धर्म - अध्यात्म

जब स्वयं महारुद्र बने अंजनी नंदन

शिव की क्रियात्मक अभिव्यक्ति ही शक्ति है और शक्ति की चेतना का आधार स्वयं शिव है। वे शिव इस समय अपने परात्पर स्वरूप में पूरी तरह लीन थे। उनकी इस समाधिलीनता का प्रभाव कैलास पर्वत के कण-कण में व्याप्त हो रहा था। देवात्मा हिमालय की सम्पूर्ण आध्यात्मिक विभूतियां और वैभव वहां सघनता से साकार हो रहे थे। देवों की दिव्य दीप्ति वहां चतुर्दिक विकीर्ण हो रही थी। नंदी, भृंगी एवं भूत-प्रेत आदि गणों का समुदाय भी आज शांत और स्थित दिख रहा था। सभी में इस बात को लेकर जागरूकता थी कि उनके किसी भी क्रियाकलाप से महेश्वर की समाधिलीनता में व्याद्यत-व्यवधान न पड़े।

हां, माता पार्वती के सिवाय इस सत्य को सम्भवत: कोई और नहीं जानता था क्योंकि मां पार्वती चित् शक्ति बन प्रभु के चैतन्य में सदा अंर्तलीन रहती हैं। भगवान भोलेनाथ समाधिलीन हुये थे तो मां पार्वती जी को ही देवे-ऋषियों एवं अपनी मानव संतानों के दु:ख का सहभागी होना पड़ रहा था। असुरता से आक्रांत इन्द्रआदि देवगण भी आए थे। वे अपने भयों से विकल विह्वल एवं बेचैन थे। हिमाचल में तप कर रहे ऋषियों एवं सिद्धों का समुदाय भी कुछ ऐसे ही आग्रह लेकर आया था। इन सबकी व्यथा का सार यही था कि प्रकृति के घटकों में एक अनजाना विक्षोभ है। परिवेश एवं पर्यावरण में भयावह असंतुलन व्याप्त हो गया। परमेश्वर का ज्येष्ठ पुत्रा मानव अपनी मर्यादाएं भुला बैठा है।

स्थिति इतनी विकट हो चुकी है मां! कि ऋषियों की संतानें अपने को राक्षस कहने-कहलाने में गर्व और गौरव अनुभव करने लगी है। ‘कौन विश्वास करेगा माता कि देव पिता पुलत्स्य के पुत्रा ऋषि विश्रवस की संतानें अपने को ऋषि पुत्रा कहने के बजाय राक्षसराज कहलाती हैं। मां पार्वती, इसे जीवन की विडम्बना ही कहेंगे कि धरती पर जीवन की रीति ही उल्टी हो गई है।

ऋषिगण अपनी व्यथा सुना ही रहे थे कि स्वयं धरादेवी अपने दैवी स्वरूप में कैलास आईं, परन्तु आज उनकी दीप्ति कुछ मलिन थी, बड़ी मुश्किल से उनके अधरों से बस केवल इतना निकला- ‘हे रूद्र! हे महेश्वर! हे शिव! रक्षा करो प्रभु! धरा देवी की इस कातर पुकार में इतनी विकलता-विह्वलता थी कि माता पार्वती का अन्तर्मन भी सिसक उठा।

इधर मां पार्वती का अन्तर्मन सिसका उधर महाकैलास की दिव्य गुफा से राम! राम! श्री राम! की मेघमंद ध्वनि सुनाई पड़ी। बड़ी मधुरता, मोहकता और सरसता थी इन स्वरों में। इन स्वरों के साथ नन्दी की प्रसन्नतापूर्ण हुंकार इस बात का संकेत थी कि भगवान भोलेनाथ समाधि से उठ गए हैं। सभी की चिंतन-चेतना एवं पग प्रभु के गुफाद्वार की ओर मुड़ चले।

हर कोई भगवान सदाशिव की समाधि के अनुभव को सुनने के लिए आतुर था। भगवान शंकर भी प्रसन्न होकर भावमय उदारतापूर्वक सुनाए जा रहे थे कि ‘धरती पर श्रीराम के अवतरण की वेला आ रही है वे अपने इस अवतार में मर्यादाओं की नवस्थापना करके मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाएंगे। धरती पर पुन: सतयुग की वापसी होगी। अब बारी समस्त देवशक्तियों की है, कि वे प्रभु के लीला सहचर बने। शिव मुख से युग-परिवर्तन के ब्रह्मसंकल्प का मंत्रोच्चार सुन सभी आत्मलीन हो गए क्योंकि सभी को इन्हीं क्षणों से अपनी भावी भूमि का निर्धारित करनी थी।

