विचार मित्र

शिक्षा के मंदिरों को राजनीति से दूर रखिए


राजेश माहेश्वरी

पिछले कुछ समय से हमारे शिक्षा के मंदिर अशांत हैं। ताजा मामला दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) का है। जेएनयू के परिसर में बीते रविवार की शाम कुछ नकाबपोशों ने घुसकर जो मारपीट की उसके दृश्य टीवी चैनलों के जरिये पूरे देश ने देखे। मारपीट करने वाले कौन थे ये पुलिस जांच का विषय है। लेकिन घटना के तुरंत बाद ही ये आरोप लगाया जाने लगा कि नकाबपोश अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के थे। चूंकि जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष भी हमले में घायल हो गईं इसलिए वामपंथी लॉबी के प्रचार को और बल मिल गया।

पूरी घटना विवि. परिसरों के भीतर छात्रों के गुटों में होने वाले सामान्य झगड़े तक ही सीमित रहती लेकिन तमाम नेताओं ने आग में घी डालने का काम किया। असल में छात्रों के कंधों को राजनीतिक दल एक बार फिर अपने उद्देश्य साधने के लिए इस्तेमाल करने लगे हैं। जेएनयू देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में माना जाता है। लेकिन बीते काफी समय से इसकी चर्चा नकारात्मक कारणों से होने लगी है। इसकी वजह वहां वामपंथी एकाधिकार के लिए उत्पन्न खतरा ही है।

वास्तव में हाल ही में केंद्र सरकार ने जब शिक्षण और छात्रावास शुल्क में वृद्धि की तो छात्रों ने आन्दोलन शुरू कर दिया। अखिल भारती विद्यार्थी परिषद ने उसका समर्थन किया। छात्रों के आंदोलन के बाद सरकार ने काफी कुछ छूट दे दी और आगे सहानुभूतिपूर्वक विचार का आश्वासन दिया है। इसके बाद अभाविप तो आन्दोलन से अलग हो गयी लेकिन वामपंथी छात्र संगठन अड़े हुए हैं। मौजूदा विवाद के पीछे भी यही आन्दोलन है।

नए सेमेस्टर हेतु छात्रों के पंजीयन की अंतिम तिथि घोषित हो चुकी थी। अधिकतर छात्र पंजीकरण करवाना चाहते हैं। किन्तु वामपंथी छात्रसंघ पंजीयन को बाधित कर परीक्षा को रोके रखना चाहते थे। बीते रविवार को जिस दिन हिंसा हुई उस दिन रजिस्ट्रेशन की आखिरी तिथि थी। एक दिन पहले से छात्रसंघ पदाधिकारी रजिस्ट्रेशन करवाने आये छात्रों को रोकने का काम कर रहे थे जिस कारण छुटपुट तनाव था जो कि जेएनयू के लिए सामान्य बात है। लेकिन जब उन्हें लगा कि बहुमत उनके विरुद्ध जा रहा है तब उन्होंने रजिस्ट्रेशन आफिस की संचार व्यवस्था तहस नहस कर डाली।

इसका विरोध करने वाले छात्रों को भी वामपंथियों ने धमकाया और कुछ के साथ हाथापाई किये जाने की भी खबर है। ऐसे छात्रों में अनेक ऐसे भी थे जिनका किसी राजनीतिक विचारधारा से सम्बन्ध नहीं है और वे केवल पढने के लिए जेएनयू में आये हैं। छात्रसंघ चुनाव में वामपंथी उम्मीदवारों को वोट देने वाले सभी छात्र उनके वैचारिक अनुयायी हैं ये मान लेना गलत है। ऐसे अनेक छात्र रजिस्ट्रेशन रोके जाने का विरोध कर रहे थे।

इस पूरे मामले में तमाम सवाल अभी मिलना बाकी है। मारपीट और हिसंा के दौरान और बाद में दिल्ली पुलिस की क्या भूमिका थी? यूनिवर्सिटी के सुरक्षाकर्मी मूकदर्शक क्यों बने रहे? वे नकाबपोश कौन थे? यूनिवर्सिटी के ही छात्र थे या बाहरी भीड़ भी शामिल हुई थी? उनके हाथों में हथियार कहां से आए, किसने मुहैया कराए और यूनिवर्सिटी कैंपस के भीतर हास्टलों तक कैसे पहुंच गए? आपस में मारपीट का मुद्दा क्या था? सिर्फ इंटरनेट के तार काटने और रजिस्ट्रेशन को बाधित करने पर ही इतनी हिंसा फैल सकती है? ये बेहद संवेदनशील सवाल हैं। सवाल है कि किन ताकतों, किन हालात ने छात्रों और भीड़ को नकाबपोश बनकर जानलेवा हिंसा को बाध्य किया? शायद पुलिस जांच में भी इन तमाम सवालों का जवाब मिल पाएगा! वही जो राजनेता जेएनयू के छात्रों के साथ खड़े दिखाई दिये उनकी भूमिका भी सवालों के घेरे में है।

