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‘कांग्रेसियत’ से दूर होती कांग्रेस!

स्वतंत्रता से पूर्व और बाद में सबसे अधिक समय तक देश की बागडोर संभालने वाली पार्टी का हाल

पार्टी में अंदरुनी लोकतंत्र खत्म, नेतृत्व के आसपास चंद लोगों का समूह

सेकेंड लाइन लीडरशीप का अभाव, विकल्पहीनता से जूझ रही पार्टी

बीजेपी की राह चलने में हुई और दुर्गति, कभी अन्य दल करते थे अनुसरण

लखनऊ । सभा, महासभा, समाज…जी हां शाब्दिक अर्थ को देखें तो यही कांग्रेस की असल पहचान है। मगर अब इन शाब्दिक कसौटी पर कांगे्रस को कसें तो वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में पार्टी पर अस्तित्व का खतरा मंडराने लगा है। वैसे बता दें कि इसी कांग्रेस ने विश्व के बडे लोकतांत्रिक राष्ट्रों में शुमार भारतवर्ष पर लगातार रिकॉर्ड समय तक शासन किया। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर देश की आजादी और आधुनिक भारत के स्वर्णिम निर्माण काल तक की गवाह रही यह राष्ट्रीय पार्टी। मगर बीते एक दशक से ऐसा क्या और क्यों हुआ कि…इस राष्ट्रीय दल की दशा व दिशा एक तरह से किसी क्षेत्रीय दल के रूप में नजर आने लगी। दरअसल, कांग्रेस अपनी ही कांग्रेसियत से दूर होने लगी। यूपी के ही एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता की मानें तो गांधी-नेहरू के सिद्धांतों पर चलने वाली यह पार्टी भटकाव के पथ पर चली गई है। उनके मुताबिक हमारी तो कांग्रेसियत यही रही कि बलिदान, संघर्ष, जनसंवाद, जनांदोलन और जमीनी धरातल पर पॉलिसी, प्रोग्राम और फिर कार्यान्वयन…मगर आज की कांग्रेस इन सबसे दूर होती चली जा रही है।

सबसे हैरानी की बात तो यह रही कि देश के जिस सबसे बडे दल का अन्य राजनीतिक दल कहीं न कहीं और किसी न किसी रूप में अनुसरण करते रहें…हाल-फिलहाल विगत कुछ दिनों तक यह राष्ट्रीय पार्टी बिना अध्यक्ष के रही और आखिर में फिर से सोनिया को कमान संभालने के लिए आगे आना पड़ा। यानि कहीं न कहीं पार्टी में एक तरह से ‘सेकेंड लाइन लीडरशिप’ का पूरी तरह अभाव सा दिख रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार सुशील शुक्ल का कांग्रेस के वर्तमान चाल-चरित्र पर यही कहना है कि पूरे देश के राजनीतिक फलक पर सिक्का और साख रखने वाली पार्टी पर आज कई प्रकार के संकट छाये हुए हैं। उनके अनुसार पहले तो पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र खत्म हुआ, शीर्ष नेतृत्व ने अपने चहेतों को ‘पॉलिसी मेकिंग टीम’ में ज्यादा जगह दी और ऐसे में नीचे से ऊपर तक विचारों के आदान-प्रदान का सिलसिला थम सा गया और भटकाव की स्थिति बनती चली गई।
वहीं हालिया राजनीतिक फ्रेम में महज देखा-देखी के चक्कर में फंसकर बीते लोकसभा चुनाव को टॉरगेट मानते हुए…कांग्रेस तो बीजेपी की राह चलने लगी। पूरी पार्टी एक तरह से राहुल-प्रियंका पर निर्भर हो गई और दल से जुडे विभिन्न आनुषंगिक संगठन हाथ पर हाथ धरे बैठे रह गये। जबकि मोदी-शाह पर फोकस करते हुए बीजेपी के तमाम संगठन अपने-अपने कार्य क्षेत्रों में जमकर प्रचार-प्रसार में लगे रहें।

अभी भी भाजपा का न तो केंद्रीय नेतृत्व और न ही उसकी प्रदेश की इकाईयां चुपचाप बैठी हुई हैं। इससे इतर कांग्रेस में ऊपर से लेकर नीचे तक संघर्ष का दौर बदस्तूर जारी है। पार्टी से जुडे राजनीतिक जानकारों के अनुसार विकल्पहीनता से जूझ रही वर्तमान कांग्रेस कार्यकर्ताओं के अभाव, पुराने कांग्रेस नेताओं में व्याप्त असंतोष और दिशाहीन आनुषंगिक संगठनों के चलते नहीं उबर पा रही है। वहीं दिन-प्रतिदिन देश-प्रदेश में कांग्रेस के गिरते ग्राफ पर यही मानना है कि जनता व पुराने कांग्रेसियों से दूरी, कार्यकर्ताओं से बात अधूरी और केंद्रीय आलाकमान के आसपास घेराबंदी किये चंद नेताओं की मजबूरी…जैसे विषम परिस्थितियों पर नहीं पार पाया जायेगा तब तक कांग्रेस के दिन बहुरने वाले नहीं हैं।

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