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कश्मीर के लिये नेहरु को दोष देना कितना जायज

नई दिल्ली। नेहरू ने कश्‍मीर के राजा को 23 दिसंबर 1947 को लिखे पत्र में किया था असली रणनीति का खुलासा. नेहरू ने लिखा था: हम यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा समिति के सामने प्रस्तुत करेंगे. उसके बाद सुरक्षा समिति शायद अपना एक कमीशन भारत भेजेगी. अलबत्ता, इस बीच हम आज की तरह (कश्मीर में) अपनी सैन्य कार्रवाई को जारी ही रखेंगे. बेशक इन कार्रवाइयों को हम अधिक जोरों से चलाने की आशा रखते हैं. हमारा भावी कदम दूसरी घटनाओं पर निर्भर करेगा, इस अवसर पर इस बात को पूरी तरह गुप्त रखना होगा.

कबायली हमले के बाद नवंबर 1947 में माउंटबेटन कराची गए. पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मोहम्मद अली जिन्ना से मिले. माउंटबेटन और जिन्ना के बीच क्या बातचीत हुई, इसके बारे में माउंटबेटन ने 2 नवंबर 1947 को नेहरू जी को एक लंबा पत्र लिखा.

‘‘मैंने मिस्टर जिन्ना से पूछा कि आप कश्मीर में जनमत संग्रह का इतना विरोध क्यों करते हैं. उन्होंने उत्तर दिया: कारण यह है कि कश्मीर पर भारतीय उपनिवेश का अधिकार होते हुए और शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कांफ्रेंस के वहां सत्तारूढ़ होते हुए, वहां के मुसलमानों पर प्रचार और दबाव का ऐसा जोर डाला जाएगा कि औसत मुसलमान कभी पाकिस्तान के लिए वोट देने की हिम्मत नहीं करेगा.’’

जिन लोगों को लगता है कि नेहरू ने जनमत संग्रह की बात कह कर गलती की थी, उन्हें जिन्ना के इस बयान को बहुत गौर से सुनना चाहिए. अगर कायदे आजम, जिन्ना को यह खिताब गांधीजी ने दिया था, तक इस बात के प्रति आश्वस्त थे कि उन हालात में कश्मीर के मुसलमान भारत के पक्ष में वोट देंगे, तो ऐसे में नेहरू जनमत संग्रह से नहीं डरकर कोई गजब नहीं कर रहे थे.

जनमत संग्रह की पेशकश सबसे माउंटबेटन ने की थी
जिन्ना से मुलाकात के बारे में माउंटबेटन आगे लिखते हैं: ‘‘मैंने सुझाया कि जनमत संग्रह का कार्य हाथ में लेने के लिए हम संयुक्त राष्ट्र संघ को निमंत्रित कर सकते हैं और मुक्त तथा निष्पक्ष जनमत संग्रह के लिए आवश्यक वातावरण उत्पन्न करने के लिए हम राष्ट्र संघ से ऐसी विनती कर सकते हैं कि वह पहले से अपने निरीक्षकों और संगठनों को कश्मीर भेज दे. मैंने दोहराया कि मेरी सरकार यह कभी नहीं चाहेगी कि कपटपूर्ण जनमत संग्रह द्वारा कोई झूठा परिणाम प्राप्त किया जाए.’’

इससे यह पता चलता है कि भारत के गवर्नर जनरल की हैसियत से लॉर्ड माउंटबेटन ने सबसे पहले संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में जनमत संग्रह कराने की पेशकश जिन्ना से की.

वैसे संयुक्त राष्ट्र संघ में जाना नेहरू की एक सोची समझी चाल थी. इसका जिक्र उन्होंने 23 दिसंबर 1947 को कश्मीर के महाराज को लिखे एक पत्र में किया. इस पत्र की खासियत यह है कि अपने स्वभाव के विपरीत नेहरू ने महाराज से कहा कि इस रणनीति को पूरी तरह गुप्त रखा जाए. नेहरू ने लिखा:

‘‘हमारा मंत्रिमंडल इस निर्णय पर पहुंचा है कि वर्तमान परिस्थितियों में अपनाया जाने वाला उत्तम मार्ग यह होगा कि हम संयुक्त राष्ट्र संघ का ध्यान उस आक्रमण की ओर खींचे जो पाकिस्तान सरकार की सहायता और प्रोत्साहन से पाकिस्तान से आने वाले अथवा पाकिस्तान में होकर आने वाले कबायली लोगों द्वारा भारत की भूमि पर किया गया है. हम राष्ट्र संघ से विनती करेंगे कि वह पाकिस्तान को यह आक्रमण बंद करने का आदेश दे, क्योंकि इसके विकल्प में हमें ऐसे कदम उठाने होंगे, जिन्हें हम ऐसा करने के लिए सही और उपयुक्त मानेंगे. हम संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष पहुंचें, इसके पहले यह वांछनीय माना गया कि पाकिस्तान सरकार से विधिवत विनती की जाए कि वह आक्रमणकारियों को कोई सहायता अथवा प्रोत्साहन ना दे.

