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गांधी परिवार की सुरक्षा के मुद्दे पर दुर्भाग्यूपर्ण राजनीति

संतोष कुमार भार्गव

गांधी परिवार की सुरक्षा के मामले में राजनीति खत्म नहीं हो रही है। कांग्रेस सांसदों ने बीते मंगलवार को लोकसभा से बहिर्गमन किया। अगले दिन राज्यसभा में भी कांग्रेस ने इस मुद्दे केा उठाया। मुद्दा सार्वजनिक, सामाजिक और राष्ट्रीय नहीं, बल्कि गांधी परिवार से जुड़ा था। जब से मीडिया में खबर आई है कि सरकार ने गांधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा हटाकर उन्हें निचले दर्जे की सुरक्षा मुहैया कराने का निर्णय लिया है, तब से इस मसले पर जमकर राजनीति हो रही है। कांग्रेस ने केंद्रीय गृहमंत्रालय द्वारा गांधी परिवार की सुरक्षा से विशेष सुरक्षा बल को हटाए जाने के फैसले को राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया है। वहीं इस मामले पर कांग्रेस ने मोदी सरकार पर राजनीति करने का आरोप लगाया है।

वास्तव में केंद्र सरकार की सुरक्षा आकलन समिति की अनुशंसा थी कि सोनिया गांधी, उनके सांसद-पुत्र राहुल गांधी और बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा को विशेष सुरक्षा समूह (एसपीजी) के बजाय जेड प्लस सुरक्षा दी जाए। गृह मंत्रालय ने उस आकलन को स्वीकार कर लागू किया था। देश भर में जिन भी महानुभावों को सुरक्षा प्रदान की जाती है, उसका समय-समय पर आकलन करने का नियम है। आकलन रिपोर्ट के मुताबिक ही सुरक्षा घटाई और बढ़ाई जाती है। लेकिन गांधी परिवार चूंकि देश के प्रमुख राजनीतिक घरानों में शामिल है, ऐसे में उनकी सुरक्षा की बात सामने आती ही इस मुद्दे पर राजनीति शुरू हो गई।

कांग्रेस के राज्यसभा सांसद आनंद शर्मा ने कहा कि इस मामले पर हमें राजनीति से उठकर सोचना चाहिए क्योंकि यह किसी की जिंदगी से जुड़ा मामला है। उन्होंने कहा कि मैं राजनीतिक बात नहीं कर रहा, लेकिन याद दिलाना चाहता हूं कि यूपीए के 10 वर्षों के शासन में अटल बिहारी वाजपेयी की एसपीजी सिक्यॉरिटी से कोई छेड़छाड़ नहीं हुई थी। बीजेपी सांसद जेपी नड्डा ने इस मामले में किसी तरह की राजनीतिक से इनकार करते हुए कहा कि सिक्यॉरिटी कवर बदलने का फैसला अच्छी तरह हुई समीक्षा के बाद लिया गया है। सोनिया, राहुल और प्रियंका से 28 साल बाद एसपीजी सुरक्षा वापस ले ली गई। उन्हें सितंबर 1991 में एसजीपी कानून 1988 के संशोधन के बाद वीवीआईपी सुरक्षा सूची में शामिल किया गया था। इस फैसले के साथ करीब 4 हजार बल वाला एसपीजी अब केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में तैनात रहेगा।

नियमों के हिसाब से एसपीजी की श्रेष्ठतम सुरक्षा सिर्फ प्रधानमंत्री के लिए है और एक निश्चित अवधि तक पूर्व प्रधानमंत्री को भी दी जाती रही है। बीते कुछ अंतराल पहले तक पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह भी एसपीजी के सुरक्षा घेरे में थे। अब उनके लिए सीआरपीएफ की जेड प्लस सुरक्षा व्यवस्था है। चूंकि गांधी परिवार पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का ही परिवार है और लिट्टे के आतंकियों ने उनकी हत्या कर दी थी, लिहाजा 1991 से लेकर 2019 में अभी तक सभी गांधीजन एसपीजी की सुरक्षा में रहे हैं। यह प्रधानमंत्री का तो विशेषाधिकार है कि पूरी दुनिया में वह जहां भी जाएं, वहां वह एसपीजी के सुरक्षा-घेरे में ही रहेंगे। इस सुरक्षा-व्यवस्था के कायदे-कानूनों को तोड़ना भी एक गंभीर उल्लंघन है। रिकार्ड के मुताबिक, राहुल गांधी ने 2015 से 1892 बार एसपीजी घेरे का उल्लंघन किया या बिना सुरक्षा ही विदेश चले गए। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एसपीजी के बिना ही 24 विदेश यात्राएं की हैं और प्रियंका 78 बार एसपीजी के बिना ही विदेश गईं।

सहज सवाल है कि यदि उन यात्राओं के दौरान इन गांधीजनों के साथ कोई अनहोनी घट जाती, तो देश में कोहराम मच जाता। एसपीजी सुरक्षा पर ही सवाल उठाए जाते। राहुल गांधी ने 30 से ज्यादा विदेशी प्रवासों की जानकारी या सूचना तक एसपीजी को नहीं दी। इस गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार को क्या कहेंगे? यदि एसपीजी हटाने का फैसला किसी आधार पर लिया गया है, तो कांग्रेस चिल्ल-पौं कर रही है। सांसद संसद से ही वॉकआउट कर रहे हैं। आपका अपना कुछ छीना नहीं गया है। सुरक्षा गांधी परिवार का विशेषाधिकार भी नहीं है, जो संविधान ने उसे मुहैया कराया हो। एसपीजी का बुलेट प्रूफ वाहन अब भी सीआरपीएफ की जेड प्लस सुरक्षा के साथ रहेगा, क्योंकि इस सुरक्षा बल के पास पर्याप्त बुलेट प्रूफ वाहन नहीं हैं।

