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कुम्हारों की गुहार, कब आयेंगे अच्छे दिन!

सिंगल यूज प्लास्टिक बंद होने का मिला फायदा, मिट्टी के दीयों व कुल्लड़ की बढ़ी मांग

तालाबों के पट्टे के लिये पड़ता है जूझना, मिट्टी इकठ्ठा करने में छूट जाते हैं पसीने

लखनऊ। भारतवर्ष में दीपावली को बड़े पर्व के रूप में मान्यता दी जाती है। दीपावली के समय कुम्हारों के चेहरे खिल जाते हैं क्योंकि दीया, दीपक, कुल्लड़ और मिट्टी की घरिया और खेल-खिलौने बनाने का काम विश्वकर्मा पूजा से कुम्हारों के बीच शुरू हो जाता है। प्रदेश की राजधानी सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के कुम्हार भी इस बार दीवाली को लेकर अपनी तैयारी शुरू कर दिये हैं। अबकी दीवाली कुम्हारों के लिये इसलिये खास लग रही है क्योंकि सिंगल यूज प्लास्टिक को प्रतिबंधित करने के चलते फिर से बाजार-हाट में मिट्टी के दीये व खेल-खिलौनों की डिमांड बढ़ गई है। बख्शी का तालाब यानि बीकेटी स्थित बिकामऊ खुर्द में इस समय कुम्हारों द्वारा जोर-शोर के साथ दिया, दीपक बनाने के पारंपरिक तरीके ने जोर पकड़ लिया है। यहां के कुम्हार हरिबाबू ने बताया कि तालाबों से किस प्रकार दीया बनाने वाली मिट्टी बनाई जाती है। उन्होंने बताया कि पहले तालाब से मिट्टी इकट्ठा की जाती है और उसके पश्चात कूट पीसकर मिट्टी को छान लिया जाता है उसके उपरांत पानी डालकर भिगोया जाता है तब वह दीया लायक बनाने के काम की होती है।

कुम्हारों के लिए सरकार का तोहफा
यहां के तमाम कुम्हारों के अनुसार सरकार द्वारा इलेक्ट्रॉनिक चाक मसान दी गई है जिससे चक्का घुमाना नहीं पड़ता और कार्य भी जल्दी-जल्दी हो रहा। उनके मुताबिक विश्वकर्मा पूजा से अब तक हजारों की संख्या में दीपक बनाकर रख दिए गए और पकाने की प्रक्रिया जल्द ही की जा रही। हरिबाबू के साथ ही गांव की अन्य कुम्हार सुशील, रामस्वरूप भी दीपावली की तैयारियां करने में जुटे हैं।

बढ़ी कुल्लड़ की डिमांड
कुम्हारों ने प्रधानमंत्री का तहे दिल से धन्यवाद दिया और बताया कि सिंगल यूज प्लास्टिक व प्लास्टिक के गिलास बंद होने पर हमारे कुल्लड़ की डिमांड बढ़ गई और इससे बाजारों में बिक्री बढ़ेगी जिससे हमें फायदा होगा। प्लास्टिक के गिलासों के कारण कुल्लड़ का उपयोग कम होता था पर प्लास्टिक के ग्लास बंद होने पर अब फायदा जरूर मिलेगा ।

सरकारी तालाबों पर दबंगों का कब्जा
बीकेटी के ग्राम पंचायत सरसवा रामप्रसाद प्रजापति ने बताया तालाब के लिये मिट्टी का पट्टा हुआ था, लेकिन उसके बाद भी नहीं मिल पा रहा है उस पर अधिकार। इन लोगों ने जानकारी देते हुए बताया कि 2006 में पट्टा हुआ था पर हम मिट्टी तब भी बाहर से ही लाते है और कुछ तथाकथित दबंगों ने तालाब को अपने कब्जे में ले रखा है।

