विचार मित्र

राफेल पर कालिख पोतने का असफल प्रयास

ललित गर्ग

सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास में गुरुवार का दिन उल्लेखनीय कहा जायेगा क्योंकि इसने इस दिन सबसे अहम मसला भारतीय वायुसेना के लिए खरीदे गये 36 लड़ाकू राफेल विमानों में भ्रष्टाचार होने के आरोप का फैसला करके वह धुंध छांटी है जो भाजपा सरकार पर बेईमानी एवं भ्रष्ट होने के आरोप को लेकर भारतीय राजनैतिक वातावरण में अर्से से छायी हुई थी।

राफेल सौदे की जांच की मांग करने वाली पुनर्विचार याचिका खारिज कर सर्वोच्च न्यायालय ने इस सौदे में बोफोर्स सौदे जैसा कुछ खोज निकालने के शातिर, गैरजिम्मेदाराना एवं विध्वंसात्मक इरादों पर तो पानी फेरा ही, छल-कपट की राजनीति को भी बेनकाब किया। कांग्रेस न जाने क्यों मानसिक दुर्बलता की शिकार है कि उसे अंधेरे सायों से ही प्यार है। ऐसे राजनीतिक दलों एवं राहुल गांधी जैसे राजनेताओं की आंखों में किरणें आंज दी जाएं तो भी वे यथार्थ को नहीं देख सकते। क्योंकि उन्हें उजालों के नाम से ही एलर्जी है। तरस आता है राहुल जैसे राजनेताओं की बुद्धि पर, जो सूरज के उजाले पर कालिख पोतने का असफल प्रयास करते हैं, आकाश में पैबन्द लगाना चाहते हैं और सछिद्र नाव पर सवार होकर राजनीतिक सागर की यात्रा करना चाहते हैं।

यदि सर्वोच्च न्यायालय ने इस सौदे में संदेह करने का कोई कारण नहीं पाया तो इसका मतलब यही है कि जो लोग इस सौदे को संदिग्ध बताने पर तुले थे वे सरकार को बदनाम करने का सुनियोजित अभियान चला रहे थे। हालांकि इस अभियान के अगुआ राहुल गांधी और उनके साथियों के पास राफेल सौदे में गड़बड़ी का कोई प्रमाण नहीं था, फिर भी वे प्रधानमंत्री को चोर बताने में लगे हुए थे। राहुल गांधी की ओर से उछाला गया चैकीदार चोर है का नारा महज खिसियाहट भरी अभद्र राजनीति का ही परिचायक नहीं था, बल्कि इसका भी प्रमाण था कि संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के लिए कोई किस हद तक जा सकता है। राहुल गांधी ने केवल प्रधानमंत्री के खिलाफ ही अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि फ्रांस के साथ राजनयिक संबंधों को भी चोट पहुंचाई। क्या देश के सर्वोच्च राजनीतिक दल की इससे गैर जिम्मेदाराना राजनीति और कोई हो सकती है?

राहुल गांधी अक्सर भाजपा सरकार एवं नरेन्द्र मोदी के विरोध में स्तरहीन एवं तथ्यहीन आलोचना, छिद्रान्वेशन करते रहे हैं। ऐसा लगता है उनकी चेतना में स्वस्थ समालोचना के बजाय विरोध की चेतना मुखर रहती है। ऐसे सारहीन, तथ्यहीन एवं भ्रामक आलोचना का क्या प्रतिवाद किया जाये? किन्तु राहुल गांधी ने भाजपा की अस्मिता एवं अस्तित्व पर सीधा आक्रमण कर दिया तो उसका उत्तर देना एवं दूध का दूध एवं पानी का पानी करना अपरिहार्य हो गया, भले प्रतिवाद मोदी ने या भाजपा ने नहीं किया लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत ने ऐसा करके लोकतंत्र की मर्यादा को न केवल सुरक्षित रखा बल्कि भविष्य में ऐसी नासमझी न दोहरायी जाये, ऐसी हिदायत भी दी है।