ऋषि मतंग मुनि का आश्रम प्राकृतिक वैभव एवं आध्यामिक विभूतियों से घिरा हुआ था। पशु-पंक्षी, सुमनोहर कुंज, बरबस ही मन को मोह लेते थे। मुनिवर जितने उत्कृष्ट तपस्वी थे, उतने ही भावमय भक्त थे। वे नियमित आश्रमवासियों को शिव-प्रेरणा से प्रभु श्रीराम की लीला कथा सुनाते थे।

ऐसा ही एक सांझ को कपिराज केसरी और देवी अंजनी वहां पहुंचे, मुनि मतंग लीलामय भगवान की बाल लीलाओं का वर्णन कर रहे थे। प्रभु के बाल रूप का यह शब्द चित्राण इतना रोचक एवं भावस्पर्शी था कि देवी अंजनी विभोर हो गईं। उन्हें ऐसा लगने लगा, जैसा कि वे स्वयं भावमय भगवान की माता है और प्रभु उन्हीं की गोद में लीला कर रहे हैं। लेकिन जैसे ही कथा प्रसंग बदला और उन्हें चेत हुआ कि उनकी गोद तो सूनी हैं, उन्हें तो कोई संतान ही नहीं है। यह दु:ख उन्हें इतनी प्रगाढ़ता से अनुभव हुआ कि वे बिलख कर रो पड़ीं। उनके इस आकस्मिक रुदन से सभी चौंक पड़े।

कथा विराम के बाद मुनि ने उन्हें अपनी ओर संकेत से बुलाया और बैठने को कहा। देवी अंजनी अपने पति वानरराज केसरी के साथ बैठ गईं। उन दोनों ने लगभग एक साथ ही अपनी पीड़ा ऋषि को कह सुनाई। मतंग मुनि बोले- सांसारिक दृष्टि से तुम्हारी दोनों की चिंता उचित है, पर पारमार्थिक रूप से इसका कोई औचित्य नहीं है।

अन्तर्यामी ऋषि को देवी अंजना के मनोभावों का सहज अनुभव हो रहा था। देवी अंजनी ऐसा पुत्रा चाहती थीं, जो प्रभु का परम भक्त हो, जो सहज वीतराग एवं ज्ञान, गुण निधान हो। प्रभु का कार्य, उन्हीं का स्मरण और उन्हीं को समर्पण जिसके जीवन का पर्याय हो। वह ऐसा भक्त हो कि स्वयं भगवान भी उसकी भक्ति से प्रसन्न हो जाएं।

ऋषि मतंग, देवी अंजनी से बोले- ‘पुत्री! कामना होना बुरी बात नहीं, प्रत्येक प्राणी को उसके कर्मों का वही सुफल या कुफल मिलता है। ऐसा कहते हुए देवी अंजनी को प्रदोष व्रत का सम्पूर्ण विधान कह सुनाया। इसी के साथ उन्होंने शिव मंत्रा की दीक्षा दी और वानरराज केसरी को भी तप करने के लिए कहा और यह कहकर ऋषि ने कुछ पल के लिए आकाश की ओर देखा और फिर बोले- वानरराज केसरी तुम्हारे भावी पुत्रा पर प्रकृति के सामान्य नियम लागू नहीं होंगे, वह तुम्हारे ही वीर्य से उत्पन्न होगा, इसलिए उसे सारा संसार केसरी नन्दन कहेगा, परन्तु उसकी चेतना सर्वात्मा भगवान शिव की अंशभूत होगी, इसलिए आत्मचेतना की दृष्टि से वह शिवपुत्रा होगा। इस कारण सभी लोकों में उसे शंकर सुअन भी कहा जाएगा। परन्तु अभी तो यह सब काल की कोख में है। वर्तमान का सन्देश तो यही है कि पुत्री अंजनी भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करें। देवी अंजनी ऋषि से आज्ञा लेकर वृषभाचल पर्वत पर कठिन तप करने में तल्लीन हो गईं।

