विचार मित्र

संघ को मानवता की दृष्टि से समझे

ललित गर्ग

दक्षिण दिल्ली के जसोला में डॉ. हेडगेवार स्मारक न्यास एवं भगवान महावीर रिलीफ फाउंडेशन ट्रस्ट के संयुक्त प्रयासों से प्रारंभ हुए मेडी-डायलिसिस सेंटर का उद्घाटन करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघचालक श्री मोहन भागवत ने भारत की समृद्ध संस्कृति एवं आध्यात्मिक जीवन शैली से न केवल नया भारत बल्कि दुनिया को उन्नत तरीके से निर्मित करने का संकल्प व्यक्त किया। संघ की स्थापना के शताब्दी दशक में दुनिया के सबसे बड़े संगठन के प्रमुख ने जिस सरलता-सहजता  से भारत की माटी की विशेषताओं का वर्णन किया, वह एक विरल एवं अनूठी घटना कहीं जा सकती है। संघ को संघ की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता की दृष्टि से समझने के लिये यह अवसर यादगार एवं अविस्मरणीय बना।

भारत कोई भूमि का टुकड़ा या भूगोल का नक्शा नहीं है वरन् भारत एक जीवन दर्शन है, जीवंत संस्कृति है, वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वे भवंतु सुखिनः और जीयो और जीने दो का अमर संदेश है। अब हमारी पहचान किसी जाति, किसी पंथ या किसी धर्म के आधार पर नहीं वरन् भारतीयता के आधार पर होनी चाहिए। हमारा एक ही लक्ष्य हो- मैं अच्छा इंसान बनूंगा। हर अच्छा इंसान अपने आप में जीता-जागता भारत है। इसी सोच से जुड़ा है संघ का हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र का लक्ष्य। हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र इसी मूल सोच का विस्तार है, जिसके आधार पर विश्व के सबसे प्राचीन राष्ट्र के रूप में भारत की अलग पहचान बनी। जो सबके सुख के लिए अपने सुख को तिलांजलि दे सकता है। इस सृष्टि में जितने भी जीव-अजीव हैं, सबमें हम हैं और हममें सब हैं। यानी हम सब एक दूसरे में समाए हुए एक ही आत्मतत्व के अंग हैं। इसलिए किसी के बुरे की कामना वस्तुतः अपने ही लिए बुरे की कामना है।

हिन्दू, जैन, मुस्लिम, सिख, ईसाई रूपी नदियों से मिलकर बना भारत महासागर है। ये सारे धर्म ठीक वैसे ही है जैसे बगिया में खिले हुए अलग-अलग तरह के फूल जो बगिया की शोभा को घटाते नहीं वरन् बढ़ाते हैं। हम सभी धर्मों का एवं सभी धर्म के महापुरुषों का सम्मान करना सीखें। हिंदुत्व की इस व्यापक अवधारणा पर आधारित संघ अपना लक्ष्य भारत को ऐसा ही हिंदू राष्ट्र बनाना है, जो इस सभ्यता और संस्कृति को समृद्धि देने का माध्यम बने। इसका अर्थ है कि कोई किसी मजहब को मानता हो, किसी का रहन-सहन, वेश, भाषा, पूजा पद्धति कुछ भी हो, सब एक ही तत्व के अंग हैं, सब भारतीयता के अंग है।

इसीलिए संघ ने समाज के हर क्षेत्र में संगठन खड़े किए, करीब 50 उप-संगठनों के साथ न केवल शिक्षा, संस्कार निर्माण बल्कि सेवा के विविध उपक्रम संचालित कर रहा है। लगभग सौ वर्ष पहले नागपुर के एक छोटे से मैदान से कुछ गिनती के लोगों के साथ जब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की शाखा आरंभ की तो उस समय आज के इतने विराट स्वरूप की कल्पना उन्होंने नहीं की थी। लेकिन पवित्र उद्देश्यों के साथ प्रारंभ हुआ यह संगठन अनेक बाधाओं एवं प्रतिबंधों के बावजूद आज एक वटवृक्ष का रूप ले चुका है, जिस पर न केवल भारत की बल्कि दुनिया की नजरे टिकी है, चहुं ओर से एक स्वर सुनाई दे रहा है कि संघ ही नई दुनिया निर्मित करने में सक्षम है।

संघ अगले 100 वर्षों में भारतीय या हिंदुत्व दृष्टि के अनुरूप विश्व को सुविधावाद  से संयम, हिंसा से अहिंसा, नफरत और वैरभाव से प्रेम की ओर ले जाकर सह-जीवन और साझेदारी की विश्व व्यवस्था कायम करने की भूमिका निभाना चाहता है। विश्व सभ्यतागत संकट का शिकार है। इसमें बदलाव लाने की शक्ति हिंदू दर्शन में है। मोहन भागवत कहते हैं कि हर व्यक्ति के पास सब कुछ नहीं हो सकता लेकिन सबको मिला दें तो सभी के लिए बहुत कुछ हो सकता है। यह प्राचीन भारत के सहकारी जीवन दर्शन का नया स्वरूप है। जातिवाद, अस्पृश्यता, दहेज, लिंगभेद और राजनीतिक वैरभाव इसमें मुख्य बाधाएं हैं। संघ यह मानता है कि हिंदू सभ्यता में जातिभेद, लिंग या किसी स्तर पर असमानता का कोई स्थान नहीं। इसे व्यवहार में उतारने के लिए सामाजिक परिवर्तन का अभियान कैसे चले, इस पर विचार करना चाहिए।

