विचार मित्र

खुदकुशी का बढ़ता दायरा एवं त्रासद तस्वीर

ललित गर्ग 

इन्दिरापुरम के वैभव खण्ड की कृष्णा अपरा सफायर सोसायटी में रहने वाले कपड़ा  (जींस ) व्यापारी गुलशन वासुदेव ने अपने दो बच्चों की हत्या कर पत्नी सहित दो महिलाओं के साथ आत्महत्या कर ली। यह आत्महत्या की खबर तथाकथित समाज विकास की विडम्बनापूर्ण एवं त्रासद तस्वीर को बयां करती है। इस तरह आत्महत्या करना जीवन से पलायन का डरावना सत्य है जो दिल को दहलाता है, डराता है, खौफ पैदा करता है, दर्द देता है। इसका दंश वे झेलते हैं जिनका कोई अपना आत्महत्या कर चला जाता है, उनके प्रियजन, रिश्तेदार एवं मित्र तो दुःखी होते ही हैं, सम्पूर्ण मानवता भी आहत एवं शर्मसार होती है।

गुलशन के साढू राकेश ने प्राॅपर्टी में निवेश के नाम पर उससे करोड़ो रुपये लिये थे, ब्याज सहित रुपये वापस नहीं मिलने और उधार देने वालों के तकादा एवं पिछले कुछ दिनों से अपने धंधे में घाटा उठाने से तनाव, कुंठा, जलालत में गुलशन ने ऐसा घिनौना कदम उठाया। आत्महंता होते व्यक्ति के लिये समस्याएँ विराट हो गई है एवं सहनशक्ति क्षीण हुई है, तभी ऐसी विकराल घटनाएं संस्कृति के भाल पर बदनुमा दाग बनती जा रही है। ये त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण घटनाएं आज के अति भौतिकवादी एवं सुविधावादी युग की देन है। तकनीकी विकास ने मनुष्य को सुविधाएँ तो दीं लेकिन उससे उसकी मानवीयता, संतुलन छीन लिया। उसे अधिक-से-अधिक मशीन में और कम से कम मानव में तब्दील कर दिया है।

खुदकुशी से पहले लिखे नोट में कारोबारी ने आत्महत्या करने के कारण को स्पष्ट किया है। हालांकि इस मामले की छानबीन चल रही है और इससे जुड़े अन्य तथ्यों की जानकारी अभी सामने आनी है, पर इससे यह सवाल एक बार फिर प्रखरता से सामने आया है कि महानगरों में आखिर कैसे ऐसी स्थितियां बनती गई हैं कि लोगों में संघर्ष का साहस छीजता गया है और वे जीवन से हार कर सपरिवार खुदकुशी जैसे कदम उठाने लगे हैं। महानगरों में बढ़ते असुरक्षा, अवसाद, कुंठा और जीवन में प्रति पलायनवादी दृष्टिकोण को लेकर चिंताएं बहुत पहले से प्रकट की जाती रही हैं, पर अब वे स्थितियां भयावह स्तर तक पहुंच गई लगती हैं।

आत्महत्या की समस्या दिन-पर-दिन विकराल होती जा रही है। कभी कोई विद्यार्थी, कभी कोई पत्नी, व्यापारी अथवा किसान, कभी कोई सरकारी कर्मी तो कभी कोई प्रेमी-जीवन में समस्याओं से इतना घिरा हुआ महसूस करता है या नाउम्मीद हो जाता है कि उसके लिये जीवन से पलायन कर जाना ही सहज प्रतीत होता है और वह आत्महत्या कर लेता है। आत्महंता होते समाज में आत्महत्या का सबसे सामान्य तरीका कीटनाशक खाना, फांसी लगाना, रेल्वे के आगे कूद जाना, पानी में डूबना और बंदूक हैं। कारोबार में घाटा, प्रेम में मिली विफलता, पारिवारिक कलह आदि के चलते खुदकुशी की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। दिल्ली से सटे गाजियाबाद में पांच लोगों की मौत इसका ताजा प्रमाण हैं।

