विचार मित्र

अयोध्या विवाद में अब फैसले का इंतजार

संतोष कुमार भार्गव

सर्वोच्च न्यायालय में 40 दिन सुनवाई के बाद अयोध्या विवाद की सुनवाई आखिरकार खत्म हो गई। और संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रखने की घोषणा कर दी। यह अयोध्या पर अभी तक के सबसे लंबे, पेचीदा और नाजुक विवाद की सुनवाई थी। फैसला 17 नवंबर से पहले कभी भी सुनाया जा सकता है, क्योंकि वह प्रधान न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई की सेवानिवृत्ति की तारीख है। अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि साबित होगी, लिहाजा भव्य राम मंदिर निर्माण का रास्ता खुल सकता है। विवादित भूमि मस्जिद बनाने के लिए मुस्लिम पक्षकारों को सौंपी जा सकती है! विवादास्पद भूमि का तीन प्रमुख पक्षकारों में बंटवारा किया जा सकता है, लिहाजा संविधान पीठ इलाहाबद उच्च न्यायालय के 30 सितंबर, 2010 के फैसले को कुछ-कुछ मान सकती है!

विवादास्पद भूखंड पर किसी भी पक्षकार का हक कानूनन साबित न हो पाया, तो संविधान पीठ भूमि को सरकार को सौंपने का फैसला सुना सकती है! सरकार वह भूमि किसे सौंपती है, यह एक अलग सवाल है, लेकिन राम मंदिर और बाबरी मस्जिद को लेकर जो विवाद चल रहा था, संविधान पीठ के फैसले के बाद उसका बुनियादी पटाक्षेप हो सकता है! इंसाफ पाने की आखिरी दहलीज थी संविधान पीठ! हालांकि संसद के अधिकार सर्वोच्च हैं, लेकिन वह कोई सामान्य रास्ता नहीं है।

अपरिहार्य और आपातकालीन स्थितियों में ही संसद संविधान पीठ के फैसले में हस्तक्षेप करना चाहेगी। हालांकि अदालत के भीतर ही संविधान पीठ के फैसले के बाद पुनर्विचार याचिका और क्यूरेटिव रिट पेटिशन के प्रावधान भी हैं, लेकिन ऐसे संवेदनशील फैसलों में संशोधन की गुंजाइश बेहद कम देखी गई है। बहरहाल संविधान पीठ का निर्णय उसका अपना विशेषाधिकार है, लिहाजा सुनवाई खत्म होने के अगले दिन ही पांचों न्यायाधीशों ने संभावित फैसले पर चर्चा भी शुरू कर दी। सभी दलीलें और साक्ष्य पीठ के सामने हैं। अब किसी वकील ने कुंठा और बौखलाहट में कोई नक्शा फाड़ दिया या सुन्नी वक्फ बोर्ड अब मंदिर के लिए जगह देने पर सहमत है और बदले में मस्जिद के लिए अच्छी-सी जगह चाहता है, यह पेशकश भी अब बेमानी है।

मध्यस्थता कमेटी की रपट भी पीठ के सामने है, लेकिन अब पीठ ही सुनवाई समाप्त कर चुकी है। यानी अब फैसले पर कोई विराम या अर्द्धविराम की स्थिति नहीं है। अयोध्या विवाद पर दंगे-फसाद हुए हैं, गोलियां चली हैं, बम फूटे हैं। विभिन्न वारदात में करीब 2000 मासूम मारे जा चुके हैं। हालांकि आज हालात उतने उग्र नहीं हैं, उन्माद के आसार भी नहीं हैं, फिर भी अयोध्या में तनाव सूंघा जा सकता है। अयोध्या सुरक्षा बलों के कारण एक किले में तबदील हो गया है। धारा 144 लगा दी गई है। साधु-संतों और दूसरे पक्षकारों की सुरक्षा-व्यवस्था पुख्ता की जा रही है। माहौल में ‘जय श्रीराम’ से जुड़े नारे गूंज रहे हैं। संतों को विश्वास है कि फैसला प्रभु राम के पक्ष में आएगा, लिहाजा इस बार दीपावली पर अयोध्या में चार लाख दीयों के साथ उत्सव मनाने की तैयारी है।

कोई ऐसा मुस्लिम पक्षकार नहीं है, जो मस्जिद बनाने के दावे कर रहा हो! यानी अयोध्या में आपसी भाईचारे, सौहार्द्र, सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता की अग्नि-परीक्षा होनी है। आशंकाएं हैं कि फैसले के बाद हालात बिगड़ भी सकते हैं। अब जो भी हो, अयोध्या विवाद का पटाक्षेप होना ही है। अब देश की संस्कृति और सभ्यता पर हमला करने वालों, लुटेरों, आक्रांताओं के इतिहास पीछे छूटने वाले हैं।

