विचार मित्र

नफरत की नींव पर था निरर्थक निर्माण

डॉ दिलीप अग्निहोत्री

गठबन्धन के मामले में सपा बसपा की फितरत में ज्यादा अंतर नहीं है। लेकिन यह उम्मीद नहीं थी कि इस बार दोनों की दोस्ती छह महीने में ही दम तोड़ देगी। कुछ दिन पहले ही तो ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे की तर्ज पर दलीलें पेश की जा रही थी। उत्तर प्रदेश में एक तरफ जीत का पैगाम दिया जा रहा था। मायावती को प्रधानमंत्री बनने का सपना दिखाया जा रहा था। बदले में मायावती अखिलेश को मुख्यमंत्री का पद रिटर्न गिफ्ट के तौर पर दे रहीं थी। चुनाव परिणाम आये तो सपनों का यह महल ताश के पत्तों की तरह ढह गया। फिर दोनों पार्टियों के रिश्तों की सच्चाई दिखाई देने लगी। जिसमें शीर्ष से लेकर जमीन तक तक केवल नफरत थी। एक दूसरों के प्रति अमर्यादित टिप्पणी थी, एक दूसरे पर गंभीर आरोप थे, बुआ बबुआ के संबोद्धन में केवल व्यंग और तंज था। नफरत का यह दौर उत्तर प्रदेश में इतना लंबा चला था कि इस भूलना यहां के लोगों के लिए संभव ही नहीं था। गेस्ट हाउस कांड तो इस अध्याय की पराकाष्ठा के रूप में मौजूद था।

जो बातें पत्थर की लकीर बन चुकी थी, उसे झुठलाने का प्रयास किया गया था। उस पर एक प्रकार का आवरण लगाया गया था। लेकिन चुनाव परिणाम की आंधी ने उसे दूर फेंक दिया। फिर सच्चाई सामने आ गई। अखिलेश यादव ने आवरण के पीछे की सच्चाई को समझने का प्रयास ही नहीं किया। ऐसा लग रहा था जैसे गठबन्धन के लिए वही उतावले है। जबकि मायावती ने पहले ही कहा था कि वह न किसी की बुआ है न कोई उनका भतीजा। सम्मानजनक सीट मिलेगी तभी समझौता किया जाएगा। इस बयान के बाद अखिलेश को समझना चाहिए था कि बसपा गठबन्धन नहीं बल्कि सौदा करना चाहती है। तब संख्या बल के हिसाब से बसपा कमजोर थी। लेकिन मायावती ने ऐसा व्यवहार किया जैसे गठबन्धन की जरूरत बसपा को नहीं सपा को है।

अखिलेश के बयान व भी इस तथ्य को मजबूत बना रहे थे। उनका कहना था कि कम सीट पर भी सपा समझौता करेगी। इसके बाद उनके पूरे परिवार ने बसपा प्रमुख का सम्मान किया। बदले में बुजुर्ग मुलायम सिंह को यह सब नसीब नहीं हुआ। इसका नुकसान भी सपा को ही उठाना पड़ा। यह सही है कि कभी बसपा से मुलायम सिंह ने भी समझौता किया था। लेकिन बदले में तब उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली थी। अखिलेश को समझौते से कुछ भी हासिल नहीं हुआ।

अखलेश यादव चुनाव परिणामों की समीक्षा ही करते रहे, मायावती ने अपना फैसला भी सुना दिया। उन्होंने कहा कि सपा के साथ मिलकर भाजपा का मुकाबला नहीं किया जा सकता। इसलिए सपा के साथ गठबन्धन समाप्त किया जाता है। बसपा अब सभी चुनाव अकेले ही लड़ेगी। इतना ही नहीं मायावती ने सपा के आधर पर प्रहार करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा कि यादव मतदाताओं पर अब सपा का नियंत्रण नहीं रह गया है। अन्यथा अखिलेश की पत्नी व भाई भतीजे चुनाव ना हारते। अखिलेश यादव यादवों का वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं करा सके। मायावती यहीं नहीं रुकी। उन्होंने सपा को मुसलमानों का भी विरोधी बताया। कहा कि अखिलेश यादव ने बसपा से अधिक मुसलमानों को टिकट देने का विरोध किया था। इसप्रकार मायावती ने गठबन्धन तोड़ने के साथ ही सपा को नुकसान पहुंचाने का भी पुरजोर प्रयास किया है।

मायावती ने सीधा आरोप लगाया कि सपा के बेस वोट ने भितरघात किया है। उन्होंने अखिलेश को नसीहत भी दी। कहा कि अखिलेश यादव अपनी पार्टी के हालात सुधारें। अखिलेश का बयान तब आया जब मायावती ने कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा है। उन्होंने कहा कि अगर रास्ते अलग हो चुके हैं तो इसके लिए बधाई और उसका भी स्वागत। मायावती यह ऐलान कर चुकी थीं कि सपा से गठबंधन का फायदा नहीं हुआ। वह यह बताना चाहती थीं कि सपा के भितरघात के बाबजूद उन्होंने दस सीटों पर सफलता प्राप्त की है। मायावती ने अपना चुनावी आकलन पिछली बैठक में ही बता दिया था।

उनका कहना था कि लोकसभा लोकसभा चुनाव में सपा का बेस वोट पूरी तरह गठबंधन के साथ खड़ा नहीं रहा। कन्नौज से डिंपल यादव, बदायूं से धर्मेंद्र यादव औररामगोपाल यादव के बेटे अक्षय का फिरोजाबाद सेहारना के परिणाम बानगी है। यदि बसपा और सपा का बेस वोट जुड़ने से इन उम्मीदवारों को कभी नहीं हारना चाहिए था। सपा का वोट खुद उनसे छिटक गया है। ऐसे में बसपा को उनका वोट कैसे मिला होगा। सपा को बसपा की तरह सुधार लाने की जरूरत है।

सपा के लोगों ने एकजुटता का मौका इस चुनाव में मौका गंवा दिया। उन्नीस सौ तिरानवे में दोनों पार्टियों का गठबन्धन करीब दो वर्ष चला था। तब विधानसभा में सपा को एक सौ नौ और बसपा को छिअतहर सीट मिली थी। मायावती ने खुद का बचाव किया। कहा कि सपा के साथ गठबंधन के लिए बसपा ने सभी पुराने गिले शिकवों को भुलाया। दो हजार बारह से सत्रह तक चली सपा सरकार में दलित विरोधी फैसले हुए थे। कानून कानून व्यवस्था की स्थिति खराब थी। फिर भी बसपा ने गठबंधन धर्म को पूरी तरह निभाया। लेकिन सपा ने ऐसा नहीं किया। ऐसे में सपा का व्यवहार बसपा को यह सोचने पर मजबूर करता है। इस गठबन्धन से भाजपा को हराना असंभव होगा। इसलिए बसपा आगे होने वाले सभी छोटे बड़े चुनाव अकेले अपने बूते पर ही लड़ेगी। इस प्रकार मायावती ने सपा पर तीखे प्रहार के बाद गठबन्धन को अलविदा कहा है।

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