंतु उनके मुकाबले खड़ा होने के लिए स्वयं कुछ करना ही नहीं चाहते। यही कारण है कि हमने अच्छे दिन की कल्पना करके ख्याली पुलाव पकाना तो प्रारंभ कर दिया परंतु अच्छे दिन लाने के लिए अपने कर्तव्य नहीं समझ पा रहे हैं। अपनी जिम्मेदारियां समझने के बजाय असफलता का ठीकरा सरकार हमारे सिर और हम सरकार के सिर आखिर कब तक फोड़ते रहेंगे। यह समाज और राष्ट्र का दुर्भाग्य ही है कि हमारी चाहत चांद पर पहुंचने की है और हम चलने के लिए खड़े भी नहीं हो सकते। हमारी ख्वाहिशों की मीनारें जितनी ऊंची हैं, सोच में हम उससे भी अधिक निम्न है। यानी कि हम चाहते तो मन भर हैं परंतु श्रम छटांक भर भी नहीं करना चाहते। ऐसे में हमारे मन के ख्याली पुलाव से हमारी इच्छा तृप्ति भला कैसे होगी। इसके लिए देश का नागरिक जितना जिम्मेदार है हमारी सरकारें उससे भी अधिक जिम्मेदार हैं।
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के शायर वह उदघोषक दिवंगत अनवर जलालपुरी सन 2001 में जब अमेरिका की यात्रा से भारत लौटे तो एक पत्रकार और उनका शागिर्द होने के नाते उत्सुकता बस मैंने उनका तुलनात्मक अध्ययन जानने की कोशिश की। इस पर उनका जवाब हैरान करने वाला था। उन्होंने कहा था कि यदि वे अमेरिका से भारत की तुलना कर देंगे तो राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिए जाएंगे। हां इतना जरूर कहा कि जब वे मुंबई में उतरे तो दिल धक धक करने लगा। उनका यह जवाब सुनकर कोई भी हैरान हो सकता था, क्योंकि उसमें सच्चाई थी, जो आज भी है। वही सच्चाई जो अनवर जलालपुरी ने बताई, अमेरिका सहित तमाम अन्य विकसित राष्ट्रों को बुलंदी की ओर और हमें गर्त्य की ओर ले जा रही है।
जाहिर सी बात है कि विकसित राष्ट्रों के नागरिक अपने कर्मों और परिश्रम पर विश्वास करते हैं और हम काम चोर बनकर सरकार से इमदाद की उम्मीद में जीवन बर्बाद करते जा रहे हैं। वहां गरीब कहने में लोग अपमान महसूस करते हैं और यहां योजना का लाभ लेने के लिए फर्जी आय प्रमाण पत्र बनवा कर वास्तविक गरीबों का हक मारा जाता है। वहां कमा कर खाने में सुखानुभूति होती है और यहां छीनकर खाने में मजा है। वहां सुख सुविधाओं की प्राप्ति के लिए स्वेच्छा से लोग कई कई घंटे अतिरिक्त काम करते हैं और यहां निर्धारित घंटों को मटरगश्ती में बिताकर आज का काम कल पर छोड़ दिया जाता है।
कहा जाता है कि व्यक्ति के जीवन का प्रत्येक पहलू उसके व्यक्तित्व के अनुसार होता है। ऐसे में यदि हम नैतिक मूल्यों के पोषक बनने का प्रयास करेंगे तो हमारे सांस्कृतिक जीवन की एक सकारात्मक और अच्छी दिशा अवश्य तय होगी। पाखंडों, छद्मों, सामाजिक बुराइयों और रूढ़ियों से घिरा समाज या राष्ट्र पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता। जहां भाग्यवाद का प्रचलन होगा वहां कर्म के प्रति निष्ठा बढ़ ही नहीं सकती। जब तक कर्म के प्रति हम निष्ठावान नहीं होंगे तब तक विकसित राष्ट्रों का मुकाबला नहीं कर सकते। ऐसे में भी हमारी चाहत सिर्फ चाहत बनकर रह जाती है। वह श्रम के अभाव में मूर्त रूप नहीं ले पाती।
“होईहैं वही जो राम रचि राखा” जैसे सिद्धांत कामचोरी को बढ़ावा देते हैं। सबसे खास बात यह कि जब हम कुछ प्राप्त कर लेते हैं अथवा धनसंपदा में वृद्धि के साथ मान प्रतिष्ठा पा लेते हैं तो इसका श्रेय स्वयं लेना चाहते हैं। और जब दुर्घटनाएं, आपदाएं, विपदाएं आती हैं अथवा धनसंपदा छिन जाती है तो हम कह बैठते हैं कि भगवान को यही मंजूर था। यानी सीधे-सीधे हम अच्छे प्रतिफल वाले कार्यों की जिम्मेदारी स्वयं ले लेते हैं और बुरे प्रतिफल वाले कार्यों के लिए भगवान को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। तब हम यह भूल जाते हैं कि हमें जो कुछ मिला है वह हमारे अच्छे या बुरे कर्मों का फल है। यह भी एक विडंबना है कि जब हम अपनी बेटी को देखते हैं तो दहेज एक सामाजिक कोढ़ नजर आता है और बहू चाहे जितना भी लाए वह कम ही रहता है। लूट खसोट और भ्रष्टाचार की दुहाई देने वाले लोग नौकरी पाने के बाद अपने बेटे की ऊपरी कमाई पर गदगद होते हैं। यानी ईमानदारी और पारदर्शिता की उम्मीद तो हम पूरे देश से करते हैं और अपनी संतान को ईमानदार बनने के लिए जरूरी संस्कार भी नहीं देते।