राहुल गांधी की राजनीतिक अपरिपक्वता एवं नासमझी के अनेक किस्से हंै, अक्सर वे खुद को सही साबित करने के लिए किस तरह छल का सहारा लेने में लगे हुए थे, इसका पता इससे चलता है कि वह यह प्रचारित करने में भी जुटे थे कि सर्वोच्च न्यायालय यह कह रहा है कि प्रधानमंत्री ने चोरी की है। भले ही इस राजनीतिक शरारत के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने की जरूरत न समझी हो, लेकिन आखिर वह उस जनता का सामना कैसे करेंगे जिसके समक्ष वह राफेल सौदे में गड़बड़ी के हास्यास्पद और मिथ्या दावे किया करते थे? यह लज्जाजनक है कि राफेल सौदे पर सस्ती और एक तरह से देशघाती राजनीति तब की गई जब संप्रग सरकार के नाकारापन के कारण भारतीय वायु सेना युद्धक विमानों के अभाव से बुरी तरह जूझ रही थी। आखिर किन संकीर्ण स्वार्थो के लिए राष्ट्रीय हितों की जानबूझकर अनदेखी की गई? यह आपराधिक किस्म की राजनीति थी। ऐसी ही हरकतों से राजनीति बदनाम होती है।

अफसोस केवल यह नहीं कि बिना किसी सुबूत राहुल गांधी झूठ का पहाड़ खड़ा करने में लगे हुए थे, बल्कि इस पर भी है कि अनेक जिम्मेदार राजनेताओं ने उनकी झूठ की राजनीति में सहभागी बनना बेहतर समझा। समझना कठिन है कि जब उनके पास ऐसे कोई तथ्य थे ही नहीं जो राफेल सौदे में गड़बड़ी को इंगित करते तब फिर वे क्या हासिल करने के लिए एक जरूरी रक्षा सौदे को संदिग्ध बता रहे थे? आखिर इससे उन्हें अपयश के अलावा और क्या मिला? उनकी नादानी की वजह से भारत की छवि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी धुंधलाती रही, यह बड़ा अपराध है जो अक्षम्य है।

भले सर्वोच्च अदालत इसके लिये राहुल को यह कहकर कि भविष्य में वह बहुत सोच-विचार कर बोलें और विषय की गंभीरता को समझ कर बोले,  माफ कर दिया। जाहिर है कि राफेल पर राहुल गांधी उग्रता से भी ऊपर आक्रामक शैली में गैर-जिम्मेदाराना अंदाज में सीधे प्रधानमन्त्री की ईमानदारी और विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर रहे थे।

नरेन्द्र मोदी ने न केवल लोकसभा चुनावों में बल्कि समय-समय अपनी ईमानदारी, पारदर्शिता एवं स्वच्छ शासन पर सन्देह करने की कतई गुंजाइश नहीं होने की बात दोहरायी है, चुनावों में मिली उनकी शानदार जीत जहां जनता की अदालत का फैसला था जिसका संवैधानिक व कानूनी ‘दांव-पेंचों’ से कोई लेना-देना नहीं था। अब जनता के फैसले को एक प्रकार से संवैधानिक वैधता भी प्राप्त हो गई है। लेकिन प्रश्न है कि इस तरह की दूषित राजनीति एवं स्वार्थ के घनघोर परिवेश से लोकतंत्र कब तक आहत होता रहेगा?

कांग्रेस भले नरेन्द्र मोदी रूपी साफ-सुधरे ‘आइने’ पर धूल जमी होने का ख्वाब देख रही हो मगर असलियत में उसके ‘चेहरे’ पर ही धूल लगी हुई है जिसे उसे साफ करके ‘आइने’ में अपना चेहरा देखना होगा। भले ही ‘राफेल घटनाक्रम’ का अन्तिम अध्याय आज के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के साथ ही समाप्त हो गया है, लेकिन इसने भारतीय राजनीति को कुछ कठोर एवं जरूरी संदेश भी दिये हैं। कौन क्या राजनीतिक दांवपेंच खेलता है, उसके प्रति जागरूक होना जरूरी है। कौन राजनेता क्या बोलता है, उसके प्रति भी जागरूक होना जरूरी है।

जागरूक होने का अर्थ है आत्मनिरीक्षण करना, मूल्यों की राजनीति को बल देना, अपने आपको तोलना, अपनी कोई खामी लगे तो उसका परिष्कार करना और जनता को भ्रांत होने से बचाना है। जागरूकता का अर्थ निषेधात्मक विचारांे की प्रतिक्रिया करना नहीं है। नरेन्द्र मोदी एवं भाजपा इस प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्ति से सदा बचता रहा है। उसका संकल्प है कि हम कभी प्रतिक्रियात्मक चक्रव्यूह में नहीं उलझेंगे। यही कारण है कि भाजपा पर मौखिक और लिखित प्रहार होते रहे, पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व एवं नरेन्द्र मोदी ने कभी निषेधात्मक समालोचनाओं के प्रति सक्रियता नहीं दिखाई।

