कहीं छूट न जाए ओबीसी वोटर, सपा की बढ़ सकती हैं मुश्किलें!

नीरज अवस्थी
नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के लिए जो राजनीतिक उठा पटक हो रही है वह तो हम सभी देख रहे है। जहां एक और बसपा और सपा ने अपनी 25 ,साल पुरानी दुश्मनी भूला कर एक साथ आ गए है। उधर बिहार के पूर्व पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने बसपा सुप्रीमो मायावती से मुलाकात की और उन्हें जन्मदिन की बधाई दी साथ ही सपा प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से भी मुलाकात की है।
गठबंधन के सामने भी ओबीसी वोट की समस्या एसपी-बसपा गठबंधन तो हो गया है लेकिन अब ओबीसी वोट बैंक की लड़ाई दिलचस्प होेने वाली है। दरअसल उत्तर प्रदेश में जीतनी भी छोटी पार्टियां है वो सभी पार्टियां इसी वोट बैंक की राजनीति कर रही है। इस गठबंधन में किसी छोटी पार्टी को शामिल नहीं किया गया है। ऐसे में ये देखना बहुत दिलचस्प होने वाले है कि छोटे दल किधर जाते है।

बीजेपी के खिलाफ खड़े है अपने ही
उत्तर प्रधेश में सभी पार्टियों की हमेशा से नजर ओबीसी वोट बैंक पर रही है। इस बार सपा-बसपा के गठबंधन से ये वोट बैंक और भी अहम हो गया है। बसपा ने पिछला चुनाव अपना दल सोने लाल के साथ मिलकर लड़ी थी। विधानसभा चुनाव में सुहैलदेव भारतीय समाज पार्टी भी साथ आ गई थी।
ये दोनों अभी भी बसपा के साथ है लेकिन लगातार सरकार पर उपेक्षा का आरोप लगाकर रहे हैं। बीएसपी पर दबाव बनाए हुए हैं। बीएसपी के सामने इनको अपने साथ रखने और दूसरी ऐसी ही पार्टियों को साथ लने की भी चुनौती है।

गठबंधन के सामने भी कई बड़ी समस्या
आरएलडी को भी इस गठबंधन में शामिल नहीं किया गया है जबकि पश्चिमी यूपी में उसका काफी प्रभाव है। इसके अलावा निषाद पार्टी और पीस पार्टी भी गठबंधन में शामिल नहीं किया गया है। इनके समर्थन से ही उपचुनाव में जीत हासिल की थी। एसपी भी खुद हमेशा से ओबीसी वोट बैंक की राजनीति करती आई है। ऐसे में ओबीसी का प्रतिनिधित्व करने वाली सभी छोटी पार्टियां के बिना वह कितना वोट अपने साथ ला पाती है।

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