नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और संघ

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का कोई असली नेता था तो वे थे नेता जी सुभाष चन्द्र बोस। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार के विचार एक थे। पूर्ण स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए हिंसा अथवा अहिंसा किसी भी मार्ग को अपनाने के पक्षधर दोनों थे। कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीतियों के खिलाफ सुभाष और हेडगेवार दोनों थें। दोनों महापुरूषों ने कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लिया और कई बार जेल भी गये लेकिन कुछ मुद्दों को लेकर महात्मा गांधी और कांग्रेस की नीतियों से मतभिन्नता होने के कारण दोनों ने स्वयं को कांग्रेस से अलग कर लिया। इसके बाद डा.हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से और नेता जी सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के माध्यम से देश को स्वतंत्र कराने के प्रयास प्रारम्भ किये। स्वतंत्रता आन्दोलन में इन दोनों महापुरूषों के अविस्मरणीय योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

26 जनवरी 1931 को कोलकाता में सुभाष चन्द्र बोस एक विशाल मोर्चे का नेतृत्व कर रहे थे तभी पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जब सुभाष जेल में थे तब गाँधी जी ने अंग्रेज सरकार से समझौता किया और सब कैदियों को रिहा करवा दिया। लेकिन अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारियों को रिहा करने से साफ इन्कार कर दिया। सुभाष चाहते थे कि इस विषय पर गाँधीजी अंग्रेज सरकार के साथ किया गया समझौता तोड़ दें। लेकिन गांधीजी अपनी ओर से दिया गया वचन तोड़ने को राजी नहीं हुए। अंग्रेज सरकार अपने स्थान पर अड़ी रही और भगत सिंह व उनके साथियों को फाँसी दे दी गयी। भगत सिंह को न बचा पाने पर सुभाष चन्द्र बोस गाँधी और कांग्रेस के तरिकों से नाराज हो गये।

1938 में गान्धीजी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सुभाष को चुना तो था मगर उन्हें सुभाष की कार्यपद्धति पसन्द नहीं आयी। इसी दौरान यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल छा गए थे। सुभाष चाहते थे कि इंग्लैंड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर भारत का स्वतन्त्रता संग्राम अधिक तीव्र किया जाये। उन्होंने अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में इस ओर कदम उठाना भी शुरू कर दिया था परन्तु गान्धीजी इससे सहमत नहीं थे।
1939 में जब नया कांग्रेस अध्यक्ष चुनने का समय आया तब गान्धी जी ने अध्यक्ष पद के लिये पट्टाभि सीतारमैया को खड़ा कर दिया। गान्धीजी के विरोध के बावजूद सुभाष बाबू 203 मतों से चुनाव जीत गये। गान्धीजी ने पट्टाभि सीतारमैय्या की हार को अपनी हार बताकर अपने साथियों से कह दिया कि अगर वें सुभाष के तरीकों से सहमत नहीं हैं तो वें कांग्रेस से हट सकतें हैं। इसके बाद कांग्रेस कार्यकारिणी के कई सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। आखिर में तंग आकर 29 अप्रैल 1939 को सुभाष ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

जनवरी 1938 में सुभाष चन्द्र बोस को इंग्लैन्ड और आस्टेलिया दौरे के समय यूरोप के राजनैतिक माहौल का पता चल गया था। एक ओर तो देश की भीतर एक उग्र आन्दोलन प्रारम्भ हो और दूसरी ओर अंतराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटेन के शत्रु राष्ट्रों का समर्थन प्राप्त किया जाय। डा.हेडगेवार भी इस रणनीति से सहमत थे। परन्तु इस विषय को लेकर महात्मा गांधी और सुभाष चन्द्र बोस के बीच खाई बढ़ गयी। गांधी अहिंसा के ही रास्ते पर चलने के पक्षधर थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व डा. हेडगेवार भी अंतराष्ट्रीय राजनीति के घटनाक्रम का अध्ययन कर रहे थे। परतंत्रता उन्हें चुभती थी। जैसे —जैसे विश्वयुद्ध की ओर दुनिया बढ़ रही थी वैसे—वैसे डा. हेडगेवार की चिंता बढ़ रही थी। वह इस अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे। यही उचित अवसर है स्वतंत्र कराने का। उन्होंने स्वराज्य प्राप्ति के पथ को संघ का लक्ष्य घोषित किया। ब्रिटेन के युद्ध में शामिल होने से भारत में उसकी कमजोर हुई स्थिति को डा. हेडगेवार ईश्वर प्रदत्त स्वर्णिम अवसर मानते थे। साम्राज्यवादी संकट भारत की स्वतंत्रता के लिए सबसे उपयुक्त समय था। डा.हेडगेवार ने कहा था कि आज की जैसे अनुकूल परिस्थिति इसके पहले कभी नहीं आयी थी। जो कुछ ठोस काम करना है इसी समय पूरी शक्ति् लगाकर करो।

