Thursday, October 1, 2020 at 1:14 AM

महिलाओं की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होने चाहिए

तारकेश्वर मिश्र

हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या क्या है ? आज की तिथि में यदि इस प्रश्न का जवाब देश के बच्चों से पूछा जाए तो उनका एकमत जवाब होगा-बलात्कार। निस्संदेह, बलात्कार एक राष्ट्रीय कोढ़ जैसी समस्या है, और इस समस्या के कारण देश की महिलाओं, युवतियों, किशोरियों और यहां तक कि तीन-चार वर्ष की बच्चियों के साथ ही पूरे देश को पड़ोसी देशों के साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ में तक शर्मसार होना पड़ा है।

दिल्ली में निर्भया कांड से लेकर हैदराबाद में निर्भया कांड तक अमानवीय कृत्यों की लंबी फेहरिस्त है। कड़े कानून बनाने से लेकर दोषियों को सजा देने तक की बात हो रही है, लेकिन कानून का डर दिखाई नहीं दे रहा है। स्थिति में कोई खास परिवर्तन देखने को नहीं मिला है। असल में महिला सुरक्षा का मुद्दा बड़ा सवाल है जो सारे समाज के सामने मुंह बाये खड़ा है। महिलाओं को बराबरी की भले ही जितनी बातें हो रही हों, लेकिन नारी आज भी शोषण का शिकार है, ये कटु सच्चाई है।

इन तमाम नकरात्मक खबरों के बीच गत दिवस सोशल मीडिया पर उप्र के हरदोई शहर से एक अच्छी खबर आई। रात में सड़क पर अकेले जा रही एक युवती को देखकर गश्त पर निकले पुलिस अधीक्षक ने अपनी गाड़ी रोककर उससे बात की और तब पता चला कि वह एक होटल में कर्मचारी है और अपनी पारी खत्म होने के बाद घर लौट रही थी। पुलिस अधीक्षक फौरन उक्त होटल गए और उसके प्रबंधन को फटकारते हुए आदेश दिया कि रात में किसी महिला कर्मचारी के घर लौटने की स्थिति में उसे सुरक्षित घर पहुंचाने हेतु वाहन उपलब्ध करवाया जावे। हालांकि होटल मालिक इस आदेश का कितना पालन करेंगे ये कह पाना कठिन है लेकिन छोटी सी यह खबर किसी अच्छी व्यवस्था की शुरुवात बन सकती है।

वैसे कॉल सेंटर, एयर लाइंस, टीवी चैनल सहित सितारा होटलों में रात को घर लौटने वाले कर्मचारियों, खास तौर पर महिला कर्मियों के लिए ऐसी सुविधाएं हैं लेकिन कम आय वाली नौकरियों में इस तरह की बात सोचना भी सपना है। बहरहाल हरदोई की उक्त घटना के बाद गत दिवस पंजाब सरकार ने भी कुछ फोन नम्बरों की जानकारी देते हुए ये आदेश जारी कर दिया कि रात्रि में किसी अकेली महिला का फोन आने पर उसको पुलिस वाहन में घर छोडने की व्यवस्था की जावे। निश्चित रूप से ये एक आदर्श स्थिति होगी जिससे पुलिस की छवि सुधरने के साथ ही शासन और प्रशासन में आम जनता का भरोसा बढ़ेगा।

एक टीवी चैनल की पत्रकार ने गत रात्रि लखनऊ में कुछ घंटे विभिन्न बस स्टाप वगैरह पर गुजारने के बाद अपने जो अनुभव सुनाये उनके मुताबिक उसे किसी सार्वजनिक स्थान पर कहीं भी पुलिस नहीं दिखाई दी। पास खड़े पुरुषों द्वारा अभद्र टिप्पणियां भी उसे सुननी पडीं। हैदराबाद की घटना के बाद देश भर में महिलाओं की जो रोषपूर्ण प्रतिक्रियाएं सुनाई दे रही हैं उनमें पुलिस व्यवस्था में कमी की शिकायत भी आम है। इसका दूसरा पहलू ये भी है कि बढ़ती आबादी के अनुपात में पुलिस बल उतना नहीं बढ़ा। किसी नेता या अन्य विशिष्टजन के आगमन पर उसकी सुरक्षा के लिए तो पुलिस की व्यवस्था कर दी जाती है लेकिन आम जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। पुलिस के पास वाहन आदि की पर्याप्त व्यवस्था भी नहीं है।