जल्द ही दीये की बिक्री से रौशन होंगे बाजार
इसी तरह बीकेटी, इटौंजा कुम्हरावा, पहाड़पुर क्षेत्र में लगातार मेहनत कर रहे कुम्हार सबसे ज्यादा कुम्हारों की जरुरत शादी-विवाह और दीपावली आदि में होती है। इस समय ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों तक हर तरफ दीया बनाने का काम कुम्हारों का चल रहा है, ऐसे में जल्द ही सड़कों पर दीया और दीपक बिकते नजर आने लगेंगे।
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प्लास्टर आफ पेरिस से बनी मूर्तियों की भी है डिमांड
सरोजनीनगर । सरोजनीनगर विकासखंड की ग्राम पंचायत लोनहां में दीपावली नजदीक आते ही कुम्हारों ने अपनी तैयारियां जोरों पर चला कर मिट्टी का कार्य कर रहे है। दीपावली पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों के चाक ने गति पकड़ ली और उन्हें इस बार अच्छी बिक्री होने की उम्मीद नजर आ रही है । ग्रामीण व शहरों में स्थित कुम्हारों की मोहल्ले व बस्ती में उनके परिवार मिट्टी का सामान तैयार करने में व्यस्त रहते हैं। अब प्लास्टर आॅफ पेरिस की मूर्तियां भी बाजार में आने लगी है जिनमें फिनिशिंग काफी बेहतर दिखाई देती है ऐसे में लोग प्लास्टर आॅफ पेरिस की मूर्तियों को खरीदने लगे हैं। प्लास्टर आॅफ पेरिस की मूर्तियों की कीमत काफी अधिक है। पर माटी की मूर्तियां 30 रुपये से लेकर 200 रुपये तक कि मूर्तियां बिकती है जबकि और भी अधिक बेहतर व बड़ी मूर्तियों की कीमत इससे ज्यादा है ।

लोनहां निवासी कुम्हार शिवबालक ने बताया कि गणेश लक्ष्मी की मूर्तिया बनाने के लिए 2 किलोमीटर दूर दूसरे गांव से काली मिट्टी लाना पड़ता है । फिर उससे गणेश लक्ष्मी की मूर्ति तैयार की जाती है । सरकार द्वारा निर्धारित किया गया था कि तालाब कुम्हारों को स्वीकृति किये जाएंगे । चार साल ब्यतीत होने के बावजूद को अभी तक कुम्हारों को सरकार द्वारा तालाबों की स्वीकृति नही हो पाई है। शिवबालक ने कहा गणेश लक्ष्मी की मूर्तिया बनाने में ज्यादा लागत लगती है । इससे बस घर का गुजारा ही हो पाता है। गणेश लक्ष्मी की मूर्तियों की कीमत 30 से 50 रुपये जोड़ी में बाजारियों को देते व बेचते है ।
ललित प्रजापति ने बताया कि लोनहां गांवों में 6 ही घर है जो इस पेशे से जुड़े हुए है और मिट्टी का काम करते है और अपनी कला से कई प्रकार के आकर्षक वैरायटी व स्टाइलिश गणेश लक्ष्मी की मूर्ति व दीये बनाते हैं । राकेश प्रजापति बताते हंै कि सारे दिन में 1000 से 1200 तक के दीये बना पाते है जबकि घर के लोग भी लगते है । लागत ज्यादा होने से कइयों ने अब सब्जी व टिक्की बतासे के ठेला लगाना शुरू कर दिया ।

500 से 900 रुपये में मिलती है मिट्टी की ट्राली
कुम्हारों को मिट्टी के गणेश लक्ष्मी की मूर्तियां व बर्तन दीये बनाने के लिए मिटटी तक खरीदनी पड़ती है । तालाब होने से जहां एक ओर कुम्हारों को मुर्तिया व दीये बनाने को मिट्टी खरीदनी नहीं पड़ती । वही अब तालाब पटने से कुम्हारों को मिटटी की ट्रालियां खरीदनी पड़ती है वही मूर्तियो व दीये बनाने के लिए काली व चिकनी मिटटी का प्रयोग किया जाता है ।

कुम्हारों को ईंधन पड़ता है महंगा
मिट्टी चाक पर चढ़ने के बाद एक रूप दे देते है पर उसको पक्का करने के लिए मिट्टी को पकाया जाता है । पहले ईंधन इतना महँगा नही था । पर अब ईंधन ने भी कुम्हारों का पसीने छुड़ा देता है। कुम्हारों को एक पल की भी फुर्सत नहीं मिल पाती है। इस बार गणेश लक्ष्मी की मूर्तियों से लेकर दिए तक की मांगचल रही है । गणेश लक्ष्मी की मूर्तियो को अगले साल के लिए भी बनाने की व्यवस्था शुरू हो गई है । अगले साल की मांग करने लगे है। कुम्हारों को दीये व गणेश लक्ष्मी की मूर्तियों का रूप दे देते है पर उसको पकाने के लिए ईंधन महंगा हो गया है । 300 रुपये सैकड़ा आता है 8 से 10 किलो प्रति किलो भूसी पहुंच गई है कुम्हारों को 1 दिन में दो से तीन हजार दिए बना लेते हैं जिसे पकाने में दो से ढाई सौ का खर्च आता है । थोक में 400 से 500 सौ प्रति हजार की आय हो जाती है।