अस्तित्व को पहचानने, दूसरे अस्तित्वों से जुड़ने, राष्ट्रीय पहचान बनाने और अपने अस्तित्व को राष्ट्र एवं समाज के लिये उपयोगी बनाने के लिये मोहन भागवतजी का जसोला-उद्बोधन संघ के दृष्टिकोण से अवगत कराने का एक सशक्त माध्यम बना है। सेवा एवं परोपकारी गतिविधियों में संघ की सकारात्मक भूमिका को भी प्रभावी ढ़ंग से प्रस्तुति देने के साथ-साथ यह एक दस्तक है, एक आह्वान है जिससे न केवल सशक्त हिन्दुत्वमय भारत का निर्माण होगा, बल्कि इस अनूठे काम में लगे संघ, सरकार एवं सकारात्मक शक्तियों को लेकर बनी भ्रांतियांे एवं गलतफहमियों के निराकरण का वातावरण भी बनेगा। राष्ट्रीयता, सामाजिकता एवं सेवामूलक प्रवृत्तियों से ओतप्रोत संकल्पों के इस उद्बोधन की ध्वनि-तरंगों की अनूठी दिव्यता ने समूचे राष्ट्र को अभिप्रेरित किया।

विशेषतः मोहन भागवत का यह विश्वास सामने आया कि जो सपने अब तक अधूरे हैं, वे भी पूरे होंगे। कैसे होंगे? इसकी प्रक्रिया भीतर-ही-भीतर चलती रहती है। एक दिन आता है, सपना सच बन जाता है और उसकी निष्पत्ति सामने आती है मेडी-डायलिसिस सेंटर जैसी सेवामूलक ईकाईयों के रूप में। संघ के सपनों का समाज बनना निश्चित ही असंख्य कार्यकर्ताओं को आत्मतोष देने वाला है। भागवत ने कहा कि हिन्दू संस्कृति है दर्शन है, विचारधारा है, उन्होंने कहा कि देश की प्रतिष्ठा बढ़ाने और विविधताओं का सम्मान करने वाला हिन्दू है।

संघ का मानना है कि जिनका सरोकार भारत की संस्कृति, परम्परा और आदर्शों से है, वे सब हिन्दू है। जब हिन्दुस्तान के कण-कण में हिन्दुत्व है तो इसे हिन्दुत्व राष्ट्र कहने एवं बनाने में दिक्कतें क्यों? भागवत ने भारत के भविष्य को लेकर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के साथ ही अपनी नीतियों, सेवा-प्रकल्पों, अपने क्रियाकलापों और उद्देश्यों के बारे में जिस तरह विस्तार से प्रकाश डाला उसके बाद कम-से-कम उन लोगों की उसके प्रति सोच बदलनी चाहिए जो उसे बिना जाने-समझे एवं तथाकथित पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों के चलते एक खास खांचे में फिट करके देखते रहते हैं।

‘खणं जाणाहि’ भगवान महावीर के इस आदर्श सूक्त- समय का मूल्य आंको- की भांति डाॅ. भागवत ने एक-एक क्षण को सार्थक और सफल बनाने का जीवन-सूत्र दिया। इससे संकल्प-शक्ति का विकास होता है। आस्था मजबूत होती है और व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के आसपास जनमती एवं पनपती बुराइयों-जीवन समस्याओं से बचने के लिये सुरक्षा कवच प्राप्त होता है। इस उद्बोधन का हार्द है सृजन-सेवा चेतना को जगाना। अनुकरण की प्रवृत्ति एक मूर्ख में भी हो सकती है, पर उसमें सृजन-सेवा की चेतना नहीं होती। संघ के कार्यकर्ता सृजनात्मक तरीके से नई शैली का विकास करें तो वे अपना वैशिट्य प्रमाणित कर सकते हैं। अपेक्षित है कि स्वयंसेवक विवेकजीवी बनें। वे भारतीय मनीषा तक पहुंचकर नई दृष्टि प्राप्त करें।

वे इस बात को समझें कि अक्षर के बिना भी अक्षय की साधना हो सकती है। शब्दों की सिद्धि के बिना शब्द व्यर्थ हो जाते हैं। स्वयंसेवकों को करुणा की, सृजन की, सेवा की, राष्ट्र-निर्माण की लोकयात्रा को आगे बढ़ाना है, यही संघ की सार्थकता का आयाम है और संभवतः यही भागवतजी के उद्बोधन का आह्वान है।

विश्व के सबसे बड़े समाजसेवी-सांस्कृतिक-राष्ट्रीय संगठन की सोच जब सकारात्मक एवं सेवामूलक होती है, तब एक नया समाज-एक नया राष्ट्र निर्मित होता है। संघ के स्वयंसेवक अनेक स्थानों पर सकारात्मक-रचनात्मक प्रकल्प चला रहे हंै, जो रचनात्मकता-सृजनात्मकता का प्रस्फुटन है। सरसंघचालक से प्रेरणा-पाथेय प्राप्त कर अब संघ के कार्यकर्ता और ऊर्जा के साथ समाज में एक सकारात्मक वातावरण बनाने के लिए जुटेंगे, यह विश्वास किया जा सकता है। संघ की विश्व दृष्टि इसी में निहित है। यह दृष्टि संपूर्ण विश्व के कल्याण के भाव से काम करने की है। संघ की प्रतिज्ञा में भारत माता को गुलामी से मुक्त कराने के लिए स्वयंसेवक बनने की बात थी, लेकिन अब स्वतंत्रता के बाद यह भारत को परम वैभव पर पहुंचाने एवं अच्छे-सच्चे इंसान गढ़ने में परिवर्तित हो गई।

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