सीआरपीएफ ने गांधीजनों की सुरक्षा पर नए प्रोटोकॉल के बारे में राज्यों और संघशासित क्षेत्रों को पत्र भी लिख दिए हैं। खुफिया सूचना, यात्रा मैप, पुलिस सहयोग और प्रशासनिक प्रोटोकॉल आदि वैसे ही रहेंगे, जैसे एसपीजी के दौरान थे। चूंकि गांधीजन एसपीजी सुरक्षा के प्रति लापरवाह रहे हैं और उन्हें खतरों की संभावनाएं भी कम हैं, लिहाजा एसपीजी को हटाया गया है। जेड प्लस सुरक्षा भी कम नहीं होती। देश में नक्सल विरोधी अभियानों और आंतरिक सुरक्षा कार्यों के लिए एक प्रमुख बल सीआरपीएफ के पास लगभग 52 अन्य वीवीआईपी की सुरक्षा की जिम्मेदारी है जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और आरआईएल के अध्यक्ष मुकेश अंबानी और उनकी पत्नी नीता अंबानी शामिल हैं।

संसद के अंदर और संसद के बाहर, हर जगह इस पर हंगामा किया जा रहा है। सुरक्षा के खिलवाड़ संबंधी आरोप कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों के समय खुद राजीव गांधी की हत्या के मामले में लगाया था और ये कहा था कि उस वीपी सिंह की सरकार को बीजेपी ही बाहर से समर्थन दे रही थी, जिसने राजीव गांधी से एसपीजी का सुरक्षा घेरा वापस लिया था और जिसकी वजह से उनकी सुरक्षा कमजोर हुई और लिट्टे आतंकी अपने नापाक मंसूबे में कामयाब हो सके। वहीं बीजेपी सांसद सुब्रमण्यन स्वामी ने राज्यसभा में बोलते हुए कहा कि, यूपीए सरकार में कई लोगों का सिक्यॉरिटी कवर घटाया था। उन्होंने कहा कि वह उन लोगों का नाम बता सकते हैं जिनकी यूपीए शासन में सिक्यॉरिटी घटाई गई।

उन्होंने राजीव गांधी के हत्यारे की सजा घटाने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि एक तरफ तो इंदिरा और राजीव की हत्या का हवाला देकर गांधी परिवार के लिए हाई सिक्यॉरिटी की मांग की जाती है और दूसरी तरफ खुद सोनिया गांधी राजीव के हत्यारे की सजा कम करवाती हैं। कांग्रेस को इसे ‘बदले की राजनीति’ से जोड़ कर नहीं आंकना चाहिए। हम एक लोकतंत्र में रहते हैं। बेशक सरकार एक सर्वाधिक शक्तिशाली ईकाई है, लेकिन वह तानाशाह नहीं हो सकती। एसपीजी का गठन 1985 में तब किया गया, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही सुरक्षाकर्मियों ने कर दी थी।

अक्तूबर, 1984 में उनकी हत्या की गई, तो कमोबेश प्रधानमंत्री की विशेष सुरक्षा पर मंथन किया गया। विदेशों के प्रयोग समझे गए और अंततः एक बेहद हुनरमंद, काबिल, प्रशिक्षित सुरक्षा व्यवस्था सामने आई-एसपीजी। एसपीजी सुरक्षा वाला व्यक्ति इसके घेरों और सुरक्षा-व्यवस्था से इनकार नहीं कर सकता। उसके विदेश प्रवास से पहले ही पूरी टीम पहुंच कर सभी मुआयने करती है, बंदोबस्त करती है तथा पुलिस के सहयोग से सुरक्षा-घेरे तय किए जाते हैं। शायद यही वजह है कि हमारे प्रधानमंत्री 1991 के बाद बेहद सुरक्षित रहे हैं। किसी पर आक्रमण का प्रयास तक नहीं किया जा सका। गांधीजन और कांग्रेस इसे अपनी निजी अहं और प्रतिष्ठा का सवाल नहीं बना सकती, क्योंकि ये मौलिक अधिकार नहीं हैं। यह परिस्थितिजन्य जरूरत है, जो सरकार उपलब्ध कराती रही है। आपत्ति तब होनी चाहिए थी, जब एसपीजी भी हटा ली जाती और एक नाममात्र की सुरक्षा-व्यवस्था की जाती।

गांधी परिवार के लिए सुरक्षा का वैकल्पिक इंतजाम करने के बाद एसपीजी का घेरा अब सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी तक सीमित रह गया है। वैसे भी एसपीजी की स्थापना करने वाले राजीव गांधी की सोच भी यही थी कि ये विशेष दस्ता सिर्फ पीएम और जरूरत पड़ने पर उनके परिवार के लोगों को सुरक्षा दे। इस मामले में राजनीति नहीं होनी चाहिए।
-मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार।
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