मिट्टी लाने के लिये बहाना पड़ता है पसीना
कुम्हारों को कच्ची मिट्टी को दूरदराज से लाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है । तब लाभ खत्म होने से उपयुक्त मिट्टी मिलने के लिए भी लाले लग जाते हैं। बारिश से पहले दूरदराज के तालाबों सेमिट्टी निकाल कर लानी पड़ती है। दीपावली की तैयारी में कुम्हारों को मिट्टी निकालना बेहद मुश्किल होता है।
सरकार ने कुम्हारों की परेशानी को देखते हुए जिला प्रशासन की ओर से कुम्हारों को तालाब के पट्टे करने के लिए कहा गया था । लेकिन इस कला से जुड़े परिवारों को भी सरकार चाहे तो अच्छे दिन आ सकते है। कुम्हारों के तालाब के पट्टे की फरियाद तो हर वर्ष लगाते हैं पर जिला प्रशासन की ओर से कुछ नही हो पाता है । दीपावली की तैयारियों पर दीपोत्सव पर शहरों से गांव तक जलने वाले दीयों को तैयार करने का काम जोरों पर चल रहा है सरोजनीनगर ब्लॉक के गांवो में लोनहा ,खुर्रमपुर , बेहटा , ऐन , बादे खेरा, अमौसी ,कुरौनी ,हिंदुखेरा, भटगांव सहित तमाम गांवो में अधिक तर परिवार दीयों को आकार देने में दिन रात एक किये है । कुम्हारों का कहना है कि सरकार द्वारा अभी तक न तो तालाब मिले न ही इलेक्ट्रिक चाक सरकार से मिल सके जिससे निराशा ही मिली ।

50-60 रुपए सैकड़ा बिकते हैं दीये
कुम्हारों ने भी अपनी बेटी के बड़े दीये की अलग अलग वैरायटी बनाने लगे है । रामचन्द्रर प्रजापति ने बताया कि हम दीये 50 रुपए सैकड़ा में बेचे जाते हैं । जबकि बड़े एक दीये की कीमत 3रुपए से 5 रुपये की है। सप्ताहिक बाजारों व शहरों में कुम्हारों के सामने दिए और मोतियों को बनाना ही परेशानी के सबब नहीं बल्कि मूर्तियों और दीयों की बिक्री करने में कुम्हारों को काफी दिक्कतें होती हैं । धनतेरस से लेकर दीपावली के दिन तक 3 दिन वह लोग बाजार में मूर्तिया और दीयों की बिक्री करते हैं ऐसे में बाजार में जिस किसी भी दुकान के सामने फुटपाथ पर मूर्ति व दीये की बिक्री करते हैं । कुम्हारों को भी किराया देना पड़ता है । जिसमें दुकानदार के सामने फुटपाथ पर लागने के लिए कुम्हारों को 1000 रुपयों से लेकर 1500 तक की वसूली देते है। मिट्टी लाने एवं दिए बनाने से लेकर पकाने में जो खर्च होता है । उसके हिसाब से लाभ नहीं होता है। हम लोग सीजन के बाद अन्य काम करने लगते हैं । इस कला को बचाने के लिए सरकारी मदद दी जानी चाहिए । जिससे हमारी मिट्टी गढ़ने की कला बची रहें

 

मोटर चाक की है दरकार
कुम्हारों को सरकार से मोटर चौक की मांग राकेश प्रजापति का कहना है कि हाथ वाले चौक से प्रत्येक दिन 1200 से 1500 सौ हजार दिए बनाते हैं अगर सरकार कुम्हार समाज को मोटर चाक देती है तो एक दिन में 2000 से 3000 दिए तैयार हो सकते हैं । साथ ही कम मेहनत के साथ समय भी बचत होगी। सरकार से मांग हमें मोटर चाक है जो जिला प्रशासन से जल्द से जल्द उपलब्ध कराएं । विजय सिंह का कहना है कि दीपावली में मिट्टी के दीए का काफी महत्व है मंदिरों में पूजा-पाठ के साथ घरों में मिट्टी के दीए का प्रयोग करना चाहिए। शुद्धता का प्रतीक है इसलिए इसे प्राथमिकता दी जाती है। हिंदू धर्म में मिट्टी के दिए को पवित्र माना गया है । इसी उद्देश्य से वे दीपावली और छठ पर्व में मिट्टी के दिए का प्रयोग लोगों द्वारा करना चाहिए। मिट्टी के बने दिए कम पैसे में अच्छे मिलते हैं।

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