एक तबका ऐसा भी है, जो अब भी राम मंदिर बनाने की तारीखें घोषित कर रहा है। व्याख्या की जा रही है कि हरिद्वार में आरएसएस के प्रचारकों की जो बैठक 31 अक्तूबर से शुरू होकर चार नवंबर तक चलनी है, उसके आगामी रोड मैप का एजेंडा भी राम मंदिर है। हमारा मानना है कि अब तमाम कयासबाजी बंद होनी चाहिए। आस्था भीतर तक रहनी चाहिए, उसकी सार्वजनिक नुमाइश खतरनाक हो सकती है, अफवाहों पर विराम लग जाना चाहिए और धैर्य से संविधान पीठ के फैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिए। फैसला जो भी हो, वह सभी पक्षों को स्वीकार्य होना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में यही न्यायपालिका पर भरोसे की खूबसूरती है।

अयोध्या के राम मंदिर का मामला देश की सबसे बड़ी पंचायत की चैखट पर फैसले का इंतजार कर रहा है। राम मंदिर का सपना लिये सैकड़ों लोगों की आंखें पथरा गयी हैं। राजनीति के खजाने में समस्या के समाधान के हजार तरीके हैं, मगर युगों से आस्था का केंद्र रही अयोध्या बजाय सुलझने के राजनीतिक मधुमक्खियों में उलझी रही। इस दरम्यान एक विचार ऐसा भी उछला मानो नागफनी के जंगलों से रातरानी की भीनी खुशबू आयी जब इस्लामी पैरोकारों का राम मंदिर के लिए जमीन को उपहार में देने की इच्छा व्यक्त की गयी। मुद्दा महज आस्था और विश्वास का हो, तो धूल-मिट्टी में सने इतिहास को वहीं छोड़ एक नये इतिहास की तरफ बढ़ने का बेहतरीन मौका है।

इस विवाद को लेकर देश ने बड़ी कीमत चुकाई है और तमाम कोशिशों के बावजूद कोई समाधान नहीं निकल पाया। संभावित फैसले को लेकर हार-जीत की दावेदारी के बजाय सुप्रीमकोर्ट के फैसले का सम्मान सभी पक्षों को करना होगा। यह जानते हुए कि देश में सौहार्द व शांति पहली प्राथमिकता है। हमें पूरी दुनिया को यह संदेश  भी देना है कि हम एक परिपक्व राष्ट्र के रूप में व्यवहार करते हैं। यदि कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया होती है तो असामाजिक तत्व उसका फायदा उठा सकते हैं। राजनीतिक दल भी अपनी सुविधा से उपजे हालात की व्याख्या कर सकते हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि पिछले तीन दशक में इस विवाद के चलते देश को जो क्षति हुई, उसकी पुनरावृत्ित न होने पाये। हमें दुनिया को यह संदेश देना होगा कि हम तमाम मतभेदों के बावजूद मनभेद में विश्वास नहीं रखते।

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर पहला बड़ा अदालती फैसला साल 2010 में आया था। तब इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटने का निर्देश दिया था। उसमें से एक हिस्सा रामलला विराजमान को, दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को और तीसरा हिस्सा सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को देने की बात कही गई थी। पर वो फैसला न तो हिंदू संगठनों ने मंजूर किया और न ही मुस्लिम पक्षकारों ने। हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दोनों पक्षों ने देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाया। उसके बाद पिछले 8 सालों से सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे की बारीकियों और पेंचीदगियों को समझने की कोशिश कर रहा है। अब फैसले की घड़ी आ चुकी है।

वास्तव में इस विवाद को हार-जीत और तेरी-मेरी की सियासी घेरेबंदी से बाहर निकालना होगा। वैसे अयोध्या मामले पर फैसले के मद्देनजर उ.प्र. में धारा 144 लगा दी गई है। नतीजा किसी भी पक्ष में जाए, उत्तेजना और निराशा के अतिरेक की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अयोध्या क्षेत्र की संवेदनशीलता से पूरा देश परिचित है। वैसे तो बेहतर होता कि दोनों पक्षों द्वारा विवाद से जुड़े मुद्दों को आपस में सुलझा लिया जाता और इसे वर्ग विशेष की प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाया जाता। सुनवाई से पहले भी शीर्ष अदालत ने समस्या के समाधान के लिये मध्यस्थ पैनल भी नियुक्त किया था। मगर पैनल किसी निष्कर्ष तक पहुंचने में नाकामयाब रहा। दरअसल, इस विवाद को अस्मिताओं से जोड़ने और मानसिकता का हिस्सा बन जाने से मुद्दा बेहद संवेदनशील बन गया है। ऐसे में जो भी फैसला आये, उसका सम्मान होना चाहिए।

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