राहुल गांधी अपने आपको सक्षम राजनीतिक मानते होंगे, वे विरोध की राजनीति के खिलाड़ी भी स्वयं को साबित करने में जुटे हो, लेकिन भारत की राजनीति केवल विरोध पर जीवंत नहीं रह सकती। राजनीति में समालोचना नितांत अपेक्षित है, समालोचक होना और समालोचना करना बहुत बड़ी बात है, पर जब व्यक्ति तथ्यों को तोड़-मरोड़कर, अपने विवेक को गिरवी रखकर समालोचना करता है, उसे समालोचना नहीं, स्तरहीन विरोध ही कहा जायेगा। ऐसे विरोध के प्रति दया का भाव ही जताया जा सकता है, उसका उत्तर नहीं दिया जा सकता।

आखिर निषेधात्मक भावों का उत्तर कब तक दिया जाए? कांग्रेस की इस श्रंृखला का कहीं अंत ही दिखाई नहीं देता। रचनात्मक समालोचना हो, तथ्यों के आधार पर हो तो उसके बारे में चिंतन भी किया जा सकता है। नरेन्द्र मोदी समालोचना के विरोधी नहीं है। वे समालोचना का स्वागत करते हैं। किन्तु नमक की रोटी का क्या स्वागत किया जाए? कुछ आटा हो तो नमक की रोटी भी काम की हो सकती है। पर जिसमें कोरा नमक ही नमक हो, वह स्पृहणीय कैसे बन सकती है।

भाजपा राजनीति में भ्रष्टाचारमुक्ति एवं ईमदानदारी का अप्रतिम उदाहरण है। पर जो अच्छाई एवं उजाले खोजने का प्रयत्न ही नहीं करे, उसे ऐसे उदाहरण दिखाई कहां से दे? कबीर ने ठीक ही कहा है-जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ। मैं बपुरी बूड़न डरी, रही किनारे बैठ।। गहरे में उतरकर खोजने वाले को ही रत्न मिलते हैं। डूबने के भय में जो किनारे पर ही बैठा रहे, उसे रत्न कैसे मिल सकते हैं? राहुलजी राजनीति ही करनी है तो मूल्यों की राजनीति करो, देश सेवा की राजनीति करो, जनता को दिलों को जीतने की राजनीति करो। उजालों पर कालिख पोतने का प्रयास एवं चरित्र हनन के उद्देश्य से किया जाने वाला ऐसा राजनीतिक प्रयत्न कितना जघन्य होता है, समझने वाली जनता अच्छी तरह समझती है।

प्रसंगवश भाजपा एवं नरेन्द्र मोदी के बारे में भी कुछ बात कर लें। राहुल गांधी ने जिस तरह के आरोप लगाये है उसके आधार पर ऐसा लगता है कि उन्हें मोदी की प्रवृत्तियों में निराशा-ही-निराशा दिखाई देती है। मेरी समझ में मोदी ने राजनीति में नैतिकता के स्वर को कितना मुखर किया है उतना कम किसी राजनीतिक दलों ने किया है। जो देश हीत की व्यापकता और राजनीतिक नैतिकता-चारित्रिक निष्ठा भाजपा में है, क्या इस तुलना में किसी दूसरे राजनीतिक दल को उपस्थित किया जा सकता है? भाजपा एवं नरेन्द्र मोदी की इतनी व्यापकता, उपयोगिता और लोकप्रियता में भी राहुल गांधी को कोई अच्छाई नजर नहीं आई, यह देखने का अपना-अपना नजरिया है। पर यह सब जानने के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण की जरूरत रहती है।

अन्यथा अच्छाई भी बुराई के रूप में उभरती रहेगी। लगता है कि इस निराशावादी दृष्टिकोण ने ही राहुल गांधी को मोदी की आलोचना करने के लिए प्रेरित किया है। खैर, राहुल की अपनी इच्छा है, सोचने का अपना कोण है। किन्तु यह निश्चित है कि भाजपा सरकार के संबंध में सही जानकारी होती तो ऐसे निराधार, उद्देश्यहीन, उच्छृंखल, विध्वंसात्मक आरोप लगाने का उत्साह ही पैदा नहीं होता। क्योंकि ऐसी औछी एवं स्तरहीन राजनीति से किसी का भी हित नहीं सधता, यह तो समय, शक्ति एवं राजनीति कौशल का अपव्यय है तथा बुद्धि का दिवालियापन है।

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