महानगर लोगों में बेहतर, सुविधावादी और खुशहाल जीवन के सपने रोपते हैं। इसी आकर्षण में बहुत सारे लोग गांव और अपने छोटे कस्बे को छोड़ कर महानगरों की तरफ भागते हैं, लेकिन महानगरों के जीवन की समस्याएं एवं भयावह सत्य का जब सामने होता है तो जीवन जटिल एवं समस्याग्रस्त प्रतीत लगता है। भारत में होने वाली आत्महत्याओं के प्रमुख कारणों में बेरोगजारी, भयानक बीमारी का होना, पारिवारिक कलह, दांपत्य जीवन में संघर्ष, गरीबी, मानसिक विकार, परीक्षा में असफलता, प्रेम में असफलता, आर्थिक विवाद, राजनैतिक परिस्थितियां होती हैं।

स्त्रियों की अपेक्षा पुरुष अधिक आत्महत्या करते हैं। इसी प्रकार मानसिक विकार के कारण उन्माद, अत्यधिक चिंता, मानसिक अस्थिरता, स्नायुविकार, सदैव हीनता की भावना से ग्रसित रहने, निराशा से घिरे रहने, अत्यधिक भावुक, क्रोधी होने अथवा इच्छाओं का दास होने आदि प्रमुख मानसिक विकार हैं, जिनके अधीन होकर व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है। कोई व्यसन शराब, जुआ, यौन लिप्सा अथवा अपराधी कार्यों, जैसे व्यक्तिगत दोषों की अधिकता के कारण सामाजिक जीवन से अपना तालमेल करने में असमर्थ रहने पर भी आत्महत्या कर लेता है।

छात्रों के सिर पर परीक्षा का तनाव प्रतिस्पर्धा के दौर में और भी बढ़ गया है। कुछ अभिवावक व अन्य लोग सर्वाधिक अंकांे, उन्नत कैरियर जैसे आईएस, सीए, डाॅक्टरी को ही महत्व देते हैं जिससे छात्र पर मानसिक दबाव और बढ़ा देते हैं जबकि उसकी अपनी कुछ विषयों को लेकर रुचि व कठिनाइयां होती हैं। विद्यार्थी जीवन के इन दबावों ने आत्महत्या की घटनाओं को बढ़ाया है। आज रोजगार के अवसर लगभग समाप्त हैं, व्यापार ठप्प है। बेरोजगारी एवं व्यापार में लगातार हो रहा घाटा अवसाद की ओर ले जाता है और अवसाद आत्महत्या में त्राण पाता है।

हर कोई चाहता है कि वह अपने परिवार को अच्छी जिंदगी बसर करने का अवसर उपलब्ध कराए। इसलिए अनेक लोग उद्यम शुरू करते हैं। हालांकि उद्यम और व्यापार में उतार-चढाव के जोखिमों से हम वाकिफ होते हैं और इस तरह नुकसान से पार पाने के लिए पहले से तैयार भी रहते हैं। पर पिछले कुछ सालों से व्यापार में घाटे और कर्ज का बोझ बढ़ने की वजह से खुदकुशी की घटनाएं बढ़ी हैं। यह प्रवृत्ति केवल बड़े नुकसान उठाने वाले व्यापारियों मंे नहीं, छोटे और खुदरा व्यापार करने वालों में भी देखी गई है, जो अक्सर बहुत आसानी से अपना धंधा बदल लेने को तैयार रहते हैं। निश्चित रूप से इसके लिए देश की व्यापारिक स्थितियां जिम्मेदार हैं, पर इसमें सामाजिक बेपरवाही और संवेदनात्मक संकुचन भी कम जिम्मेदार नहीं है।

