विचार मित्र

आंदोलन कुचलने के ये नए “लांछन शस्त्र “

 
तनवीर जाफ़री
     स्वतंत्र भारत अब तक के सबसे दीर्घकालीन व राष्ट्र व्यापी आंदोलन का सामना कर रहा है। 1975 के दौरान भी एक बार देश ने ऐसे ही जान आंदोलन का रूप उस समय देखा था जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की थी। परन्तु विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रीय नागरिकता क़ानून व राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर संबंधी केंद्र सरकार की नीतियों के विरुद्ध हो रहा वर्तमान आंदोलन 1975 के आंदोलन से कहीं व्यापक है। इस आंदोलन की विशेषता यह भी है कि इसमें महिलाओं व छात्रों द्वारा ख़ास तौर पर बढ़ चढ़ कर अपनी हिस्सेदारी निभाई जा रही है।
इस आंदोलन की दूसरी विशेषता यह भी है कि भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के अनेक देशों में भी एन आर सी व सी ए ए के विरुद्ध बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। इस आंदोलन में अंतर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर के अनेक पुरस्कार विजेता,बड़े उद्योगपति,फ़िल्म जगत की मशहूर हस्तियां,बुद्धिजीवी,अप्रवासी भारतीयों के अनेक संगठन शामिल हैं। परन्तु इन सब के बावजूद इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके नेतृत्व की बागडोर किसी एक नेता या राजनैतिक दल के हाथों में नहीं है। शायद देश का यह पहला आंदोलन है जिसमें राष्ट्रव्यापी स्तर पर देश की जनता स्वयं सड़कों पर उतरी है अपना नेतृत्व भी ख़ुद ही कर रही है।इस आंदोलन से संबंधित एक और घटना यह भी घटित हो रही है कि भारतीय इतिहास में पहली बार सरकार को अपने ही बनाए गए किसी विवादित क़ानून के पक्ष में अपने समर्थकों को भी सड़कों पर उतारना पड़ रहा है।
सरकार को भी ऐसा इसीलिए करना पड़ रहा है ताकि एन आर सी व सी ए ए के भारी विरोध के बीच देश व दुनिया के लोग यह भी समझ सकें कि एन आर सी व सी ए एको देश के लोगों का समर्थन भी हासिल है।  एन आर सी व सी ए ए के समर्थन में सड़कों पर उतरने वाले लोगों की मंशा क्या है इसका अंदाज़ा पिछले दिनों झारखण्ड के लोहरदगा में घटी हिंसक घटनाओं से लगाया जा सकता है। प्राप्त सूचनाओं के मुताबिक़ लोहरदगा में  एन आर सी व सी ए ए के समर्थन में सड़कों पर उतरने वाले हिंदूवादी संगठन के लोगों द्वारा लाउडस्पीकर पर साम्प्रदायिकता पूर्ण भड़काऊ गीत बजाए जा रहे थे। इसके बाद हुई पथराव की घटना ने इस जुलूस के मक़सद को उस समय बेनक़ाब कर दिया जब पूरा शहर आगज़नी व लूटपाट की घटनाओं के बाद कर्फ़्यू की चपेट में आ गया।
  बहरहाल,इस संकट कालीन दौर में भारतीय लोकतंत्र का ‘लोक’ एक ऐसे दोराहे पर खड़ा हो गया है जहां उसे लोकतंत्र के समक्ष नित्य आ रही नई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। ऐसी ही एक चुनौती है विपक्ष या अपने विरोधियों पर इस्तेमाल किया जाने वाला ‘लांछन शस्त्र’। बड़े अफ़सोस की बात यह है कि इसकी शुरुआत और किसी ने नहीं बल्कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस समय की थी जब उन्होंने एन आर सी व सी ए ए  का विरोध करने वालों की पहचान उनके कपड़ों से किये जाने की बात कही थी। 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जो लोग हिंसा कर रहे हैं उन्हें उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है.” मुस्लिम समुदाय को लक्षित कर उन्होंने यह बयान तो ज़रूर दिया मगर दूसरी ओर पश्चिमी बंगाल में जो टोपी धारी व लुंगी लपेटे हुए लोग ट्रेनों पर पथराव करते पकड़े गए वे आर एस एस के कार्यकर्ता निकले जो वेश बदल कर हिंसा फैला रहे थे। पहले भी इस प्रकार की वेश बदल कर हिंसा फैलाने की कई घटनाएं प्रकाश में आ चुकी हैं। ऐसा ही एक “लांछन शस्त्र “इन्हीं प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध यह भी चलाया गया कि यह सभी प्रदर्शनकारी बिरयानी खाने की लालच में शाहीन बाग़ में इकठ्ठा हो रहे हैं। कभी इस पूरे आंदोलन को एक ही धर्म से जोड़ने की पूरी कोशिश की गयी जोकि पूरी तरह नाकाम रही। लिहाज़ा अब “लांछन शस्त्र “का प्रयोग किया जा रहा है।
 
