धर्म - अध्यात्म

जिसकी हम हमेशा तलाश करते हैं…

सोनू नैय्यर
मैं अक्सर अपने दोस्तों और परिवार से कहा करती थी, मैं एक धाॢमक व्यक्ति नहीं हूं। मैं गर्व से कहती थी, मैं कर्म के दर्शन में विश्वास करती हूं। पूजा के लिए धाॢमक स्थल घूमना और बेकार के रीति-रिवाज मेरे लिए हास्यास्पद थे। ऐसा कहा गया है कि समय एक शक्तिशाली माध्यम है जो हमें सच की ओर जाने में मदद करता है। ऐसा मेरे साथ हुआ है। मेरा जीवन नकारात्मक तत्वों से विचलित था और वह मुझे नीचे झुका रहा था। ईष्र्या और द्वेष के पीछे छिपे कारण को मैंने जानने की बहुत कोशिश की लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं मिला। आत्मविश्लेषण और विश्लेषण से भी कोई मदद नहीं मिली। पलटकर वार करना और बदला लेने जैसे विचार ही मन में आये। मैं हतोत्साहित महसूस करने लगी। मुझे खुद की अधमता पर दया आने लगी।
मेरे पति जो अपने दिन की शुरुआत पास के मंदिर में जाकर और लगन से पूजा कर करते हैं, उन्होंने मेरे दर्द और कष्ट को समझा। उन्होंने ध्यान और साधारण अनुष्ठानों में हिस्सा लेने के लिए मुझे राजी कर लिया। मेरा ताॢकक दिमाग आसानी से इसके लिए तैयार नहीं हो रहा था लेकिन कुछ दिनों बाद धर्म मेरे लिए प्रेरणा और खुशी का स्रोत बन गया। मेरे पति ने मुझे मंदिर जाने के लिए भी मना लिया। जल्द ही मैं ‘5 ए म क्लब की सदस्य बन गई और मेरी मुलाकात उस सर्वशक्तिमान से रोज होने लगी। इस प्रकार भगवान से मेरी बातचीत शुरु हो गई।
मंत्रों का जाप करके और प्रार्थनाओं से मैं अपने स्फूॢतदायक और प्रेरणादायक दिन की शुरुआत करती हूं। मेरा धाॢमक हिस्सा धीरे-धीरे मुझे आध्यात्म की ओर ले जाना लगा। मैंने अपने अंदर एक गहराई महसूस की, एक ऐसी उच्च शक्ति जो हमारा मार्गदर्शन करती है। रचयिता से जुड़े मेरे इस रिश्ते ने मुझे कई मुद्दों को सुलझाने में मदद की जिसपर मुझे संदेह था। हालांकि मैं अपने हृदय को भूलने में सक्षम नहीं थी लेकिन सुबह की प्रार्थनाओं ने मुझे आत्मविश्वासी और शक्तिशाली महसूस कराया। कृष्ण के साथ मेरी बातचीत ने मेरे मानसिक आघात को खत्म किया और मां दुर्गा की प्रार्थनाओं ने मुझे शसक्त किया।
लेकिन अब तक मेरी समस्याएं खत्म नहीं हुई थी। संघर्ष लंबा है लेकिन भगवान के साथ जुड़े मेरे संबंध ने मुझे अनंत शक्ति प्रदान की। मैंने अपनी आंतरिक आवाज सुनी जो मुझे शांति प्रदान करती है। इसने मेरी सुस्त भावनाओं को खत्म किया और जिस कारण मैंने अपनी गलतियों से सीखना शुरु कर दिया। आज भगवान से मेरा वही संबंध है जो हमारा एक स्वादिष्ट खाने से होता है और जिसकी हम हमेशा तलाश करते हैं। यह इंद्रियों की संतुष्टि और सुख के लिए आवश्यक है। मेरा मन पहले तुच्छ और अनुत्पादक बंद गलियों में भटका करता था और उन विचारों से भरा हुआ था जो ना तो मेरी सोच को उपर उठाते थे और ना ही प्रेरणादायक थे। लेकिन अब यह सुखदायक और अथाह गहरे विषयों का आशियाना बन गया है। इसमें थोड़ा समय लगा लेकिन मैंने खुद को ढ़ूंढ़ निकाला। एक शक्ति ने मुझे बचाया, चाहे उसे हम धर्म, आध्यात्मिकता या कोई अन्य नाम दें दे।
यह तो तय है कि यह दिव्य है लेकिन मानव निॢमत नियमों के बिना भी इसने मेरे अंदर शांति, खुशी और करुणा का संचार किया है। यह लगातार मेरे हृदय में समृद्ध हो रहा है। अब सवाल यह रह जाता है कि क्या मैं धाॢमक हूं? मैं अब तक नहीं जानती। मुख्य बात यह है कि मैं प्रभु से प्यार करती हूं। सोच यह है कि मैं उनके पंसदीदा बच्चों में से एक हूं और उनकी परोपकारिता और प्रेम के संरक्षण में हूं।

 

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