धर्म - अध्यात्म

नेकी की मिसाल देता 8 वां रोजा

रामज़ान का आज 8 वां रोजा है जिसके अपने अलग ही महत्व हैं। इसी के बारे में आपको बताने जा रहे हैं। ‘रोजा’ रोशनी की लकीर और नेकी की नजीर (मिसाल) है। रमजान का तो हर रोजा खुशहाली का खजाना और पाकीजगी का पैमाना है. रमजान की बरकतों की तहरीर का ये कारवां माशाअल्लाह आठवें रोजे तक पहुंच गया है। इस्लामिक लोग नेकी के लिए ये रोजे रखते हैं।

दरअसल, रोजा अल्लाह का अदब भी है और फ़जल की तलब भी है। सबूत के तौर पर इस बात को कुरआने-पाक की आयत के हवाले से बेहतरीन और आसान तरीके से समझा जा सकता है। पवित्र कुरआन की सूरह अलहश्र की आयत नंबर 18 में बयान है-‘और अल्लाह से डरो, बेशक अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है।’ जानकारी दे दें कि इस आयत की रोशनी में ये बात नुमाया (स्पष्ट) हो जाती है कि अल्लाह (ईश्वर) वसीअ (सर्वव्याप्त) है और अजीम (महान) और अलीम (जानकार) है।

अल्लाह से डरना ही अल्लाह का अदब है। यहाँ दो बातें खासतौर से समझना जरूरी हैं। यानी किसी का अदब हम दो ही वजहों से करते हैं या तो ‘डर’ से या ‘मोहब्बत’ से. अल्लाह (ईश्वर) चूंकि महान और पवित्र (पाकीजा) है इसलिए अजीम (महान) और पाकीजा (पवित्र) से ‘डरना’ दरअसल ‘मोहब्बत’ करना ही है। इसलिए रोजा अल्लाह से ख़ौफ़ और मोहब्बत का सबब तो है ही, अल्लाह का अदब भी है।

इसके अलावा अर्श (आठवां आसमान) से जब अल्लाह के फ़जल की तलब की जाती है तो रहीम और करीम (दयालु-कृपालु) होने की वजह से अल्लाह रोजादार की दुआ सुनता है और मुराद पूरी करता है। किसी ने कहा भी है-‘दरे-करीम से बंदे को क्या नहीं मिलता/जो मांगने का तरीक़ा है उस तरह मांगो।

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