जामिया विश्वविद्यालय से शुरू हुआ यह आंदोलन जे एन यू, डी यू व ए एम यू होता हुआ अब राष्ट्रव्यापी छात्र आंदोलन बन चुका है जिसे आम शांतप्रिय लोगों का पूरा समर्थन हासिल है। याद कीजिये कन्हैया कुमार की गिरफ़्तारी के समय भी  जे एन यू   बदनाम करने की किस निचले स्तर तक कोशिश की गयी थी। ‘लांछन विशेषज्ञों’ की तो कोशिश थी की इस महान ऐतिहासिक शिक्षण संसथान के हर छात्र के चरित्र को संदिग्ध बना दिया जाए।
तभी तो ‘राष्ट्रवादी नेता गण’ कैम्पस में निरोध,चबाई हुई हड्डियां,शराब की बोतलें,सिगरेट-बीड़ी  के टोटे नशीले इंजेक्शन आदि गिनते फिर रहे थे ? यह काम भी ऐसे लोग कर रहे थे जिन्होंने शायद कभी किसी कैम्पस की शक्ल भी न देखी हो। उसी प्रकार का “लांछन शस्त्र अब  एन आर सी व सी ए ए विरोधी प्रदर्शनकारियों पर इस्तेमाल हो रहा है। कभी इसे मुसलमानों द्वारा किया जाने वाला विरोध प्रदर्शन बताने की कोशिश की गयी तो कभी इसे कांग्रेस,सपा व बसपा तथा ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ के शह पर किया जाने वाला प्रदर्शन बताया गया। इसी सन्दर्भ में कांग्रेस पार्टी को कभी मुसलमानों की पार्टी तो कभी पाकिस्तान का पक्ष लेने वाली पार्टी बताया जा रहा है।
सरकार की ख़ुशामद में लगे कुछ ऐसे लोग जो स्वयं भ्रष्टाचार के कई मामलों में फंसे हुए हैं केवल अपनी गर्दन बचाने के लिए वे भी सरकार की भाषा बोल रहे हैं। ऐसे ही एक व्यक्ति ने लखनऊ में घंटाघर पर होने वाले एन आर सी व सी ए ए विरोधी प्रदर्शन को पहले ‘सुन्नी मुसलमानों’ द्वारा किया जाने वाला प्रदर्शन बताया तो कभी यह कहकर बदनाम किया की इस प्रदर्शन में शामिल औरतें पेशेवर हैं और पैसे लेकर धरना प्रदर्शन कर रही हैं।
 
    इस सन्दर्भ में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह भी है कि इसके पक्ष व विरोध ने ज़िद व हठधर्मी का रूप धारण कर लिया है। गृह मंत्री अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बावजूद बार बार कह रहे हैं कि वे एक इंच भी पीछे हटने वाले नहीं हैं। जबकि इस भीषण सर्दी व बारिश में पूरे देश में लाखों लोगों का सड़कों पर बैठना,गोद में बच्चों को लेकर मांओं की बड़ी संख्या में हिस्सेदारी भी यही बताती है की शायद एन आर सी व सी ए ए विरोधी भी एक इंच पीछे हटने को तैयार नहीं। पंजाब व केरल के बाद राजस्थान विधानसभा में भी एन आर सी व सी ए ए विरोधी प्रस्ताव पारित हो चुका है।
लोक व तंत्र के मध्य ऐसी तनातनी भारतीय लोकतंत्र के हित में क़तई नहीं। देश की किसी भी सरकार के लिए देश की एकता,अखंडता,लोकहित व लोक कल्याण सर्वोपरि होना चाहिए। हिन्दू या मुसलमान शब्दों के इस्तेमाल के बजाए हर देशवासी को केवल भारतीय समझा जाना चाहिए। यदि किसी गुप्त एजेंडे को देश पर थोपने की कोशिश की जा रही है तो यह कोशिश साम्प्रदायिकतावादी शक्तियों के लिए तो लाभकारी हो सकती है परन्तु देश,देश की एकता व अखंडता को इन नीतियों से बड़ा नुक़्सान हो सकता है। पूरा विश्व इस समय भारतीय राजनीति में प्रयोग हो रहे इस नए “लांछन शस्त्र ” को ग़ौर से देख रहा है जिसे एन आर सी व सी ए ए का विरोध करने वालों पर इस्तेमाल किया जा रहा है।
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