1939 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध अवश्यभावी लगने लगा तब अनुशीलन समिति ने क्रान्ति का विचार किया। समिति ने निर्णय लिया कि सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में क्रान्ति होगी। अनुशीलन समिति के सदस्यों ने देशभर के क्रान्तिकारियों से मिलने का सिलसिलाशुरू किया। त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती नागपुर आए और डा. हेडगेवार से मिलने गये। ढ़ाई दशकों के बाद वह डा. हेडगेवार के सामने 1940 में आए तब उनको डा.हेडगेवार पहचान नहीं पाये। जब उन्होंने डा. हेडगेवार से कहा कि क्या उन्हें कालीचरण दा की याद है। यह सुनते ही उन्होंने उनको गले लगा लिया। चक्रवर्ती से डा. हेडगेवार की संघ के स्वयंसेवकों की भूमिका को लेकर लंबी वार्ता हुई।
फारवर्ड ब्लाक का गठन कर जब सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस के बाहर सभी राष्ट्रवादी शक्तियों को संगठित करने में जुटे। इसी उद्देश्य से वह वीर सावरकर से मिलने मुंबई गये और आगे की रणनीति पर विचार किया। उन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य भी महाराष्ट्र में अच्छा था। सारी योजना बनाने के बाद उन्होंने दो प्रसिद्ध राष्ट्रवादी नेता डा. संझागिरि और बालाजी हुद्दार को संघ संस्थापक डा. हेडगेवार से विचार विमर्श करने नागपुर भेजा।

यद्यपि सुभाष चन्द्र बोस डा. हेडगेवार से 1927 से ही परिचित थे 1928 में भी कलकत्ता में दोनों की भेंट हुई थी। सुभाष बाबू संघ से बहुत प्रभावित थे और 21 अक्टूबर 1938 को कांग्रेसी नेता शंकर राव देव को पत्र लिखकर युवकों पर संघ के प्रशिक्षण के प्रभाव की चर्चा की थी। सुभाष चन्द्र बोस के दूत के रूप में बाला ही हुद्दार जुलाई 1939 में डाक्टर हेडगेवार से मिलने नागपुर आये। उस समय वह बीमार थे। डा. हेडगेवार ने स्वास्थ्य सुधरने पर भविष्य में सुभाष चन्द्र बोस से मिलने के प्रस्ताव को स्वीकार किया था। परन्तु उनका स्वास्थ्य गिरता चला गया। इसी बीच जब 19 जून 1940 को सुभाष चन्द्र बोस उनसे भावी क्रान्ति के संबंध में वार्ता करने के लिए नागपुर आए। जब सुभाष बाबू वहां पहुंचे तब उसी समय डाक्टर हेडगेवार जी को हल्की नींद आ गयी। इस झपकी को देखकर सुभाष बाबू ने उन्हें जगाना ठीक नहीं समझा। डा. हेडगेवार के पास कुछ देर बैठने के बाद उन्हें प्रणाम कर वह चले गये। वे मात्र इतना कहकर चले गये अभी इनके आराम में खलल डालना ठीक नहीं होगा। इन्हें सोने दीजिए। मैं जल्दी ही फिर लौटकर किसी दिन मिल लूंगा। परन्तु जब डाक्टर जी को सुभाष बाबू के आने की जानकारी मिली तो वे नाराज हुए —आपने मुझे जगाया क्यों नहीं। इतना बड़ा राष्ट्रभक्त् स्वतंत्रता सेनानी मुझसे मिलने आया और उसे यों ही वापस जाना पड़ा। यह ठीक नहीं हुआ। दौड़कर जाओ और सुभाष बाबू को वापस लाओ। परन्तु तब तक तो वे बहुत दूर निकल चुके थे। एक क्रान्तिकारी को दूसरे क्रान्तिकारी सुभाष का यह अंतिम प्रणाम सिद्ध हुआ। अगले ही दिन डा. हेडगेवार ने अपने पार्थिव शरीर को त्याग दिया। 20 सितम्बर 1943 में नागपुर में संघ की गुप्त बैठक में जापान की सहायता से आजाद हिन्द फौज के भारत की ओर होने वाले प्रयाण के समय संघ की संभावित योजना पर विचार किया गया था।
जब भी भारत की आजादी की बात होती है, तो सबको 15 अगस्त 1947 ही याद आता है लेकिन इससे पहले भी कई मौक आए जब अंग्रेजों से भारत को स्वतंत्र कराने के प्रयास हुए। कुछ प्रयास सफल भी हुए। कुछ हिस्सों को अंग्रेजों से छीना भी गया। ऐसा ही एक मौका आया 1943 में, जब अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पर शासित ब्रिटिशों को जापानियों ने खदेड़ा और फिर इस द्वीप को नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सुपुर्द कर दिया गया। भारत में जब आजादी के लिए संघर्ष चल रहा था ऐसे में अंग्रेजों के लिए समुद्र से घिरी ये जगह क्रांतिकारियों को कैद करने के लिए सबसे मुफीद लगी। 21 अक्टूबर 1943 को सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दी। 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया। नेताजी अपनी फौज के साथ बढ़ते-बढ़ते इंफाल तक आ चुके थे और उसके तुरंत बाद नौसेना एवं वायु सेना में विद्रोह हो गया था.” उस समय यदि संयुक्त संग्राम छेड़ा होता तो देश स्वतंत्र भी होता और भारत का दुःखान्त विभाजन भी नहीं होता। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा दिया गया ‘जय हिन्द’ ‘दिल्ली चलो’ और ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा’ का नारा देशवासियों का नारा बना।

लेखक प्रेरणा शोध संस्थान नोएडा से जुड़े हैं।

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