मानवता के प्रेरणाश्रोत हैं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम

अब अगर राम और पुरुष, इन दोनों को आमने-सामने रखकर देखें, तो राम ने पुरुष के सभी रूपों को जिया है। जैसे कि- पुत्र के रूप को, भाई के रूप को, पति के रूप को, पिता के रूप को, और अगर घर में कोई और भी है, तो उस रिश्ते के रूप को भी उन्होंने जिया है। और सभी रूपों में उनका जीवन एक आदर्श पुरुष का जीवन रहा है। यही वह तत्व है, जो उनकी प्रासंगिकता को हमेशा बरकरार रखता है। कहा जा सकता है ‘राम आस्था है। ‘राम श्रद्घा है। ‘राम धर्म है। ‘राम ईश्वर हैं। ‘राम जन-जन है। ‘राम स्वाभिमान है। ‘राम सत्य है। ‘राम गांधी के जुबां पर थे। ‘राम राज्यों की कल्पना में हैं। ‘राम हर मन की आस्था में हैं। ‘राम देश की एकता के प्रतीक हैं। ‘भगवान राम एक आदर्श सुपुत्र, आदर्श भाई, आदर्श सखा, आदर्श पति और आदर्श राष्ट्रभक्त हैं। ‘राम तो अगम हैं और संसार के कण-कण में विराजते हैं। ‘राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।

‘करूणानिधि हैं। ‘मनुष्य के आदर्श और सुंदरतम अभिव्यक्ति हैं। ‘वे मनुष्य ही नहीं, प्राणीमात्र के मित्र हैं, अभिरक्षक हैं और विश्वसनीय हैं। ‘वे दूसरों के दुख से द्रवित होने वाले दयानिधि हैं। ‘उनके स्वयं के जीवन में भी इतने दुख-दर्द हैं, फिर भी वे सत्य और आदर्श की प्रतिमूर्ति बने रहते हैं। लेकिन आज हिन्दु धर्म के ही कुछ लोगों ने राम को राजनीति का साधन बना दिया है। अपनी ही सांस्कृतिक विरासत पर सवाल उठाते हैं। राम के अस्तित्व का प्रमाण मांगते हैं। राम सिर्फ दो अक्षर का नाम नहीं, राम तो प्रत्येक प्राणी में रमा हुआ है, राम चेतना और सजीवता का प्रमाण है। अगर राम नहीं तो जीवन मरा है। इस नाम में वो ताकत है कि मरा-मरा करने वाला राम-राम करने लगता है। इस नाम में वो शक्ति है जो हजारों-लाखों मंत्रों के जाप में भी नहीं है।

राम जी से हमें  प्रेरणा मिलती है कि हमें परिवार में कैसे रहना है, कैसे गुजर-बसना करना है। कहते है भक्तों को सही राह दिखाने के लिए समय-समय पर धरती पर अवतार लेते है ईवर। पर यह हमेसा केवल कथा-कहानियों और मान्यताओं में नहीं बल्कि इसके ठोस प्रमाण है। जब कभी महात्मा गांधी ने किसी का नाम लिया तो राम का ही क्यों लिया? कृष्ण और शिव का भी ले सकते थे। दरअसल, राम देश की एकता के प्रतीक हैं। गांधी राम के जरिए ह्म्दिुस्तान के सामने एक मर्यादित तस्वीर रखते थे। वे उस राम राज्य के हिमायती थे। जहां लोकहित सर्वोपरि था। क्योंकि वे मर्यादा का पालन हमेशा करते थे। उनका जीवन बिल्कुल मानवीय ढंग से बीता बिना किसी चमत्कार के। आम आदमी की तरह वे मुश्किल में पड़ते हैं। उस समस्या से दो चार होते हैं, झलते हैं लेकिन चमत्कार नहीं करते। जबकि कृष्ण हर क्षण चमत्कार करते हैं। लेकिन राम उसी तरह जुझते हैं जैसे आज का आम आदमी। पत्नी का अपहरण हुआ तो उसे वापस पाने के लिए रणनीति बनाई। लंका पर चड़ाई की तो सेना ने एक-एक पत्थर जोड़कर पुल बनाया।

