विचार मित्र

केवल सुविधावादियों को सन्मति दे भगवान

ललित गर्ग

इन दिनों लगभग पूरा देश प्रचंड गर्मी की चपेट में है। करीब दो तिहाई जनसंख्या इसका कहर झेल रही है। देश भर में गर्मी के कारण अनेक लोगों की मौत हो चुकी है। कहा जा रहा है कि थार रेगिस्तान की ओर से आने वाली गर्म हवाओं के कारण तापमान में लगातार इजाफा हो रहा है। एल्डोराडो वेदर वेबसाइट द्वारा दुनिया के सबसे गर्म 15 शहरों की जारी सूची में 10 भारतीय शहर हैं और बाकी पांच पाकिस्तान के हैं। प्रश्न है कि भारत में ही इतनी गर्मी क्यों पड़ रही है? पर्यावरण एवं प्रकृति के प्रति उपेक्षा का ही परिणाम है यह प्रचंड गर्मी।

मौसम विभाग की भविष्यवाणी और मीडिया की खबरों से जब पता चलता है कि इस बार ये रेकार्ड टूटा, या ये इलाका ज्यादा झुलस रहा है, तब गरमी का अहसास और बढ़ जाता है। यों तो जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों से लेकर राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, तेलंगाना आदि सभी राज्य प्रकृति की इस मार को झेल रहे है। लेकिन इस बार जिस खबर ने गरमी और बढ़ाई वह यह कि राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में गरमी का पचहत्तर साल का रेकार्ड टूटा और पारा उनचास डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। हालांकि राजस्थान के धौलपुर जिले में पारा पचास डिग्री पहुंचने का रेकार्ड पहले से दर्ज है।

गर्मी का अधिक अहसास होने का कारण हमारी सुविधावादी जीवनशैली है। यह गर्मी इसलिये भी बढ़ रही है कि हमने पर्यावरण के प्रति घोर उपेक्षा बरती है। लगातार दी जा रही चेतावनियों को नजरअंदाज किया है। इसी कारण देखने में आ रहा है कि मौसम की मार से निपटने में हम पहले के मुकाबले कहीं न कहीं कमजोर पड़ते जा रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली, खानपान, रहन-सहन के बदलते तौर तरीकों ने हमें मौसम की मार का सामना करने के मामले में कमजोर कर दिया है।

एअर कंडीशनर का ही उदाहरण लें। घर-दफ्तर यहां तक कि सार्वजनिक परिवहन के साधन जैसे बसंे, टैक्सी तक वातानुकूलित हैं। कारें तो अब बिना वातानुकूलित आती ही नहीं हैं। इन वातानुकूलित संयंत्रों से निकलने वाली गैसे ही प्रचंड गर्मी का कारण बन रही है। गरमी से निजात पाने के लिए कस्बों, शहरों और महानगरों में मध्यमवर्गीय परिवार तक दो-दो, तीन-तीन एअर कंडीशनर लगवा लेते हैं। जो ज्यादा संपन्न हैं वे पूरे घर के लिए छोटे एअर कंडीशनर प्लांट तक लगवाते हैं। लेकिन यही एअर कंडीशनर अपनी गरम हवा से वातावरण की गर्मी को और बढ़ाता है, यह कोई नहीं सोचता। देश का बड़ा हिस्सा और तबका ऐसा भी है जो बिना कूलर या एसी के गरमी का सामना करता है। गरमी की तीव्रता तो उतने ही है जितनी पचास-सौ साल पहले थी। बस फर्क इतना ही है कि अब उसका सामना करने के मामले में कमजोर पड़ते जा रहे हैं।

आज चिन्तन का विषय न तो युद्ध है और न मानव अधिकार, न कोई विश्व की राजनैतिक घटना और न ही किसी देश की रक्षा का मामला है और न ही नरेन्द्र मोदी को मिली सुनामी जीत है। चिन्तन एवं चिन्ता का एक ही मामला है लगातार विकराल एवं भीषण आकार ले रही गर्मी, विनाश की ओर धकेली जा रही पृथ्वी एवं प्रकृति के विनाश के प्रयास।

बढती जनसंख्या, बढ़ता प्रदूषण, नष्ट होता पर्यावरण, दूषित गैसों से छिद्रित होती ओजोन की ढाल, प्रकृति एवं पर्यावरण का अत्यधिक दोहन। यह सब पृथ्वी एवं पृथ्वीवासियों के लिए सबसे बडे़ खतरे हैं और इन खतरों का अहसास इस प्रचंड गर्मी की विनाशलीला को देखते हुए सहज ही हो जाता है। प्रतिवर्ष धरती का तापमान बढ़ रहा है। आबादी बढ़ रही है, जमीन छोटी पड़ रही है। हर चीज की उपलब्धता कम हो रही है। आक्सीजन की कमी हो रही है। साथ ही साथ हमारा सुविधावादी नजरिया एवं जीवनशैली पर्यावरण के लिये एक गंभीर खतरा बन कर प्रस्तुत हो रहा हैं।