अब हम पाकिस्तान के उत्तर के लिए कुछ दिन, ज्यादा से ज्यादा चार या पांच दिन, प्रतीक्षा करेंगे. उसके बाद हम यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा समिति के सामने प्रस्तुत करेंगे. इस सारी कार्यवाही में ज्यादा समय नहीं लगेगा. सुरक्षा समिति संभवत: हमारे प्रतिनिधि का वक्तव्य जल्दी ही सुनेगी और बाद में वह पाकिस्तान से कहेगी कि उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों का उत्तर दे. उसके बाद सुरक्षा समिति शायद अपना एक कमीशन भारत भेजेगी. अलबत्ता, इस बीच हम आज की तरह अपनी सैन्य कार्रवाई को जारी ही रखेंगे. बेशक इन कार्रवाइयों को हम अधिक जोरों से चलाने की आशा रखते हैं. हमारा भावी कदम दूसरी घटनाओं पर निर्भर करेगा, इस अवसर पर इस बात को पूरी तरह गुप्त रखना होगा.”

क्या थी नेहरू की चाल
यानी नेहरू की चाल साफ थी कि एक तरफ भारत संयुक्त राष्ट्र में पीड़ित पक्ष बनकर जाए, जो कि वह था भी और दूसरी तरफ वह कश्मीर में अपनी सैनिक पकड़ मजबूत करता जाए. जाहिर है इस बीच कश्मीर की जनता से बेहतर रिश्ता तो बनाना ही था. इस तरह जब जनमत संग्रह का समय आए, तब तक कश्मीर पर भारत का पूरी तरह नियंत्रण हो चुका हो.

नेहरू कश्मीर में तीन मोर्चों पर काम कर रहे थे. उन्हें लगता था कि जब जनमत संग्रह का समय आएगा, तब तक कश्मीर पर भारत का पूरी तरह नियंत्रण हो चुका हो.

उसके बाद 1 जनवरी 1948 को भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अपनी अर्जी दे दी. लेकिन संयुक्त राष्ट्र में भारत को वैसा समर्थन नहीं मिला, जिसकी उसे उम्मीद थी. लेकिन आज तक के ज्ञात इतिहास में संयुक्त राष्ट्र से भारत को कोई ऐसा नुकसान भी नहीं पहुंचा है, जिसके लिए इसे भारी भूल कहा जा सके. बल्कि अब तो स्थिति यह है कि न तो भारत और न ही पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र की टीमों को अपने इलाकों का दौरा करने दे रहे हैं. दोनों ही देश संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों को स्वीकार करने से भी मना कर देते हैं.

मौजूदा स्थिति में क्या है भारत को रणनीतिक लाभ
कश्मीर में दोनों देशों की स्थिति वही है, जो कबायली हमले के बाद हुए समझौते के समय हुई थी. दोनों देश कश्मीर के अपने-अपने कब्जे वाले हिस्से पर कायम हैं. बल्कि भारत को एक रणनीतिक लाभ यह है कि जब तक पाकिस्तान पाक अधिकृत कश्मीर से अपना कब्जा नहीं छोड़ता, तब तक जनमत संग्रह हो ही नहीं सकता. क्योंकि महाराजा और कश्मीर की जनता ने पूरे कश्मीर का विलय भारत में किया था, न कि उसके एक बड़े भूभाग का.

सबसे बड़ी बात कि संयुक्त राष्ट्र में रखे गए मामले में कश्मीर की आजादी का कोई विकल्प नहीं दिया गया था. अगर कभी जनमत संग्रह होता भी है तो कश्मीर के पास दो ही विकल्प होंगे कि वह या तो भारत में जाए या पाकिस्तान में.

नेहरू फिर ख्रुश्चेव को कश्मीर लेकर पहुंचे
जब, नेहरू ने देखा कि संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद बहुत ही पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर बात कर रही है, तो उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पहले वे आदर्श स्थितियां तो बनाई जाएं, जहां जनमत संग्रह हो सके. उन्होंने अपनी रणनीति बदली और जनमत संग्रह करने का इरादा असल में छोड़ दिया. बल्कि अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए ही वे सोवियत संघ के राष्ट्रपति ख्रुश्चेव को कश्मीर लेकर पहुंचे, जहां खड़े होकर ख्रुश्चेव ने कश्मीर पर भारत की नीति को एकदम सही बताया.