रावण को किसी चमत्कारिक शक्ति से नहीं बल्कि समझदारी के साथ परास्त किया। राम कायदे कानूनों से बंधे हैं। जब धोबी ने सीता पर टिप्पणी की तो वे उन आरोप का निवारण चले आ रही कानूनी नियमों से करते हैं। जो आम जनता पर लागू होता था। वे चाहते तो नियम बदल सकते थे। पर उन्होंने नियम कानून का पालन किया। सीता का परित्याग किया। यानी राम ने साक्षात परमात्मा होकर भी मानव जाति को मानवता का संदेश दिया। उनका पवित्र चरित्र लोकतंत्र का प्रहरी, उत्प्रेरक और निर्माता भी है। इसीलिए तो भगवान राम के आदर्शों का जनमानस पर इतना गहरा प्रभाव है और युगों-युगों तक रहेगा।

राम को शास्त्र-प्रतिपादित अवतारी, सगुण, वर्चस्वशील वर्णाश्रम व्यवस्था के संरक्षक राम से अलग करने के लिए ही ‘निर्गुण राम शब्द का प्रयोग किया। श्रीराम नाम के दो अक्षरों में रा तथा म ताली की आवाज की तरह हैं, जो संदेह के पंछियों को हमसे दूर ले जाती हैं। ये हमें देवत्व शक्ति के प्रति विश्वास से ओत-प्रोत करते हैं। इस प्रकार वेदांत वैद्य जिस अनंत सच्चिदानंद तत्व में योगिवृंद रमण करते हैं उसी को परम ब्रह्म श्रीराम कहते हैं। आदि कवि वाल्मीकि ने उनके संबंध में कहा है कि वे गाम्भीर्य में समुद्र के समान हैं। समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्यण हिमवानिव। राम का उल्टा होता है म, अ, र अर्थात मार। मार बौद्घ धर्म का शब्द है। मार का अर्थ है- इंद्रियों के सुख में ही रत रहने वाला और दूसरा आंधी या तूफान। राम को छोड़कर जो व्यक्ति अन्य विषयों में मन को रमाता है, मार उसे वैसे ही गिरा देती है, जैसे सूखे वृक्षों को आंधियां।

