विचार मित्र

नैतिकता का दीप बुझने न पाए

ललित गर्ग

नरेन्द्र मोदी सरकार ने देश में एक नयी चुस्त-दुरूस्त, पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार मुक्त कार्यसंस्कृति को जन्म दिया है, इस तथ्य से चाहकर भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। न खाऊंगा का प्रधानमंत्री का दावा अपनी जगह कायम है लेकिन न खाने दूंगा वाली हुंकार अभी अपना असर नहीं दिखा पा रही है। सरकार को भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये सख्ती के साथ-साथ व्यावहारिक कदम उठाने की अपेक्षा है। पिछले साठ वर्षों की भ्रष्ट कार्यसंस्कृति ने देश के विकास को अवरूद्ध किया।

आजादी के बाद से अब तक देश में हुये भ्रष्टाचार और घोटालों का हिसाब जोड़ा जाए तो देश में विकास की गंगा बहायी जा सकती थी। दूषित राजनीतिक व्यवस्था, कमजोर विपक्ष और क्षेत्रीय दलों की बढ़ती ताकत ने पूरी व्यवस्था को भ्रष्टाचार के अंधेरे कुएं में धकेलने का काम किया। देखना यह है कि क्या वास्तव में हमारा देश भ्रष्टाचारमुक्त होगा और क्या विदेशों में जमा काला धन देश में लौटेगा? यह प्रश्न आज देश के हर नागरिक के दिमाग में बार-बार उठ रहा है कि किस प्रकार देश की रगों में बह रहे भ्रष्टाचार के दूषित रक्त से मुक्ति मिलेगी। वर्तमान सरकार की नीति और नियत दोनों देश को भ्रष्टाचारमुक्त बनाने की है, लेकिन उसका असर दिखना चाहिए।

विभिन्न राजनीतिक दल जनता के सेवक बनने की बजाय स्वामी बन बैठे। मोदी ने इस सड़ी-गली और भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने का बीड़ा उठाया और उसके परिणाम भी देखने को मिले। प्रधानमंत्री का स्वयं को प्रधानसेवक कहना विपक्ष के लिये जुमलेबाजी का विषय हो सकता है। लेकिन यह भी सच है कि इससे पहले किसी भी प्रधानमंत्री ने ऐसी जुमलेबाजी करने का साहस भी नहीं जुटाया। मोदी ने देश के आम आदमी को यह एहसास तो करा दिया कि प्रधानमंत्री सबसे ताकतवर व्यक्ति नहीं बल्कि देश का सबसे शक्तिशाली सेवक होता है। लोकतंत्र में लोक विश्वास, लोक सम्मान जब ऊर्जा से भर जाए तो लोकतंत्र की सच्ची संकल्पना साकार लेने लगती है। मोदी ने लोकतंत्र में लोक को स्वामी होने का एहसास बखूबी कराया है। लेकिन प्रश्न यह है कि यही लोक अब तक भ्रष्टाचार के खिलाफ जागृत क्यों नहीं हो रहा है? जन-जागृति के बिना भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता।

यह एक बड़ा यथार्थ है कि सरकार की काम करने की नीयत में कोई खोट नहीं है। देखा जाए तो नीति, नीयत और निर्णय यह तीन गुण किसी भी सफल लोकतंत्र व राष्ट्र के उत्तरोत्तर विकास एवं प्रगति के लिये आवश्यक होते हैं। मोदी सरकार की नीतियों में जन कल्याण, जन सम्मान, राष्ट्र गौरव की नीयत और निर्णय स्पष्ट दिखाई देते हैं। देश के सम्मान, समृद्धि और सुरक्षा के संकल्प को हकीकत में बदलने का काम मोदी सरकार कर रही है। लेकिन एक प्रश्न यहां यह भी खड़ा है कि भाजपा की प्रांत सरकारें भ्रष्टाचार के आरोपों से क्यों घिरी है? देखा जाए तो भ्रष्टाचार किसी भी राज्य को कई स्तर पर कमजोर करता है। इसके कारण कामकाज में देर होती है। इसका असर उत्पादन से लेकर अन्य परिणामों पर पड़ता है। योग्य लोग नजरअंदाज कर दिये जाते हैं और अयोग्य लोगों के हाथों में कमान आ जाती है। भ्रष्टाचार के कारण ही देश में प्राकृतिक संपदा एवं जनधन की लूट होने के आरोप भी लगते रहते हैं। विभागीय अधिकारी मोटी रकम खाकर गलत ढंग से ठेके दे रहे हैं तो कहीं बिना काम हुए ही ठेकेदारों का भुगतान हो जाता है। इन त्रासद स्थितियों से सरकार के प्रति नकारात्मक सोच तो बनती ही है, साथ ही आम लोग मानसिक तौर पर कुंठित एवं निराश भी होने लगते हैं।

भ्रष्टाचार और काले घन के खिलाफ जो माहौल बना निश्चित ही एक शुभ संकेत है देश को शुद्ध सांसें देेने का। क्योंकि हम गिरते गिरते इतने गिर गये कि भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार बन गया। राष्ट्रीय चरित्र निर्माण, नैतिकता, पारदर्शिता की कहीं कोई आवाज उठती भी थी तो ऐसा लगने लगता है कि यह विजातीय तत्व है जो हमारे जीवन में घुस रहा है। जिस नैतिकता, प्रामाणिकता और सत्य आचरण पर हमारी संस्कृति जीती रही, सामाजिक व्यवस्था बनी रही, जीवन व्यवहार चलता रहा, वे आज लुप्त हो गये हैं। उस वस्त्र को जो राष्ट्रीय जीवन को ढके हुए था आज हमने उसे तार-तारकर खूंटी पर टांग दिया है।

