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धैर्य रखें राम मंदिर जल्द बनेगा और जन्मभूमि पर ही बनेगा: भागवत

देहरादून।  देहरादून आए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने एक प्रतिनिधिमंडल से अनौपचारिक बातचीत में कहा कि धैर्य रखें राम मंदिर जल्द बनेगा और राम जन्म भूमि स्थल पर ही बनेगा। देहरादून दौरे के पहले दिन मंगलवार को कला-संस्कृति, साहित्य और लेखन से जुड़े प्रबुद्धजनों से मुलाकात के दौरान संघ प्रमुख ने कहा कि गांव समृद्ध होगा, तभी वास्तव में राष्ट्र भी समृद्ध हो पाएगा। संघ प्रमुख ने शाम की पाली में देहरादून महानगर में चलने वाली संघ की शाखाओं के मुख्य शिक्षक और शाखा कार्यवाह स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ भी बैठक की। वहीं, रात्रि में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने संघ कार्यालय में संघ प्रमुख से भेंट की।

संघ प्रमुख डॉ. भागवत सोमवार रात देहरादून पहुंचे। आठ फरवरी तक के प्रवास कार्यक्रम के दौरान वह यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय में समाज के विभिन्न वर्गाें के प्रबुद्धजनों के अलावा संघ के मुख्य शिक्षक स्तर तक के कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगे। मंगलवार को उन्होंने संघ कार्यालय में अलग-अलग गु्रपों में कला-संस्कृति, साहित्य और लेखन से जुड़े प्रबुद्धजनों के साथ विमर्श किया।

संघ प्रमुख ने अपनी बात रखने से पहले संघ के 93 साल के सफर पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि आज देश में संघ के कार्यकर्ता 1.30 लाख से अधिक सेवा कार्य पूरे देश में चला रहे हैं। 40 देशों में विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से स्वयंसेवक कार्यरत हैं।

चर्चा के दौरान गांवों की मजबूती पर जोर देते हुए उन्होंने कई समृद्ध गांवों के उदाहरण दिए और कहा कि हम लोग भी अपने गांव में सप्ताह में एक बार एकत्रित होकर गांव की चौपाल पर बैठें। हमारे वास्तविक धन जल, जंगल, जमीन को समृद्ध बनाने और इनकी सुरक्षा के लिए मिलकर कार्य करने पर विचार करें। उन्होंने कहा कि श्रमदान कर गांव में पानी के लिए कुएं, छोटे बांध, जितने हम अपनी हैसियत से मिलकर बना सकते हैं, बनाएं। अपना कार्य खुद कर गांव को खुशहाल बनाएं। गांव समृद्ध होगा, तभी राष्ट्र भी वास्तविक रूप से समृद्ध हो पाएगा।

चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उत्कृष्ट साहित्य मानव निर्माण के लिए महत्वपूर्ण होता है और उसे उन्नत बनाता है। साहित्य राष्ट्र को आगे बढ़ाने की धुरी होना चाहिए। बदली परिस्थितियों में भारतीय परिवारों में संस्कारों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि संयुक्त परिवार की ओर आगे बढ़ें। क्योंकि प्रबल और प्रभावी संस्कार नाना-नानी व दादा-दादी ही दे सकते हैं। प्रत्येक परिवार और कुटुंब को चाहिए कि वह सप्ताह में एक दिन अपने पूर्वजों और राष्ट्र के महापुरुषों की चर्चा करें। यह प्रयास होना चाहिए कि घर की चौखट के भीतर बात अपनी मातृभाषा में ही करें।

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