हर संकट में सबको साथ लेकर चले श्रीराम

अवतार लेने से लेकर साकेत गमन तक राम ने दो कुलों, वंशों, किनारों, समूहों को जोडऩे का उपक्रम किया है। अर्थात श्रीराम जी सदा एक-दूसरे को जोड़ते रहे। चाहे वह निरपराध अहिल्या श्रापमुक्त कर वर्षों बाद पति-पत्नि का मिलन कराने का हो, या धनुष यज्ञ के दौरान मिथिलेश व अवधेश को मिलाने का। ‘भजेउ राम सम्भु धनु भारी। फिर तो -सिय जय माल, राम उर मेली॥ अब तो मिले जनक दशरथ, अति प्रीति। सम समधी देखे हम आजू॥ निमिकुल और रघुकुल का विरोध मिटाकर, उत्तम नाता जोड़कर, उन्हे राम ने समधी बना दिया। परशुराम को शांत कर ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच का संघर्ष, आक्रोश, अश्रद्घा को राम ने समाप्त कर दिया। वनपथ के दौरान राम ने निषाद को हृदय से लगाकर उपेक्षा, हीनभावना, निम्नकुल के प्रति छुआछूत जैसे विचार व भेदभावों को राम ने मिटा दिया। राम ने वनचरों को सभ्य बनाकर उन्हें श्रेष्ठ लोगों से मिला दिया। वन से लौटने के बाद राम का अयोध्या में पशु कुलाधम का मानवकुल श्रेष्ठ से मिलन, सर्वोपरि मिलन है। राम के व्यक्तित्व की पराकाष्ठा है कि वह दोनों को एक दूसरे के इतना निकट ला दिए। वह चाहते तो अकेले रावण को मारकर सीता को प्राप्त कर सकते थे। लेकिन उन्होंने लंका प्रवेश के दौरान चाहे सेतु निर्माण हो या रावण द्वारा दण्डित और देश से निष्कासित विभीषण की सलाह, समाज द्वारा उपेक्षित एवं तिरस्कृत वानर सुग्रीवादि और वनवासियों की सेवा श्रम सहायता लेकर ही श्रीरामजी ने रावण कुल का अंत किया। हनुमानजी को भक्ति एवं शक्ति और उपासकों को अनुरक्ति एवं युक्ति देकर, दोनों को जोडऩे का काम रामजी ने ही किया है। श्रीरामजी के कर्म, धर्म, व्यहार, परमार्थ इस बात के गवाह है कि हर अवस्था, हर दशा, हर परिस्थिति और प्रत्येक देश काल में राम का क्रियाकलाप चरितार्थ हुआ है। यह अदभुत नही तो और क्या है कि जनकपुर में सीताजी को पाकर, दो कुलों (वंशों) को जोड़ा तो वनवास काल में सीता को खोकर अनेक कुलों को एक-दुसरे से मिलाया। राम घर-बन कहीं भी रहे बस एक-दूसरे को जोड़ते ही रहे। आत्मा को परमात्मा की प्राप्ति श्रीराम कृपा से ही संभव है। भौतिक विज्ञान से अध्यात्म विज्ञान का सामंजस्य श्रीरामजी के व्यक्तित्व से ही सहज सम्भव हुआ है। आज जो राम को यथार्थ रूप में जानता, भजता और पाता है वही जुड़ता और जोड़ता है सबसे। कहने का अभिप्राय है अलगाव, बिलगाव और बिखराव आदि टूटन और घुटन से बचने के लिए राम के आचरण को ही अपनाना होगा। जातिवाद, क्षेत्रवाद, रुढि़वाद, भाषावाद और आतंकवाद जैसे अनेकों समाजघातीवाद, जो सिर उठा रहें हैं, उनके आक्रोश को भी राम का व्यक्तित्व ही समाप्त कर सकता है।

हिन्दुस्तान की सांस्कृतिक विरासत हैं राम

कहा जा सकता है राम सिर्फ एक नाम नहीं हैं। राम ह्म्दिुस्तान की सांस्.तिक विरासत हैं। राम ह्म्दिुओं की एकता और अखंडता का प्रतीक हैं। राम सनातन धर्म की पहचान है। धर्मस्वरूप राम -सबको जोड़ता है, मिलाता है! राम ने अपने व्यक्तित्व के द्वारा आदि से अंत तक धर्म का सही स्वरूप उपस्थित किया है। रामनवमी भगवान राम का जन्मदिन है। करोड़ों हिन्दू आज के दिन व्रत रखकर विोष पूजा-अर्चना के जरिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम का स्मरण करते है। वे इस संसार को राक्षसों से मुक्त करने के लिए अयोध्यापति दारथ के घर आएं। उनका सारा जीवन मानव समाज की सेवा को समर्पित रहा। युगों बाद भी राम से जुड़े आर्दा आज ह्म्दिुओं के ही नहीं बल्कि सारे मानव समाज के आर्दा हैं। एक राजा ने तीन विवाह कर कुल को कलह में झोक दिया। भाई भरत ने भाई की पादुकाओं से ही राज चलाया। सीता हरण की पीड़ा, लंका के दहन से रावण के घमंड का चूर होना, अंतिम समय में लक्ष्मण का रावण से ज्ञान प्राप्त करना आदि कुछ ऐसे उदाहरण है, जिसमें आज की राजनीति, समाज और संयुक्त परिवार बहुत कुछ सीख सकते हैं।