ऐसे में पंजाब सरकार द्वारा महिलाओं को घर पहुंचाने के लिए पुलिस वाहन की सुविधा देने का फरमान कितना कारगर हो सकेगा ये बड़ा सवाल है। इसके साथ ये भी सोचने वाली बात है कि क्या हमारे देश की पुलिस इतनी विश्वसनीय है कि रात के समय सुरक्षित घर लौटने के लिए अकेली महिला बेखौफ उसकी मदद ले सके। उल्लेखनीय है कि देश के अनेक थानों में पुलिस कर्मियों द्वारा महिलाओं के साथ आपत्तिजनक व्यवहार किये जाने की घटनाएँ प्रकाश में आती रही हैं। और फिर अपराधियों से पुलिस की संगामित्ती भी जगजाहिर है। हो सकता है पंजाब की देखासीखी कुछ और राज्य भी महिलाओं को रात के समय पुलिस वाहन की सुविधा देने की घोषणा कर दें। हालांकि इस व्यवस्था की सफलता पर अनगिनत प्रश्नचिन्ह हैं। फिर भी इसका स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि समाज का वातावारण जिस तरह से दूषित होता जा रहा है उसके मद्देनजर महिलाओं का सम्मान और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।

दिल्ली गैंग रेप कांड और इसके बाद जो कुछ भी हुआ है, वह कई मायनों में अभूतपूर्व है। इस नृशंसतम घटना के बाद कहा जा रहा है कि देश ‘जाग’ गया है, 125 करोड़ देशवासी जाग गए हैं, लेकिन सच्चाई इसके कहीं आसपास भी नहीं है। न देश अन्ना के आंदोलन के बाद जागा था, और न ही अब जागा है। हमारी आदत है, हम आधुनिक सुख-सुविधाओं के साथ आराम तलब होते चले जा रहे है। हम पहले जागते नहीं, और कभी देर से जाग भी गए, तो वापस जल्दी ही सो भी जाते हैं। यदि जाग गए होते तो घटना के ठीक बाद बस से नग्नावस्था में फेंके गए युवक व युवती को यूं घंटों खुद को लपेटने के लिए कपड़े की गुहार लगाते हुए घंटों वहीं नहीं पड़े रहने देते।

और तब ना सही, करोड़ों रुपए की मोमबत्तियां जलाने/गलाने के बाद ही सही, जाग गये होते तो अब देश में कोई बलात्कार न हो रहे होते, जबकि दिल्ली की घटना के बाद तो देश में जैसे बलात्कार के मामलों की (या मामलों के प्रकाश में आने की) बाढ़ ही आ गई है। इसका अर्थ तो यह हुआ कि कि देश की बड़ी आबादी को दिल्ली के कांड की जानकारी ही नहीं है, और देश की अन्य समस्याओं, भूख, गरीबी, बेकारी, बेरोजगारी, महंगाई व भ्रष्टाचार के बीच वह अपने लिए दो जून की रोटी जुटाने में सो ही नहीं पाता, तो जागेगा क्या। हैदराबाद, बक्सर और उन्नाव में जो कुछ हुआ उससे मानवता का सिर शर्म से झुक जाता है।

बलात्कार की समस्या को समग्रता से समझें तो मानना होगा हमारी बहुत सी समस्याएं लगती तो शारीरिक हैं, लेकिन होती मानसिक हैं। बलात्कार भी एक तरह से तन से पहले मन की बीमारी है। और इसकी जड़ में समाज के अनेक-शिक्षा, लिंग, सामाजिक-आर्थिक स्तर के विभेद जैसे अनेक कारण भी हैं। कानून, पुलिस और न्यायिक व्यवस्था का प्रभाव तो बहुत देर में आता है। आधुनिकता के फेर में युवा पीढ़ी में खुलापन आने के साथ उसकी आड़ में जिस तरह का उन्मुक्त व्यवहार देखने मिल रहा है वह चिंता का कारण है। महिलाओं के मन में व्याप्त असुरक्षा का भाव किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं है। उसे दूर करने के लिए जो भी करना पड़े वह किया जाना चाहिए। लेकिन इसमें ज्यादा देर ठीक नहीं होगी क्योंकि पानी सिर से ऊपर गुजरने की स्थिति में आ चुका है और लोगों की नाराजगी इस हद तक बढ़ती जा रही है कि सड़क से संसद तक ये मांग उठने लगी है कि दुष्कर्मियों को कानून की अदालत की बजाय जनता के हवाले कर दिया जाए जिससे उन्हें उनके किये की सजा जल्दी से जल्दी दी जा सके। महिलाओं की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। सरकार को इस दिशा में त्वरित कार्यवाही करते हुए बेटियों को सुरक्षित वातावरण प्रदान करना चाहिए। इसमें समाज को भी आगे बढ़कर अपना योगदान देना होगा। जब सरकार और समाज दोनों ओर से प्रयास होंगे तभी एक स्वस्थ समाज को निर्माण हो सकेगा।

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