मेरे एक मित्र है प्रवीण गुप्ता। वे युवा कल्याण के क्षेत्र में वर्षों से काम कर रहे हैं। बीते दिनों नेहरू युवा केंद्र के प्रस्ताव पर उन्हें सांस्कृतिक अध्ययन के लिए भारत सरकार के युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय द्वारा श्रीलंका भेजे गए प्रतिनिधिमंडल में उत्तर प्रदेश से प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। पूरे 10 दिनों तक इस प्रतिनिधिमंडल ने श्रीलंका के विभिन्न धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के स्थलों का भ्रमण कर वहां की संस्कृति और रहन-सहन का अध्ययन किया। इस दौरान पाया कि वहां का नागरिक जिस कार्य को अपना जरूरी कर्तव्य मानकर करता है उसी कार्य के लिए भारत के नागरिकों को जागरुक करने में सरकार को पानी की तरह धन व्यय करना पड़ता है। स्वच्छता वहां की जीवन शैली का हिस्सा है और यहां अभियान चलाकर बताना पड़ रहा है कि स्वच्छता जरूरी है। वहां यातायात के नियमों से स्वयं नागरिक समझौता नहीं करते और यहां सड़कों की पटरियों पर अतिक्रमण करके यातायात के नियम तोड़े जाते हैं। इससे उत्पन्न जाम की समस्या के लिए सरकार और प्रशासन को दोषी ठहरा दिया जाता है। यह जानते हुए कि पानी तारकोल का दुश्मन है, अपने घरों का पानी पक्की सड़क पर बहा दिया जाता है। साथ ही सड़क खराब होने पर निर्माण एजेंसी व सरकार को पानी पी पी कर कोसा जाता है।और सरकार भी है कि सड़क या भवन निर्माण में गुणवत्ता का ध्यान ही नहीं रखती।
सबसे खास बात यह कि विकसित देशों में सरकारी संपत्ति की सुरक्षा वहां का प्रत्येक नागरिक भी करता है। यदि कहीं छति हुई तो संबंधित व्यक्ति या समूह से उसकी भरपाई कराई जाती है। इसके विपरीत अपने देश के नागरिक अपनी बात मनवाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने के उद्देश्य से सरकारी संपत्ति को नष्ट करने से जरा भी नहीं हिचकते। जिसकी भरपाई पूरे देश के नागरिकों को महंगाई और टैक्स के रूप में करनी पड़ती है।
अफसोस जनक पहलू यह कि यहां के नागरिक दोनों हाथों में लड्डू की इच्छा रखते हैं। बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण से होने वाले नुकसान के प्रति चिंता तो जताते हैं परंतु पेड़ लगाने को कौन कहे पहले से लगे पेड़ों को अंधाधुंध काटते जा रहे हैं। घर का कूड़ा सड़कों पर और गलियों में फेंककर स्वच्छ भारत की कल्पना करना बेमानी है। हमें उस जापानी नागरिक से सीख लेने की आवश्यकता है जो यात्रा के समय बस या ट्रेन की फटी सीट देखकर सुई धागा निकालकर सिल देता है। और एक हम हैं कि साबूत सीट देखते ही झोला बनाने हेतु फाड़ कर उठा लेने का मौका तलाशते हैं। दूसरी तरफ सरकारी तंत्र भी अपना कर्तव्य नहीं समझ पा रहा है। राष्ट्रहित को दरकिनार कर अपने निजी लाभ में वह आकंठ भ्रष्टाचार में दिनों-दिन डूबता जा रहा है। यही नहीं सरकार भी व्यवस्था बदलने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाने के बजाय पुरानी परिपाटी पर चलकर नागरिक हितों की अनदेखी ही कर रही है। जिससे भ्रष्टाचारियों को संरक्षण और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है।
कुल मिलाकर बबूल का पेड़ लगाकर आम के मीठे फल की उम्मीद करना कौन सी समझदारी है। बबूल के उस कटीले पेड़ से आम के फल की उम्मीद में भगवान भरोसे बैठकर हम विकसित राष्ट्रों का मुकाबला कभी नहीं कर सकते। इसके लिए हमें कठोर नहीं कठोरतम परिश्रम की आवश्यकता है। ऐसे मे हमें सरकार से मुफ्त की उम्मीद त्याग कर समाज और राष्ट्र हित में कुछ सकारात्मक करना होगा।

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