विचार मित्र

बढ़ती जनसंख्या एक अभिशाप

डा सी बी उपाध्याय

व्यक्तिगत हित और राष्ट्रहित चिंतन में बहुत बड़ा अंतर है, उतना ही जितना व्यक्ति और समष्टि मैं होता है। जब व्यक्ति समष्टि चिंतन में लग जाय तो समझना चाहिए कि व्यक्ति राष्ट्रहित चिंतक है। एक एक व्यक्ति का विकास राष्ट्र के विकास में योगदान है। राष्ट्र के विकास में व्यक्तिगत हित चिंतन के साथ राष्ट्र की विकास धारा प्रवाह में योगदान सुनिश्चित करना होगा। आज राष्ट्र के प्रति चिंतकों की कतार लंबी हो रही है, किंतु विकास केवल सोचने से नहीं अपितु करने से होगा। आज जो विकास में सबसे बड़ी बाधा है वह है बढ़ती हुई जनसंख्या।

जनसंख्या बढ़ रही है जमीन घट रही है, बढ़ती जनसंख्या एक अभिशाप बनती जा रही है उपजाऊ जमीनों एवं जंगल काटकर घर व मुर्दाघर बनते जा रहे हैं इस प्रकार जनसंख्या विस्तार से जमीन घटती व सिकुड़ती जा रही है। समाज व राष्ट्र चिंतक केवल विकास की बात करते हैं विधानसभा व लोकसभा में सभी विषयों पर चर्चा की जाती है केवल बढ़ती जनसंख्या को छोड़कर। भारतवर्ष में कुछ धर्म व संप्रदाय के लोग देश का कानून मानने को तैयार नहीं, वो केवल अपने का धर्म का कानून मानते हैं। जब किसी देश में एक राष्ट्र एक कानून नहीं होगा, तो निश्चित रूप से मानिए, वह राष्ट्र कुछ मायने में भले ही विकास की ओर अग्रसर हो किंतु सर्वांगीण विकास तो नहीं कर सकता है। सर्वांगीण विकास के लिए एक देश एक कानून का होना अनिवार्य है।

कोई भी देश कानून से चलता है भारतवर्ष ही एक ऐसा देश है जहाँ कभी कभी शरिया जैसे कानून भी दखल होता है। एक तरीके से देखा जाय तो यह दखल भारत के विकास में दखल है। राष्ट्र की अस्मिता पर चोट भी, इसलिए सर्वप्रथम इस देश में एक राष्ट्र एक कानून का होना अनिवार्य है, और यह तब तक संभव नहीं है जब तक इसे वोट की राजनीति से परे ना देखा जाए। कुछ राजनीतिक दल राष्ट्र के विकास के नाम पर कलंक है क्योंकि राष्ट्रहित चिंतन व विकास में जब सभी दल दलदल से ऊपर उठकर एक स्वर से एक स्वर गुंजायमान नहीं करेंगे तब तक भारत का भाग्य विधाता रूठा ही रहेगा।

सर्वप्रथम रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य से संपन्न राष्ट्र विकास की गौरव गाथा लिखेगा और तभी संभव है, जब जनसंख्या पर नियंत्रण पाया जाए। एक दिन में लाखों बच्चों का जन्म केवल जन्म ही नहीं अपितु उस बच्चे के विकास में विभिन्न संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है। रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ्य और नौकरी की,  जिसके  लिये जनसंख्या बहुत बड़ी बाधक है। बढ़ती हुईं जनसंख्या की बाधा को इस प्रकार समझें कि जो व्यवस्था वर्तमान जनसंख्या को लक्ष्य करके कल बनाई गयी थी, वह आज जनसंख्या वृद्धि के कारण टूट कर विखर गयी दिखाई दे रही है। रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय सब जनसंख्या वृद्धि के कारण अल्प पड़ते जा रहै हैं।

जन्मदर बढ़ता जा रहा है मृत्यु दर घटता जा रहा है इसलिए जनसंख्या वृद्धि और भी बेतहाशा बढ़ रही है। शासक पार्टी के साथ समस्त विपक्षी पार्टियों की एकजुटता ही इस संकट का समाधान है। राष्ट्रीय नीतियों पर एक स्वर से राष्ट्र हित में विधान बनाने में सहयोग करना चाहिए।  जहां तक बात समझ में आती है कि कुछ वर्ग धर्म के लोग जनसंख्यात्मक आंदोलन की नीति अपनाकर एक जाति धर्म की जनसंख्या वृद्धि करके जनमत के आधार पर देश पर कुदृष्टि रखना चाहते हैं, यह अपशकुन का ही संकेत है। एक ही परिवार में 40-60 बच्चों तक गिनती को आखिर क्या क़हा जायगा? जनसंख्या वृद्धि पर कठोर कानून संपादित होना चाहिए जिसमें दो बच्चे से अधिक पर जुर्माना और राष्ट्र की दोहरी नागरिकता, राष्ट्र द्वारा प्रदत समस्त सुविधाओं से वंचित करना तथा 5 वर्ष का सश्रम कारावास जैसे दंड विधान से पार पाया जा सकता है।

महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद ने जनसंख्या वृद्धि विस्फोट पर 2 कहानियां लिखी थी कानूनी कुमार (माधुरी अगस्त 1929) तथा गमी (31अगस्त 1929), मुंशी प्रेमचंद जनसंख्या वृद्धि पर गंभीर रूप से चिंतित थे कानूनी कुमार में कहानी का नायक नारी को बच्चा जनने की मशीन मानने की भर्त्सना करता है और पुरुषों को ऐसे अत्याचार के लिए नर हत्या दंड देने की वकालत करता है।

कथा नायक कहता है कि वह संतान निग्रह बिल को असेंबली में पास कराएगा और बिल के अनुसार दो बच्चे से ज्यादा होने पर 5 वर्ष की कैद की सजा और 5 महीने कालकोठरी में रहने का प्रावधान पास कराएगा वह यह भी कहता है कि सौ रुपए से कम मासिक आमदनी (तत्कालीन आर्थिक व्यवस्था के अनुसार) वाले व्यक्ति को संतानोत्पत्ति का अधिकार ना हो और दो संतानों में 7 वर्ष का अंतर हो। उसके अनुसार तभी देश में सुख संतोष का साम्राज्य होगा।  जैनेंद्र कुमार के जब पहला बच्चा पैदा हुआ तो प्रेमचंद ने उन्हें लिखा मैं दो बच्चों तक को बधाई दूंगा और बाद में आगे के लिए सोचूंगा। शायद इसी कारण जैनेंद्र के दो ही बेटे रहे।

गमी कहानी की अंतरात्मा आनंद है। वह आनंद जो सबसे प्रिय है। बेटे और स्त्री से भी प्रिय आनंद, प्यारे मेरे मित्र आनंद की मृत्यु हो गई। तीसरे बालक का जन्म हुआ किंतु इसे मैं आनंद नहीं मृत्यु मानता हूं। गमी  कहानी में पात्र भगीरथ प्रसाद के वृत्तांत से भगीरथ के दो बेटे थे जब तीसरे ने जन्म लिया तो उन्होंने अपने प्रिय जनों जिसमें मुंशी प्रेमचंद जी भी थे को गमी का बुलावा संदेश भेजा। सभी हतप्रभ अपशकुन को मन में लिए नंगे पांव उनके घर पहुंचे।

मुंशी प्रेमचंद भी उनमें थे किन्तु उनके यहां किसी प्रकार का रोना धोना नहीं था। प्रेमचंद के पूर्व भी पहुंचे लोग तख्त पर बैठे आसन्न थे।  थोड़ी देर बाद भगीरथ घर में से पपान, डली, इलायची लेकर निकले तो सब दबे भाव, बोल से अपशकुन के बारे में संकेत से जानना चाहा तब भगीरथ ने सच्चाई उगला कि मेरे आनंद की मृत्यु हो गई है आप लोग जानते हैं कि मेरे पूर्व से 2 पुत्र हैं अब तीसरे ने जन्म लेकर मेरे आनंद की हत्या कर दी है इसलिए यह क्षण  मेरे लिए आनंद का नहीं गम का है क्योंकि इन दोनों के बाद जो थोड़ा समय बचता था टहलने घूमने यार मित्रों से मिलने, आनंद के क्षण भोगने का था, अब उस आनंद की हत्या हो गई। मेरे पास इतना समय नहीं बचा कि इनकी देखभाल परवरिश ढंग से कर सकूं दूध और पौष्टिक भोजन पदार्थ के सेवन से इन्हें बलिष्ठ बना सकूं इसलिए यह मेरा मित्र नहीं शत्रु है।

उपरोक्त तथ्यों एवं कथ्यों  से स्पष्ट है कि व्यक्ति समाज और देश हित में जनसंख्या नियंत्रण पर मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कहानी के माध्यम से तीखी प्रतिक्रिया दी है प्रेमचंद जी प्राकृतिक माध्यमों एवं नसबंदी को भी जनसंख्या नियंत्रण के उपयोग को मानते थे आज जब हम जनसंख्या वृद्धि की त्रासदी से संकटग्रस्त एवं रोग ग्रस्त होते जा रहे हैं तब हमें राष्ट्रहित में जनसंख्या वृद्धि पर एक राष्ट्र एक कानून बनाकर राष्ट्र का कल्याण सुनिश्चित करना चाहिए। अगर सरकार ने शीघ्र ही जनसंख्या की बेतहाशा वृद्धि पर ध्यान केंद्रित नहीं किया तो निश्चित रूप से राष्ट्र को संकटग्रस्त होने से कोई नहीं बचा सकता क्योंकि हम दुनिया में सबसे बड़े लोकतंत्र के घमंड हैं। हर्ष कब होगा जब जनसंख्यात्मक आंदोलन की रीढ़ तोड़ने के लिए, जनसंख्या वृद्धि पर रोक के लिए सख्त कानून तत्काल बनाया जाए।

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