हमारी सुविधावादी जीवनशैली से निकलने वाली विषैली गैसों के एक ”अणु“ में ओजोन के लाख अणुओं को नष्ट करने की क्षमता है। इन खतरों से हम सब वाकिफ हैं, पूरे देशवासियों को इस बार गहरे रूप में झकझोरा है। प्रचंड गर्मी में जीवन होम करने एवं पृथ्वी को विनाश की सीमा तक जाने से पहले बहुत कुछ करना चाहते हैं। पर कैसे लौटा पाएंगे देश को 20-30 साल पहले की स्थिति मंे? कैसे रोकेंगे कार्बन डाईआक्साइड और मिथेन गैस के उत्र्सजन को। लेकिन गरमी का दूसरा भयावह पहलू भी है जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि क्यों नहीं हम मौसम की मार से लोगों को बचा पाते। पिछले बाईस दिनों में गरमी के प्रकोप से आंध्र प्रदेश में पैंतालीस और तेलंगाना में सत्रह लोगों की मौत हो गई। देश के कई राज्यों में बड़ी संख्या में लोग गरमी का शिकार बनते हैं, जिनकी खबर तक नहीं बनती। गरीब तबके के पास गरमी से निपटने के पर्याप्त बुनियादी इंतजाम नहीं होते।

करोड़ों परिवार ऐसे हैं जिनके पास पंखे-कूलर जैसी सुविधा भी नहीं है। पीने का साफ पानी नहीं है। लू लगने पर पर्याप्त चिकित्सा सुविधा तक नहीं मिल पाती। ऐसे में गरमी गरीब को निगल जाती है। यह स्थिति एक लाचार और लापारवाह शासन तंत्र की हकीकत को बयां करती है। गरमी के मौसम में पहाड़ी क्षेत्रों में जंगल धधक उठते हैं। पिछले कई दिनों से उत्तराखंड के जंगल जल रहे हैं। सवाल है कि जब ऐसी घटनाओं से हम हर साल दो-चार होते हैं तो भविष्य के लिए कोई सबक क्यों नहीं लेते।

मौसम विभाग का मानना है कि अगर मॉनसून में बारिश पूर्वानुमान के अनुसार नहीं होती है तो 2019 बीते साल से भी ज्यादा गर्म होगा। भारी गर्मी अपने साथ जल संकट भी लाती है। पिछले कुछ वर्षों से बार-बार सूखे का सामना कर रहे महाराष्ट्र के विदर्भ और उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में पीने के पानी की समस्या बढ़ गई है। इन इलाकों के कई जलाशयों में पानी का स्तर क्षमता का 10 फीसदी ही रह गया है, जिससे कुछ फसलें संकटग्रस्त हो गई हैं। सेंट्रल वॉटर कमीशन के मुताबिक पानी का स्तर अभी बीते 10 सालों में सबसे कम है। शासन एवं प्रशासन को बहुत सतर्क रहने की जरूरत है।

उसे न सिर्फ पेयजल उपलब्ध कराने के विशेष प्रबंध करने होंगे बल्कि गर्मी से हो रही बीमारियों से निपटने के उपाय भी करने होंगे। गर्मी के लगातार बढ़ने के कारणों के लिये सरकार जिम्मेवार हैं, लेकिन केवल सरकारी प्रयत्नों से इस संकट से उपरत नहीं हुआ जा सकता। सरकारी प्रयत्नों से भी ज्यादा आवश्यक है-मानव स्वभाव का प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित हो। सहज रिश्ता कायम हो। जीवन शैली में बदलाव आये। हर क्षेत्र में संयम की सीमा बने। हर नागरिक जागरूक हो। हमारे दिमागों में भी जो स्वार्थ एवं सुविधावाद का शैतान बैठा हुआ है, उस पर अंकुश लगे। मनुष्य का आंतरिक रसायन भी बदले, तो बाहरी प्रदूषण में भी 20 से 80 प्रतिशत परिवर्तन आ सकता है, सुख एवं सुविधावाद के प्रदूषण के अणु कितने विनाशकारी होते हैं, सहज ही विनाश का रूप ले रही गर्मी को देखकर कहा जा सकता है। महात्मा गांधी के प्रिय भजन की वह पंक्ति- ”सबको सन्मति दे भगवान“ में फिलहाल थोड़ा परिवर्तन हो- ”केवल सुविधावादियों को सन्मति दे भगवान“।

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