तपोलीन अंजनी के तप की प्रभा दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। पति-पत्नी के ये दिव्य भाव विस्मयकारी साधना की तो अब सभी ओर चर्चा होने लगी थी। परम ज्ञानी ऋषि-महर्षि जो अपनी सूक्ष्म चेतना में, परात्पर ब्रह्म के अवतरण की अनुभूति करने लगे थे, वे भी यही चाहते थे कि देवी अंजनी भगवान भोलेनाथ का वरदान पाकर ‘दनुजवनकृशानु पुत्रा को जन्म दे। शिव-प्रेरणा से देवगण एवं स्वयं प्रजापति ब्रह्मा आए और वर मांगने के लिए कहा। देवी अंजनी मुस्कराईं और बोली-भगवन् साधक की सिद्धि यही है कि उसके इष्ट उससे प्रसन्न हों, उसे अपने आराध्य के अलावा किसी अन्य से कुछ नहीं मांगना चाहिए, अन्यथा उसकी निष्ठा कलंकित होती है।

अंजनी की इस अतुलनीय निष्ठा की सभी देवों ने प्रशंसा की और वे सब उन्हें शिव भक्ति का वरदान देकर वापस लौट आए। सर्वज्ञाता, सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, सर्वनियंता भगवान सदाशिव को यह कथा ज्ञात थी। एक दिन जब पूर्णिमा की रात्रि थी। चन्द्रदेव बड़ी ही उदारता से प्रकृति-परिवेश व पर्यावरण में अपनी शत-शत किरणों से चांदनी बरसा रहे थे, देवी अंजना इस समय शिवध्यान में लीन थी। ध्यानस्थ अंजनी के अंत: अस्तित्व में भगवान सदाशिव प्रकट हो गए और कहने लगे देवी! वर मांगों।

परात्पर प्रभु के वे स्वर इतने तीव्र थे और उनका स्वरूप इतना प्रभामय था, कि वे अधिक देर आंखें मीचे न रह सकीं। उनके नेत्रा खुल गए। नेत्रा खुलते ही अंजनी ने देखा-त्रिनेत्राधारी, त्रिशूलधारी, गंगाधर, त्रिपुरारी सम्मुख स्वयं साक्षात् खड़े है।

भक्तिमती अंजनी ने अकुलाकर उनके पांवों को पकड़ लिया। भाव की सघनता ने उनकी वाणी को अवरुद्ध कर लिया। वे बस केवल इतना कह पाईं-‘देवेश्वर! हे जगदीश्वर यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे प्रभु श्रीराम भक्त पुत्र का वरदान दें। अंजनी की भक्ति से प्रसन्न अवढऱदानी त्रिपुरारी ने कहा ‘ऐसा ही होगा। ‘मैं सदाशिव स्वयं तुम्हारे पुत्रा के रूप में जन्म लूंगा। तुम्हारे पुत्रा की श्रीराम भक्ति की साधना का गान युगों-युगों तक जन-जन करता रहेगा। तुम सर्वगुण सम्पन्न रूद्रावतार की माता बनोगी। इस चिरप्रतीक्षित वर ने अंजना को पुन: भाव समाधि में निमग्न कर दिया। उन्होंने अनुमान किया कि भगवान शंकर उनमें अन्तर्लीन हो गए हैं। वानरराज केसरी के भवन पर चैत्रा शुक्ल पूर्णिमा का पवित्रा दिन आ ही गया।

देवी अंजना के हृदय में विगत कई दिनों से हर्ष हुलस रहा था। उनकी देह की कांति भी आश्चर्यजनक रूप से इन दिनों बढ़ गई थी, उन्हें अनुभव होने लगा था कि उनकी निरंतर की गई तप साधना, ऋषियों एवं देवों के द्वारा दिए गए वरदान अब साकार रूप लेने ही वाले हैं।
अंजनी के अन्त:करण की ही भांति ब्रह्म प्रकृति में अनेक अनोखे सुखद परिवर्तन हो रहे थे। ऐसा लगता था कि अंजनी के शिशु का स्वागत करने के लिए प्रकृति ने अपनी सारी सुरम्यता का कोष लुटा दिया हो। मतंग ऋषि साधना में ही भाव-विह्वल होकर ‘शिव! शिव!! शिव!!! जय हो त्रिपुरारी! जय हो भोलेनाथ!! जय करूणानिधान!!! महर्षि के मुख से उच्चारित हो रहे थे क्योंकि भोले भंडारी तो उनके इष्ट आराध्य थे ही।

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