राम के नाम, रूप, धाम, लीला, आचरण में सिर्फ और सिर्फ एक-दूसरे को जोडऩे की दिव्य शैली विद्यमान है। चाहे बाललीला हो या वनलीला, या फिर जनकपुर की यात्रा, वन यात्रा में फूलों भरा मार्ग हो या कांटों भरा, भगवान राम ने अपने चरित्र से सबकों तारा है, या यूं कहें मिलाया है। भारतीय संतों व चिंतकों ने विश्वास व्यक्त किया है कि जब धर्म की सारी मर्यादाएं टूट जायेंगे तो भी राम का चरित्र सारे समाज को मिलाने के लिए सदा सर्वदा प्रस्तुत रहेगा। राम ने कभी छोटे-बड़े उंच-नीच का भेदभाव नहीं किया। महल का, कुटियों के लिए थोड़ा भी भेदभाव चुभ जाता था राम को। उत्तम भोजन, कीमती वस्त्र और सुंदर निवास का सुख सबको सुलभ हो, राम यही चाहते थे। चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के लिए यह कार्य असम्भव न था। कौशल्या साम्राज्ञी थी उत्तरकौशल की। सर्वगुण सम्पन्न राम सबको प्रिय लगते थे ही। दशरथ-कौशल्या के राम प्राणाधार थे। ममतामयी मां भला कैसे इंकार कर सकती थी-पुत्र के इस प्रस्ताव को। अब तो बंधु सखा संग लेहि बोलाईं और अनुज सखा संग भोजन करही। यह नित्य का नियम था राम का। छोटों को बड़ों से और अमीरों को गरीबों से जोडऩे का यह पहला अभियान था, बाल राम का। उसके बाद से तो फिर नियम ही निमय बनने लग गए, वह नियम जो आज भी प्रासंगिक है।

‘राम नाम सत्य है

भगवान श्री विष्णुजी के बाद श्री नारायणजी के इस अवतार की आनंद अनुभूति के लिए देवाधिदेव स्वयंभू श्री महादेव 11वें रूद्र बनकर श्री मारुति नंदन के रूप में निकल पड़े। यहां तक कि भोलेनाथ स्वयं माता उमाजी को सुनाते हैं कि मैं तो राम नाम में ही वरण करता हूं। जिस नाम के महान प्रभाव ने पत्थरों को तारा है। लोकजीवन के अंतिम यात्रा के समय भी इसी ‘राम नाम सत्य है के घोष ने जीवनयात्रा पूर्ण की है। और कौन नहीं जानता आखिर बापू ने अंत समय में ‘हे राम किसके लिए पुकारा था। आदिकवि ने उनके संबंध में लिखा है कि वे गाम्भीर्य में उदधि के समान और धैर्य में हिमालय के समान हैं। राम के चरित्र में पग-पग पर मर्यादा, त्याग, प्रेम और लोकव्यवहार के दर्शन होते हैं।

जिसे राम ने छोड़ा, उसका डूबना तय

भगवान श्रीराम स्वयं कहते हैं- सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥ अर्थात मेरा यह संकल्प है कि जो एक बार मेरी शरण में आकर मैं तुम्हारा हूं, कहकर मुझसे अभय मांगता है, उसे मैं समस्त प्राणियों से निर्भय कर देता हूं। मैं तुम्हारा हूं सिर्फ कहने से नहीं होता। किसी का होने के लिए उस जैसा होना पड़ता है। राम के गुणों को अपनाकर ही उनका बना जा सकता है। तभी राम उसे अभय प्रदान करते हैं। तब राम हमें भव-सागर में डूबने के लिए नहीं छोड़ते। जो राम को छोड़ देता है, यानी उनके गुणों से किनारा कर लेता है, उसका डूबना तय है। देखा जाय तो जब नल के हाथ से फेंके हुए पत्थरों से समुद्र पार कर लंका जाने के लिए सेतु बनाया जाने लगा, तब राम ने नल से इस चमत्कार का रहस्य पूछा। नल ने बताया- भगवान, यह आपके नाम के प्रताप से हो रहा है। तब भगवान ने अपने हाथ से एक पत्थर उठाकर उसे समुद्र में फेंका पर वह डूबने लगा। रामचंद्रजी ने नल से पूछा- जब मेरे नाम के बल से पत्थर समुद्र पर तैर सकता है तब मेरे स्वयं के हाथों फेंका गया पत्थर कैसे डूब गया? नल ने विनयपूर्वक उत्तर दिया-प्रभु, जिसे आप छोड़ देंगे, वह तो अवश्य डूबेगा ही। अत: हमें राम के गुणों को अपनाकर उनका आज्जान करना चाहिए।

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