धर्म - अध्यात्म

इंसान का प्रथम परिचय उसका गेटअप है

इंसान का गेटअप बहुत बड़ा मायने रखता है। वैसे देखा जाए तो यह शब्द फिल्मों या थियेटर में ज्यादा इस्तेमाल होता है। इस्तेमाल क्या होता है फिल्मों या नाटकों में  लोग उस गेटअप मेें अपने को दर्शाते हैं। जैसे एक कलाकार अलग-अलग नाटकों या फिल्मों मेें अलग-अलग किरदार निभाता है तो उसे उस किरदार के अनुसार अपना रूप भी रख़ता है। जैसे एक कलाकार किसी फिल्म में अगर पुलिस वाले का किरदार निभाता है तो वह खाकी वर्दी पहनाता है और अगर किसी फिल्म में वह डाकू का किरदार निभाता है तो वह डकैत का लिबास पहनेगा। यहां एक बात और है, अब देखने वाले का नजरिया भी उसी गेटअप के अनुसार बनता है और बिगड़तता है। किरदार के प्रति ऑडियंस की सोच बदलती रहती  है।
जैसे अगर कोई हीरों फिल्मों ज्यादात्तर अच्छे रोल निभाता है तो वह लोगों को चहेता बन जाता है। उसकी लोकप्रियता दिनोंं-दिन बढ़ती है।  वहीं एक एक कलाकार जब ज्यादात्तर एक खराब आदमी के रोल निभाता है तो वह लोगों कंी नजरों में बुरा आदमी बन जाता है। जबकि यह सारी बातें फिल्मों के पर्दें पर ही होती है। असल जिदंगी में कौन- कैसा  यह तो वहीं जाने। जरूरी नहीं फिल्मों का विलेन असल जिदंगी में भी विलेन ही हो। प्राण साहब फिल्मों में विलेन का किरदार निभाते थे, लेकिन असल जिंदगी बहुत अच्छे आदमी थे। लोग उनकी तारिफ  आज भी करते हैँ। लेकिन फिल्मों में उनकों देखकर बुरा-भला ही कहते थे।
अगर अपने समाज की तुलना एक नाटक के रंगमंच से करें तो कोई गलत नहीं होगा। वैसे भी शेक्सपियर ने बहुत पहले ही कहा था कि दुनिया एक रंगमंच है। इस समाज में जो जैसा गेटअप रखता है लोग उसे उसी के अनुसार देखते हैँ और भी व्यवहार भी करते हैं। आदमी के गेटअप के अनुसार ही दूसरे की मानसिकता भी बदलती है।
 जैसे कोई एक सफेद एप्रेन पहने और  कंघे पर आला टांगे है तो आप उसे डाक्टर ही तो कहेंगे। भले ही वह आदमी डाक्टर न हो। इसी प्रकार से  अगर कोई काला कोट पहले वह वह वकील ही कहलाएगा और उसके लिबास के अनुसार दूसरे लोगों को नजरिया भी बदलेगा।
अगर कोई नर्तकी फिल्मों में आइटम डांस कर रही हो और उसक नृत्य पर दर्शकों की सीटिया बज जाए तो शायद आप दर्शकों को गलत नहीं कहना चाहिए  है। भले वह कोर्इै अच्छी कालाकार हो और किसी संभा्रत परिवार से संबंध रखती हो। दर्शक उसकी कालाकारिता की तारिफ करते है या नहीं पर यह है कि जाहिर उनका नजरिया उस नर्तकी के प्रति बदला ही हुआ होगा। इसके विपरीत कोई एक्ट्रेस किसी देवी के रोल में आती है तो दर्शक उसके पैर भी छूते  है और देवी रूप में उसका कैलेंडर भी अपने घर में लगाते हैं।
इस समाज में लोग आपका परिचय में बाद में जानते हैँं पहले आपके कपड़ों और हाव-भाव से आपके बारे में आंकलन करते हैंं। यह एक इंसान की मानसिकता है।  उसी के अनुसार  उनकी प्रतिक्रिया होती है। अगर एक डाक्टर-वकील के रूप में हैं तो लोग आपका सम्मान ही करेंगे।  और अगर भिखारी का रूप धरे हैं तो लोग आपके कटोरे में पैसा डाल ही देंगे, फिर आप चाहे बहुत बड़ा ही आदमी क्यों न हो।
हां, एक बात जरूर है कि समाज में बहुत से लोग मेमना की खाल में भेडिय़ा भी होते हैं। दिखते कुछ और अंदर से कुछ और ही होते हैं। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि  आपकी पारखी निगाहे किसी को कितना परख पाती है । एक टीवी शो आता है  उसमें एक एंकर अपनी पंच लाइन बोल कर ही अपनी बात समाप्त करता है कि अपराध आप से कितना दूर है कि यह इस बात पर निर्भर करेगा की आप अपमें कितने सर्तक हैं।
एक बात और, वह यह कि आप जहां पर जिन लोगों के साथ हैं जिस अवस्था में लोग आपका ऑकलन उसी के अनुसार करेंगे। जैसे शराब के अडे पर आप कहें कि हम हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे तो कोई विश्वास नहीं करेगा। लोग आपको दारूबाज ही समझेगें। भले आप न पीते हो। अंत में एक बात कहना  चाहूॅगा कि अगर आप अपना कोई कीमती सामान  बाहर खुले में छोड़ देंगे तो कोई न कोई उसे ले ही जाएगा। समाज के कुछ नियम होते हैं। जिनकों मानना आपकी बाध्यता तो नहीं है। न उस पर कोई कानून की सजा है । लेकिन याद रखना चाहिए कि  वे बने आपकी भलाई के लिए ही है।

 

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