यह ठीक है कि पिछले कुछ समय से देश में कारोबारी स्थितियां अच्छी नहीं हैं, बहुत सारे लोगों को अपने धंधे बंद करने पड़े, कई कारोबारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है, बहुत सारे लोगों का रोजगार छिन गया है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि इससे पार पाने के लिए उन्होंने जीवन समाप्त करने का रास्ता ही चुना।

आत्महत्या की प्रवृत्ति अचानक नहीं पनपती। लंबे समय के अवसाद, तनाव, संत्रास अपमान के भय आदि से गुजरने के बाद ही कोई व्यक्ति इस तरफ कदम बढ़ाता है। इसलिए अगर कोई पूरे परिवार के साथ खुदकुशी का फैसला करता है, तो जाहिर है कि साथ के सभी लोग इस प्रक्रिया से गुजर रहे होंगे। गाजियाबाद की ताजा घटना से पहले भी कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। जब कोई व्यक्ति ऐसी स्थितियों से गुजर रहा होता है, तो उसमें आस-पड़ोस, रिश्तेदार, दोस्त, सहकर्मी आदि उसे उनसे बाहर निकालने का प्रयास करते हैं। मगर हैरानी की बात है कि अब समाज अपनी यह भूमिका क्यों नहीं निभा पा रहा है। इस चिंताजनक स्थिति से निपटने के लिए सरकार के स्तर पर कारगर उपाय जुटाने की दरकार है। प्रश्न यह भी है कि समाज इतना संवेदनहीन क्यों होता जा रहा है? शासन व्यवस्था भी निष्ठुर बनती जा रही है।

तथाकथित विकास के बीच आत्महत्याओं की संख्या पहले से अधिक हो गई है। यह समाज के हर एक व्यक्ति के लिए चिंता का विषय है। चिंता की बात यह भी है कि आज के सुविधा भोगी जीवन ने तनाव, अवसाद, असंतुलन को बढ़ावा दिया है, अब सन्तोष धन का स्थान अंग्रेजी के मोर धन ने ले लिया है। जब सुविधावादी मनोवृत्ति सिर पर सवार होती हैं और उन्हें पूरा करने के लिये साधन नहीं जुटा पाते हैं तब कुंठित एवं तनावग्रस्त व्यक्ति को अन्तिम समाधान आत्महत्या में ही दिखता है। फ्रांसिस थामसन ने कहा कि “अपने चरित्र में सुधार करने का प्रयास करते हुए, इस बात को समझें कि क्या काम आपके बूते का है और क्या आपके बूते से बाहर है।’ इसका सीधा-सा अर्थ तो यही हुआ कि आज ज्यांे-ज्यांे विकास एवं सुविधावाद के नये कीर्तिमान स्थापित हो रहे हैं, त्यांे-त्यांे सहिष्णुता-संवदेना के आदर्श धूल-धूसरित होे रहे हैं और मनुष्य आत्महंता होता रहा है।

जो परिवार तलाक, अलगाव, आर्थिक कलह एवं अभावों, रिश्तों के कलह के कारण टूटी हुयी स्थिति में होते हैं उनमें भी आत्महत्या की घटनाएं अधिक पायी जाती हैं। राजनैतिक उथल-पुथल और व्यापार में नुकसान, आर्थिक तंगी भी आत्महत्या का कारण बनती है। किसानों की फसल की तबाही और कर्ज की अदायगी की चिंता से हो रही आत्महत्या भी गंभीर समस्या बन गई है। कर्ज लेकर घी पीने की जीवनशैली ने भी सबकुछ दांव पर लगा दिया है। औद्योगीकरण तथा नगरीकरण में वृद्धि भी इसके कारण है। भौतिक मूल्यों के बढ़ते हुए प्रभाव ने सामाजिक सामंजस्य की नई समस्याओं को जन्म दिया है। लेकिन आत्महत्या किसी भी सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज के भाल  पर एक बदनुमा दाग है, कलंक हैं। टायन्बी ने सत्य कहा हैं कि कोई भी संस्कृति आत्महत्या से मरती है, हत्या से नहीं।’

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