जेएनयू भारत की एकमात्र यूनिवर्सिटी है, जो दुनिया के पहले 100 विश्वविद्यालयों की सूची में दर्ज है। यह हमारा गौरव है, लेकिन बीते कई वर्षों से जेएनयू में विवाद थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। किसी न किसी रूप में जेएनयू चर्चा में बनी हुई है। बेशक जेएनयू में बीते कई सालों से वामपंथी छात्र संगठन-आइसा-का वर्चस्व रहा है, लेकिन अब संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के रूप में दक्षिणपंथी सोच ने उसे चुनौती देना शुरू किया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक चुनौती और प्रतिद्वंद्विता स्वीकार्य है, लेकिन दुर्भाग्य है कि जेएनयू में यह ‘दुश्मनी’ में परिणत हो गई है।

मारपीट में घायल दोनों पक्ष हुए हैं, अकेली छात्र संघ की अध्यक्ष आइसी घोष की बेचारगी मीडिया दिखा रहा है। असल में सारी कोशिश इस मामले को वाम बनाम एबीवीपी बनाने की है। लेकिन यह अफसोसनाक है। असल में यह घटना तो अतीत हो जाएगी, लेकिन गद्दारों, नक्सलियों, माओवाद बनाम राष्ट्रवाद के नारे गूंजते रहेंगे। इन पर यूनिवर्सिटी को बलिदान नहीं किया जा सकता। यूनिवर्सिटी से नफरत भी नहीं की जा सकती।

उन छात्रों पर जरा सोचिए, जो कुलपति का कॉलर पकड़ लेते हैं, उनकी कार पर हिंसक प्रहार करते हैं और डीन को कई घंटों तक बंधक बनाकर कैद में रखते हैं। कमोबेश यह हमारे शिक्षण संस्थानों की संस्कृति नहीं है। कमोबेश वामपंथी भी ऐसी सोच नहीं रखते होंगे। यदि छात्र आंदोलन हैदराबाद से गुवाहाटी तक और मुंबई, पुणे, बंगलुरू, पटना तथा चंडीगढ़ तक बेवजह ही फैल गए हैं, तो सोचना होगा कि आखिर उससे नुकसान किसका होगा?

गौरतलब ये है कि कहने को तो कांग्रेस की छात्र इकाई एएसयूआई भी जेएनयू में सक्रिय है लेकिन उसका होना न होना एक जैसा है। अभाविप का जनाधार बढने के पूर्व जेएनयू में विभिन्न वामपंथी गुट ही आपस में टकराते रहते थे। कुछ साल पहले जब वहां छात्रसंघ चुनाव में अभाविप का पदाधिकारी जीत गया तब वामपंथी गुटों को अपने वर्चस्व के लिए खतरा महसूस हुआ और उसके बाद के चुनावों में वे एकजुट होकर मैदान में उतरे।

हिंसा करने वाले और उसे संरक्षण देने वाले किसी भी व्यक्ति या विचारधारा का समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन जेएनयू या किसी अन्य शिक्षा संस्थान में एक ही विचारधारा का पोषण किया जाना कहां तक उचित है? जेएनयू में वैचारिक स्वतंत्रता और जागरूकता अच्छी बात है लेकिन उसके नाम पर केवल साम्यवादी विचारधारा थोपने की इजाजत तो नहीं दी जा सकती। किसी विवि. में कश्मीर की आजादी और देश के टुकड़े-टुकड़े होने जैसे नारे लगाने वालों पर शिकंजा कसा जाना किस तरह से अनुचित है, ये बड़ा सवाल है।

ये मानना भी गलत है सीएए, एनपीआर या एनआरसी के विरोध में जेएनयू के छात्र आंदोलन के रास्ते पर हैं। असल में जेएनयू का ताजा बवाल दरअसल किसी तात्कालिक घटना का नतीजा न होकर वामपंथी प्रभुत्व को मिल रही कड़ी चुनौती का परिणाम है। वामपंथ और समूचे विपक्ष की निराश, हताशा और कुंठा रूपी बंदूक छात्रों के कंधे पर रखकर चलाई जा रही है। निशाने पर मोदी सरकार है। जेएनयू में हुई मारपीट के विरोध में आसमान सिर पर उठाने वालों को इस बात का भी जवाब देना चाहिए कि विवि के सैकड़ों छात्रों को परीक्षा देने रोकने का षडयंत्र रचने वाले क्या असामाजिक तत्व नहीं हैं और उन्हें संरक्षण देना किस तरह की सियासत है? जामिया मिलिया और अलीगढ़ मुस्लिम विवि के छात्रों का बिना देर किया जेएनयू जा पहुंचना महज संयोग नहीं हो सकता।

बेशक छात्रों की वैचारिकता भी मजबूत होनी चाहिए। वे वामपंथी हो सकते हैं, तो दक्षिणपंथी सोच से भी संबद्ध हो सकते हैं, लेकिन विचारधारा हिंसात्मक नहीं होनी चाहिए। यह पूरे देश का सवाल है। जो कुछ भी हुआ वह दर्दनाक और शर्मनाक कहा जाएगा। शिक्षा के मंदिरों की गरिमा बरकरार रखना शिक्षकों, छात्रों और सरकार सबका काम है। शिक्षा के मंदिरों को राजनीति से दूर रखना होगा तभी देश को बेहतर नागरिक मिल पाएंगे।

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