धर्म - अध्यात्म

जटोली शिव मंदिर: जहां होता है बाबा भोलेनाथ का वास

वैसे भी भारत अपनी संस्कृति और महत्व के लिए जाना जाता है। ङ्क्षहदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, कुल 33 करोड़ देवी-देवता हैं, जिनकी पूजा भारत में की जाती है। इनमें से प्रत्येक प्रसिद्ध देवी-देवताओं की अपनी-अपनी कहानी है। हालांकि, उन 33 करोड़ देवताओं के अलावा, भारत में कई अजीब या अनोखे मंदिर हैं जिनमें कुछ आकर्षक कहानियां हैं। हिमाचल प्रदेश के सोनल में स्थित जेटली मंदिर भी कुछ ऐसा ही है। मंदिर दक्षिण-द्रविड़ शैली से बना है। मंदिर को बनने में ही करीब 39 साल का समय लगा। यह मंदिर सोलन शहर से करीब सात किमी की दूरी है। मान्यता है कि पौराणिक समय में भगवान शिव इस मंदिर में कुछ समय के लिए अपना निवास बनाए थे। बाद में एक सिद्ध बाबा स्वामी कृष्णानंद परमहंस ने इस मंदिर घोर तपस्या की। उनके मार्गदर्शन और दिशा-निर्देश पर ही जटोली शिव मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। वर्ष 1974 में इस मंदिर की आधारशिला स्वामी कृष्णानंद परमहंस महाराज ने की थी।

मंदिर इतना खूबसूरत है कि शिव भक्तों को बार-बार यहां आने को पुकारता है। इस शिव मंदिर की प्रसिद्धि हिमाचल ही नहीं देश दुनिया तक फैली हुई है। जिसे देखने के लिए हर साल पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है। भवन निर्माण कला का यहां बेजोड़ नमूना देखने को मिलता है। इसमें महादेव अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं।

मंदिर में पूजा सुबह और शाम में की जाती है। विशेष अवसरों पर य की रौनक देखते ही बनती है। इसके अलावा विशेष अवसरों और उत्सवों में विशेष पूजा-अर्चना होती है। मकर संक्रांति, महाशिवरात्रि, वैशाख संक्रांति, श्रावण सोमवार आदि पर्व भारी उत्साह और भव्यता के साथ मनाए जाते हैं। श्रावण मास में पडऩे वाले हर सोमवार को मंदिर में पूजा अर्चना का विशेष महत्व है। श्रावण माह के सभी सोमवार को  मेला लगता है। यह मंदिर अपनी शक्ति और चमत्कारों के लिए भी प्रसिद्ध है। शिवरात्रि के दिन सुबह से ही मंदिर के बाहर भोलेनाथ के दर्शन के लिए हजारों लोगों की भीड़ लगी रहती है। इस दिन मंदिर के पास ही बहने वाली नदी खीर गंगा में स्नान का विशेष महत्व है। श्रद्धालु स्नान करने के बाद शिवङ्क्षलग को पंचामृत से स्नान करवा कर उस पर बेल पत्र, फूल, भांग, धतूरा इत्यादि अॢपत कर भोले बाबा को प्रसन्न करते हैं। और अपने कष्टों एवं पापों का निवारण कर पुण्य कमाते हैं। इसके अलावा महाशिवरात्रि पर हर वर्ष यहां राज्य स्तरीय समारोह का आयोजन किया जाता है जो पांच दान तक चलता है। इसमें रात को रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों को देखने के लिए हजारों की संख्या लोगों की भीड़ उमड़ती है। देश के कोने-कोने से शिव भक्तों के साथ-साथ विदेशी पर्यटक भी  आते हैं और मंदिर की सुन्दरता को देखकर भाव-विभोर हो जाते हैं।

लाखों लोगों की इस विशाल शिव मंदिर और स्वामी संस्थापक ब्रह्मलीन कृष्णानंद परमहंस जी के समाधि स्थल पर अगाध श्रद्धा व अटूट विश्वास है।  आकर हर व्यक्ति शांति महसूस करता है। बाबा परमहंस एक गुफा में रहते थे। जटोली मंदिर में पहले पानी की समस्या थी, गांव में पानी की कमी से पूरा सूखा पड़ा रहता था। लोगों को कई किमी चल कर पानी भरने जाना पड़ता था, तो  आए स्वामी कृष्ण चंद ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की और त्रिशूल के प्रहार से जमीन में से पानी निकाल दिया, तब से लेकर अब तक जटोली में पानी की कोई समस्या नहीं हुई और साथ ही लोगों का यह अटूट विशवास है कि शिव की तपस्या के बाद बाबा ने पानी निकाला है। यह मंदिर शिव भक्तों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। इस मंदिर के गर्भ-गृह में प्रवेश एक डयोढ़ी से होता है, जिसके सामने एक बड़ा वर्गाकार मंडप बना है, और उत्तर और दक्षिण दोनों तरफ बड़े छज्जे बने हैं।