दरअसल नेहरू शुरू से ही कश्मीर को पश्चिम की पॉवर पॉलिटिक्स मान रहे थे और बाद में उन्होंने इसका जवाब भी पॉवर पॉलिटिक्स से दिया.

महाराजा को कश्मीर छोड़ना पड़ा
जिन महाराजा हरि सिंह ने कश्मीर के भारत में विलय के समझौते पर दस्तखत किए थे, जो कि कश्मीर में भारत की मौजूदगी को वैधानिक मान्यता देने वाला यह एकमात्र करार था. उन्हीं राजा हरि सिंह को बाद में नेहरू की नीति और सरदार पटेल की समझाइश पर कश्मीर छोड़कर बाहर जाना पड़ा.

फिर नेहरू ने दोस्ती ताक पर रख अब्दुल्ला को जेल में डाला
जिन शेख अब्दुल्ला ने नेहरू के कहने पर सारी दुश्मनी छोड़कर राजा हरि सिंह को अपना पूरा समर्थन दिया. और भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह कहा गया कि चूंकि अब्दुल्ला कश्मीर के जननेता हैं, जो कि वे थे भी, इसलिए उनकी सहमति का मतलब कश्मीर की जनता की सहमति है. जिन शेख अब्दुल्ला के हाथ में कश्मीर की सरकार सौंपकर भारत ने बहुलतावाद की मिसाल कायम की और एक मुस्लिम बहुल राज्य को भारत में शामिल किया. जब वही शेख अब्दुल्ला कश्मीर की आजादी के प्रति जरूरत से ज्यादा सक्रिय हुए तो नेहरू ने अपनी निजी दोस्ती ताक पर रखकर अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया. 10 साल तक जेल में रहने के बाद अब्दुल्ला नेहरू की मृत्यु से कुछ समय पहले ही जेल से रिहा हुए.

नेहरू हर हाल में कश्मीर को भारत में देखना चाहते थे. उन्हें ये मंजूर नहीं था कि भारत के सिर पर अमेरिका का कौई सैन्य अड्डा बन जाए. ना ही अमेरिका और सोवियत संघ का शीत युद्ध भारत माता के मुकुट पर तांडव करे

नेहरू हर हाल में कश्मीर को भारत में देखना चाहते थे
यह सब नेहरू की वृहत्तर रणनीति का हिस्सा था. इसके तहत वह कश्मीर को हर हाल में भारत का हिस्सा देखना चाहते थे. उन्हें यह मंजूर नहीं था कि भारत के सिर पर अमेरिका का कोई सैनिक ठिकाना बन जाए. वे नहीं चाहते थे कि अमेरिका और सोवियत संघ का शीतयुद्ध भारत माता के मुकुट पर तांडव करे. वे कश्मीर को भारत में चाहते थे, लेकिन इस तरह कि महात्मा गांधी के सिद्धांतों को चोट न पहुंचे. क्योंकि एक समय ऐसा भी था, जब गांधी जी ने कहा था कि देश का आकार भले ही छोटा हो जाए, लेकिन भारत अपनी आत्मा से समझौता नहीं करेगा.

नेहरू जानते थे कि बापू जो कहते हैं उसका मतलब शब्दश: वही होता है. बापू ने अगर यह न्यायोचित माना कि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिए जाएं, तो फिर उन्होंने वे रुपये दिलवाए ही, भले ही उसके लिए नेहरू, पटेल और पूरी कैबिनेट को भारी मन से अपना निर्णय बदलना पड़ा हो.

इसलिए नेहरू पूरी बिसात इस तरह बिछा रहे थे कि भारत का हर कदम लोकतांत्रिक और मानवीय गरिमा के अनुकूल लगे. इसलिए जो कश्मीर, बहुसंख्यक आबादी के फॉर्मूले के हिसाब से, किसी एक देश से बेहतर संपर्क के हिसाब से और ब्रिटेन और अमेरिका की नीति के हिसाब से पाकिस्तान में होना चाहिए था, उसे नेहरू भारत में ले आए. और कहीं अगर अगर सरदार पटेल ने 27 सितंबर 1947 के नेहरू के पत्र में दी गई, सूचनाओं पर तुरंत कश्मीर के राजा को मना लिया होता और भारत की फौजें अक्टूबर के पहले हफ्ते में ही, कश्मीर पहुंच गईं होतीं, तो न तो कबायली भारत में घुस पाते और न ही पाक अधिकृत कश्मीर जैसी कोई चीज वजूद में होती.

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