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दुनिया में रहने वाले 7.7 अरब लोगों में से हर एक के सिर पर 32,550 अमेरिकी डॉलर का कर्ज, जानें क्या है पूरी खबर

वाशिंगटन।  पूरी दुनिया साल दरसाल कर्ज के भारी बोझ से दबती जा रही है। वैश्विक कर्ज फिलहाल 250.9 ट्रिलियन डॉलर हो गया है। इस लिहाज से दुनिया में रहने वाले 7.7 अरब लोगों में से हर एक के सिर पर 32,550 अमेरिकी डॉलर (23,31,719 रुपये) कर्ज का बोझ है।

इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ फाइनेंस (आईआईएफ) की ओर से गुरुवार को जारी रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक कर्ज अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए साल 2019 के अंत तक 255 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के आंकड़े को पार कर जाएगा। चालू साल की पहली छमाही में ही वैश्विक कर्ज 7.5 ट्रिलियन डॉलर के इजाफे के साथ 250.9 ट्रिलियन डॉलर हो गया था। वैश्विक कर्ज में भारी बढ़ोतरी चीन और अमेरिका की ओर से बड़े पैमाने पर कर्ज लेने के कारण हुई है। इसके अलावा वैश्विक बांड बाजार पर निर्भरता ने भी कर्ज बढ़ाने का काम किया है।

आईआईएफ के मुताबिक ग्लोबल बांड बाजार 2009 में 87 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर था जो 2019 में बढ़कर 115 ट्रिलियन हो गया। 2019 के अंत तक वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों की सरकारों पर 70 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज हो जाने का अनुमान है जो कि 2018 में 65.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर था। दुनिया पर कर्ज का बोझ बढ़ाने में 60 फीसदी योगदान अमेरिका और चीन का है। कर्ज का बढ़ता बोझ निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन गया है।

इन सरकारों पर ज्यादा कर्ज: 
अमेरिका और चीन के अलावा जिन देशों की सरकारों पर ज्यादा कर्ज है उनमें इटली और लेबनान भी शामिल हैं। इसके अलावा अर्जेंटीना, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और ग्रीस भी शामिल हैं।

खतरे में कॉरपोरेट कर्ज:  
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने हाल ही में आगाह किया था कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में करीब 40 फीसदी (19 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर) कॉरपोरेट कर्ज जोखिम वाला है। इन देशों में अमेरिका और चीन के अलावा जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली आदि देश शामिल हैं।

भारत पर विदेशी कर्ज 543 अरब डॉलर: 

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से बीते जून महीने में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत पर कुल बाहरी कर्ज मार्च 2019 तक 543 अरब अमेरिकी डॉलर था। मार्च 2018 के मुकाबले विदेशी कर्ज की राशि में करीब 13.7 अरब डॉलर का इजाफा हुआ। यह राशि जीडीपी के कुल 19.7 फीसदी के बराबर है। करीब 80 फीसदी ज्यादा आंतरिक ऋण पर निर्भर रहने के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक जोखिम बढ़ने के बावजूद मजबूत स्थिति में है।

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