मंडप के अग्र भाग में चार स्तंभों पर टिका एक छोटा बरामदा है, जिसके सामने ही पत्थर के छोटे मंदिर के नीचे खड़े हुए विशाल नंदी की मूॢत है। पूरा मंदिर एक ऊंची दीवार से घिरा है और दक्षिण और उत्तर में प्रवेश द्वार हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों में मूॢतयों, झरोखों में कई देवी-देवताओं की मूॢतयां हैं। बहुत सारे चित्र दीवारों में नक्काशी करके बनाए गए हैं। बरामदे का बाहरी द्वार गर्भ-गृह को जाता है। जबकि अंदरूनी द्वार सुंदरता और महत्व को दर्शाते अनगिनत चित्रों से भरा पड़ा है। यहां पर मंदिर का कार्य निरंतर चलता आ रहा है। वर्ष 1983 में जब स्वामी जी ने समाधि ले ली और इसका कार्य मंदिर प्रबंधन कमेटी देखने लगी। खास बात यह है कि करोड़ों रुपए की लागत से बने इस मंदिर का निर्माण जनता द्वारा दिए गए पैसे से ही हुआ है। यहीं वजह है कि मंदिर का निर्माण कार्य पूरा होने में ही तीन दशक से भी अधिक का समय लग गया। मंदिर देश की दक्षिण शैली के आधार पर बनाया गया है।मंदिर में कला और संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

कहते हंै बरसों पहले स्वामी महाराज ने यहां पहाड़ी की गुफा ने तपस्या आरंभ की और उनके तप के प्रताप से यह स्थान लोगों की आस्था का केंद्र बन गया। उनके जन परोपकार और प्रभु शक्ति से लोगों की श्रद्धा बढ़ती गई, जिसके बाद उन्होंने यहां विशाल मंदिर का सपना संजोकर लोगों के सहयोग से मंदिर निर्माण शुरू करवाया। इसे योगानंद आश्रम जटोली का नाम देकर इसके प्रबंधन के लिए समिति का गठन किया। वर्ष 1983 में बाबा ब्रह्मालीन हो गए और बाद में उनके शिष्यों की इसी समिति ने मंदिर निर्माण पूर्ण करवाकर उनके प्रति गुरु दक्षिणा सा कार्य किया है।

जटोली शिव मंदिर धाॢमक आस्था का ही केंद्र नहीं, बल्कि इसके कई महत्व हैं। योगानंद आश्रम के परिसर की जिस गुफा में स्वामी महाराज ने साधना की थी, वहां आज भी ओजमयी वातावरण है और इसमें प्रवेश करते ही मनुष्य का चित परम शांति प्राप्त करता है। उनके तपोबल से पकट पवित्र जलधारा सुखताल कुंड के जल के सेवन से न केवल असाध्य रोग ठीक होते हैं, बल्कि नित्य-नियम जल ग्रहण करने से मनवांछित फल भी मिलते हैं। यहं निॢमत ब्रह्मलीन स्वामी की समाधि, मंदिर परिसर का  वातावरण और क्षेत्र की आलौकिकता साधु-संतों व लोगों को आकॢषत करता है।

इसके अलावा यहंा नवनिॢमत विशाल शिव मंदिर देवी-देवताओं की विभिन्न मूॢतयों सहित धाॢमकता ही नहीं भवन निर्माण एवं मंदिर शैली का भी बेजोड़ नमूना है। प्रसिद्ध धारणाओं के अनुसार माना जाता है की भगवान शिव ने इस जगह की यात्रा की और यहां पर एक रात के लिए विश्राम किया। इस पवित्र स्थान पर स्वामी कृष्णानंद परमहंस जी ने अपने तपोबल से एकजल कुंड उत्पन्न किया, जटोली मंदिर में पहले पानी की बहुत समस्या रहा करती थी वहां के निवासिओं को बहुत दूर से पैदल चलकर पानी लाना पड़ता था। जिसे दिखकर स्वामी कृष्णानंद परमहंस जी ने भगवान शिव की घोर तपस्या की और त्रिशूल के प्रहार से जमीन में से पानी निकाल दिया तब से लेकर अभी तक जाटोली में पानी की कोई समस्या नहीं हुई। इस पानी को लोग चमत्कारी पानी मानते है जो किसी भी तरह की बिमारी को ठीक करने के लिए सक्षम है।

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