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अयोध्या मामले में अब सियासत नहीं होनी चाहिए

राजेश माहेश्वरी

अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सभी पक्ष संतुष्ट नजर आ रहे हैं। आम आदमी में भी इस फैसले को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। देशभर में जनजीवन सामान्य तरीके से चल रहा है और किसी तरह का कोई तनाव या ंिचता किसी चेहरे पर दिखाई नहीं देती है। लेकिन चंद तत्व ऐसे हैं जो माहौल को खराब करना चाहते हैं। जिन्हें अभी भी इस मुद्दे में सियासत दिखाई देती है। एमआईएम के प्रमुख सांसद असदुद्दीन ओवैसी जहर बुझे तीर छोड़ने से बाज नहीं आये। वहीं कांग्रेस के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ में एक लेख के जरिए संविधान पीठ के फैसले पर सवाल किए गए। हालांकि बाद में मुखपत्र को लिखित माफी मांगनी पड़ी।

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन केे अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भारी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने कहा है कि जिन्होंने बाबरी मस्जिद गिराई, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ट्रस्ट बनाकर राम मंदिर बनाने का काम दे दिया। वह बोले अगर वहां मस्जिद होती तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या होता? वह बोले कि उन्हें 5 एकड़ जमीन की भीख की जरूरत नहीं है। हम अपने अधिकार के लिए लड़ रहे थे, जमीन के लिए नहीं।

उन्होंने कहा कि देश का मुसलमान गरीब जरूर है, लेकिन इतना भी गया गुजरा नहीं है कि 5 एकड़ जमीन ना खरीद सके। वह बोले कि ये मुल्क अब हिंदूराष्ट्र के रास्ते पर जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अयोध्या से इसकी शुरुआत कर दी है और एनआरसी, सिटिजन बिल से इसे पूरा किया जाएगा। उन्होंने तो ये तक कह दिया कि 6 दिसंबर को जो हुआ था उसे ऐसे ही नहीं भूल सकते। वह बोले कि हम अपनी आने नस्लों को बताते जाएंगे कि यहां पर 500 सालों तक मस्जिद थी, जिसे संघ परिवार और कांग्रेस की साजिश के चलते शहीद किया गया, सुप्रीम कोर्ट को धोखा दिया गया था. यही वजह है कि मस्जिद का सौदा नहीं किया जा सकता। ओवैसी के बयान की काफी आलोचना हो रही है। योग गुरु रामदेव ने तो उनके बयान की खुलकर आलोचना की है।

अयोध्या का मामला आज का नहीं है, बल्कि दशकों या यूं कहें कि सदियों पुराना था। हां, बाबरी मस्जिद गिराई जाने के बाद इस मामले ने तूल पकड़ा और हिंदू-मुस्लिम के बीच खाई बना दी। सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है, उससे इस मामले के सभी पक्षकार सहमत हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी तथ्यों और सबूतों के आधार पर फैसला दिया है। किसी भी पक्ष का फैसले से संतुष्ट या असंतुष्ट होना स्वाभाविक है, लेकिन अनुच्छेद 142 के तहत दिया गया यह फैसला हर पक्ष को मानना ही होगा।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि जमीन विवाद में विवादित जमीन हिंदू पक्ष को देने के फैसले के बाद मामले के मुस्लिम पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने भी कहा कि वे इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं लेकिन वे इसका सम्मान करते हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि वे वकीलों से बात करने के बाद पुनर्विचार याचिका दायर करने के बारे में निर्णय लेंगे। दरअसल कुछ मुस्लिमवादी और इस्लामी नेताओं की सुई सर्वोच्च अदालत की इस टिप्पणी पर अटकी है, जिसमें 1992 में विवादित ढांचे को गिराने की घटना को कानून-व्यवस्था का उल्लंघन माना गया था और वे संघ-भाजपा परिवार से उसके लिए माफी की मांग कर रहे हैं।

वास्तव में देखा जाए तो राजनीति की शुरुआत इसी बिंदु से होती है। बेशक अयोध्या विवाद पर फैसला जरूर आया है, लेकिन उसकी आड़ में सियासत का सिलसिला नहीं थमेगा। बेशक राम मंदिर निर्माण आरएसएस के लिए बुनियादी सांस्कृतिक सरोकार रहा है। भाजपा ने 1989 में अपने पालमपुर अधिवेशन के दौरान प्रस्ताव पारित किया कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ा जाएगा। इसी के तहत लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा शुरू की और नरेंद्र मोदी उनके सारथी बने। इसका पहला चुनावी लाभ यह हुआ कि 1989 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के 86 सांसद जीते, जबकि उससे पहले सदन में पार्टी के मात्र दो ही सांसद थे।