मानों वह हमारे पुरखों की चीज थी, जो अब इतिहास की चीज हो गई। लेकिन देर आये दुरस्त आये कि भांति अब कुछ संभावनाएं मोदी ने जगाई है, इस जागृति से कुछ सबक भी मिले हैं और कुछ सबब भी है। इसका पहला सबब तो यही है कि भ्रष्टाचार की लडाई चोले से नहीं, आत्मा से ही लड़ी जा सकती है। दूसरा सबब यह है कि धर्म और राजनीति को एक करने की कोशिश इस मुहिम को भोंथरा कर सकती है। तीसरा सबब है कि कोई गांधी या कोई गांधी बन कर ही इस लड़ाई को वास्तविक मंजिल दे सकता है। एक सबब यह भी है कि कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों से भ्रष्टाचारमुक्ति की आशा करना, अंधेरे में सूई तलाशना है।

आदर्श सदैव ऊपर से आते हैं। लेकिन आजादी के बाद की सरकारों एवं राजनीतिक दलों के शीर्ष पर इसका अभाव रहा है। वहां मूल्य बने ही नहीं हैं, फलस्वरूप नीचे तक, साधारण से साधारण संस्थाएं, संगठनों और मंचों तक स्वार्थ सिद्धि और नफा-नुकसान छाया हुआ रहा है। सोच का मापदण्ड मूल्यों से हटकर निजी हितों पर ठहरता गया है। यहां तक धर्म का क्षेत्र एवं तथाकथित चर्चित बाबाओं की आर्थिक समृद्धियों ने इस बात को पुष्ट किया है। क्योंकि वे खुद संन्यासी होने के बावजूद फकीर नहीं रह पाए। वह अरबपति बन गये, कारोबारी होे गये, कोरपोरेटर हो गये। उन्होंने तो भारतीय परम्परा के अध्यात्म और योग को एक प्रोडक्ट बना दिया। वे इतने ताकतवर हो गये कि वे और उनका साम्राज्य बिना किसी सरकार के सरकार बन गये। इन बाबाओं ने भारत की आदर्श परम्पराओं, सांस्कृतिक मूल्यों और अध्यात्म को बेचने से भी कोई परहेज नहीं किया है।

इन बाबाओं के साथ जो विडम्बना है वह यह है कि वे यह सब करते हुए भी गांधी बनना चाहते हैं, गांधी दिखना चाहते हैं। पैसा और ताकत ही अगर देश में ज्वार पैदा कर पाते, तो आज तक कई अरबपति देश की सत्ता पर काबिज हो गये होते, कोई चाय बेचने पर प्रधानमंत्री नहीं बन पाता। यही लोकतंत्र की विशेषता एवं प्राण ऊर्जा है, जिस पर देश टिका है। लेकिन बाबाओं के काले कारनामों के बावजूद सत्ता इनको पूजती है, इनकी हरकतों एवं काले-धंधों को प्रश्रय देती है, यह विरोधाभास एवं विडम्बना भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को असरकारक नहीं होने दे रही है, इस पर गंभीर चिन्तन की अपेक्षा है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लडते हुए हमें मर्यादाओं का पालन करना होगा। महात्मा गांधी ने कहा था कि साधन की पवित्रता ही साध्य की पवित्रता का निर्धारण करती है। यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाला कोई भी व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों या इस मिशन के खिलाफ खड़े लोगों के बाणों या वारों से अपने आक्रोश को नियंत्रित रख पाने में असहजता महसूस करते हैं तो भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम कारगर नहीं हो पायेगी।

भ्रष्टाचार की चरम पराकाष्ठा के बीच मोदी रूपी एक छोटी-सी किरण जगी है, जो सूर्य का प्रकाश भी देती है और चन्द्रमा की ठण्डक भी। और सबसे बड़ी बात, वह यह कहती है कि ‘अभी सभी कुछ समाप्त नहीं हुआ। अभी भी सब कुछ ठीक हो सकता है।’ मोदी स्वस्थ और आदर्श मूल्यों को स्थापित करने के लिये संकल्पबद्ध है, उनका भ्रष्टाचार की सफाई का अभियान कोई रणनीति नहीं है, जिसे कोई वाद स्थापित कर शासन चलाना है।

यह तो इंसान को इन्सान बनाने के लिए ताजी हवा की खिड़की है। किंपलिंग की विश्व प्रसिद्ध पंक्ति है-‘पूर्व और पश्चिम कभी नहीं मिलते।’ पर मैं देख रहा हूं कि मोदी सरकार, जनता और जन-संगठन मिलकर संवाद स्थापित कर रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ खडे़ लोग एक दूसरे के कान में कह रहे हैं, इस देश ने भ्रष्टाचार की अनेक आंधियाँ अपने सीने पर झेली हैं, तू तूफान झेल लेना, पर भारत की ईमानदारी, नैतिकता एवं सदाचार के दीपक को बुझने मत देना।

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