उसके बाद भाजपा बढ़ती ही गई और 1996 के चुनाव में लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभर कर आई। यह मुद्दा भाजपा के प्रत्येक चुनाव घोषणा-पत्र में स्थान पाता रहा, बेशक उसका चुनावी प्रभाव कम होता गया, लेकिन इसे आस्था से जोड़ कर प्रचारित किया गया। इसी की प्रतिक्रिया में एक ‘धर्मनिरपेक्ष राजनीति’ शुरू हुई, जो बुनियादी तौर पर मुस्लिमवादी थी। संघ और भाजपा को ‘सांप्रदायिक’ करार दे दिया गया। अब बेशक उस रूप में यह मुद्दा नहीं उछाला जाएगा, लेकिन भाजपा सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का प्रचार जरूर करती रहेगी और हिंदू वोट बैंक उसके पक्ष में लामबंद होना स्वाभाविक है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में लंबे अंतराल के बाद राम मंदिर व बाबरी मस्जिद विवाद पर आया शीर्ष अदालत का फैसला शांति सौहार्द का आदर्श व विश्व बंधुत्व की मिसाल बन गया है। जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाना व मंदिर-मस्जिद विवाद पर ऐतिहासिक फैसले ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकार व देश की साख को विश्वभर में प्रतिष्ठित किया है। चूंकि अब राम मंदिर बनने की प्रक्रिया शुरू होगी और कुछ सालों तक जारी रहेगी।

इसी दौरान 2022 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने हैं और 2024 में लोकसभा चुनाव होंगे। जाहिर है कि भव्य राम मंदिर आकार ग्रहण कर रहा होगा, लिहाजा उसका प्रत्यक्ष चुनावी लाभ भाजपा को मिलना स्वाभाविक है। इसके समानांतर राम मंदिर विरोधी सियासत को लोग स्वीकार नहीं करेंगे, क्योंकि यह धार्मिक आस्था का भावुक विषय है।

अयोध्या केस में दशकों से सुनवाई हो रही है. इस मामले से जुड़े लोग भी ये समझ गए हैं कि सालों क्या और दशकों क्या, सदियों तक भी कोर्ट-कचहरी में फंसे रहने का कोई मतलब नहीं है। इकबाल अंसारी को ही ले लीजिए, वह भी राम मंदिर को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खुश हैं। इकबाल अंसारी इस बात को समझ रहे हैं कि कोर्ट-कचहरी में फंसे रहने और हिंदू-मुस्लिम की लड़ाई से कुछ हासिल नहीं होगा. हालांकि, जिन्हें अपनी राजनीतिक जमीन ही इसी के जरिए बनानी है, उनके लिए तो ऐसे मामले खाद-पानी का काम करते हैं।

इस फैसला का स्वागत करते हुए हिंदु-मुस्लिम के दोबारा एक हो जाने की बातें हो रही हैं। योग गुरु रामदेव ने तो ये भी कह दिया कि हिंदुओं को मस्जिद बनाने में योगदान देना चाहिए और इसी तरह मुस्लिमों को भी राम मंदिर के निर्माण में योगदान देना चाहिए। यानी सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला ऐतिहासिक मौका बन सकता है, जिसका फायदा उठाते हुए हिंदू-मुस्लिम एक हो सकते हैं। वह अपने बीच की कड़वाहट को भूल सकते हैं, लेकिन ओवैसी जैसी लोग ऐसा नहीं होने देंगे। चूंकि अब राममंदिर का फैसला गया है।

देश की जनता काफी लम्तबे समस से इस फैसले की प्रतीक्षा कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है और सुप्रीम कोर्ट का फैसला आखिरी होता है। इसलिए इस फैसले का सम्मान करना ही चाहिए। अयोध्या में राममंदिर का जो फैसला हुआ है, वह भाईचारा को देखते हुए ही किया गया है। इसलिए प्रत्येक नागरिक का यह अधिकार है कि वह समाज में शांति का माहौल बनाये रखे। और इस फैसले को सम्मान के साथ स्वीकार करे। इस मसले के चलते देश बहुत सा तनाव, खून खराबा और अशांति का माहौल देख चुका है। इसलिए अब इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। कोर्ट का फैसले को किसी की जीत या किसी की हार के तौर पर नहीं देखना चाहिए।

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