विचार मित्र

देश की बांटने की बात करते नौजवान !

राजेश माहेश्वरी

सीएए के विरोध में चल रहे आंदोलनों में महिलाओं के साथ युवाओं की भी बड़ी भागीदारी है। विरोध की आग को हवा देने और ईंधन देने वाले युवाओं को अपने राजनीतिक मकसद साधने के लिये इस्तेमाल कर रहे हैं। विडम्बना यह है कि जोश से भरे युवा चंद संगठनों और राजनीतिक दलों की मंशा और इरादों को समझे बिना ही आंदोलन और विरोध का झण्डा बुलंद किये हुए हैं। धीरे-धीरे आंदोलन के विरोध में भी एक धड़ा खड़ा होने लगा है।

इसी का नतीजा है कि दिल्ली के जामिया में प्रदर्शनकारियों पर गोपाल शर्मा नामक 12वीं के छात्र ने गोली चला दी। गोली लगने से एक आंदोलनकारी युवा घायल हुआ। देखा जाए तो ये एक गंभीर मामला है। गोली चलने की घटना के पीछे का सच तो जांच का विषय है, लेकिन ऐसे हालात किसी भी स्थिति में जायज नहीं ठहराये जा सकते हैं।

पिछले दिनों शरजील इमाम का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वो देश को बांटने की बातें कर रहा था। देश को तोड़ने और चक्का जाम का आह्वान करने वाला शरजील इमाम अब दिल्ली पुलिस की गिरफ्त में है। इस गिरफ्तारी के साथ यह सवाल बड़ा सहज है कि आखिर ऐसा ‘देशद्रोह’ कब तक जारी रहेगा? सवाल यह है कि देश के युवा बिना सोचे समझे किस वजह से ऐसे आंदोलनों का हिस्सा बन रहे हैं जो पूरी तरह से राजनीति में डूबे हैं? क्या युवाओं का कोई स्वार्थ इस निहित है? क्या युवा सोच समझ कर मुद्दो की लड़ाई लड़ने मैदान में उतरा है? सवाल यह भी है कि क्या राजनीतिक दल युवाओं का इस्तेमाल अपनी राजनीति चलाने के लिये कर रहे हैं? आखिरकार क्या वजह है कि पढ़े लिखे समझदार युवा भडकाऊ भाषणबाजी और गोली चलाने पर अमादा है?

शरजील इमाम ने आईआईटी मुंबई से कंप्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की है। वह डेनमार्क के कोपेनहेगन में अच्छे पैकेज पर नौकरी भी करता था। वह सब कुछ छोड़ कर भारत को बांटने की बात क्यों करने लगा? क्या उसके पीछे कुछ और ताकतें काम कर रही थीं या वे ताकतें उसे यह विमर्श शुरू करने को बाध्य कर रही थीं? शरजील पढ़ाई में मेधावी होगा, भविष्य के सपनों की रूपरेखा भी बनाता होगा, आखिर यह पौध, यह देश-विरोधी नस्ल, यह देश को ही तोड़ कर बर्बाद करने की सांप्रदायिक बात कहने वाली जमात कहां से आई है और क्या चाहती है? इन सवालों का विश्लेषण किया जाना चाहिए। शायद जांच के बाद कुछ सच सामने आएं! कन्हैया, उमर खालिद और शेहला आदि पुराने चेहरे हो चुके हैं। उन्होंने जेएनयू से पढ़ाई की है, लेकिन सांप्रदायिक विभाजन के रास्ते पर हैं। कन्हैया भी लगातार अलगाव की बातें करते दिखाई देते हैं। विचारों से असहमति होना एक बात है लेकिन देश के टुकड़े करने की मंशा पालना और समाज में जहर घोलना बड़ी चिंता का कारण है।

बीते दिनों अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष फैजुल हसन का नाम और बयान भी सामने आया था। फैजुल भी देश को तोड़ने की धमकी-सी दी थी। इसी जमात की नई पोस्टर गर्ल आफरीन फातिमा है, जो फांसी पर लटकाए गए आतंकी अफजल गुरु की आज भी पैरोकारी करते हुए सर्वोच्च न्यायालय पर भरोसा नहीं कर रही है। बुनियादी और कानूनी आधार पर इन सभी को ‘देशद्रोह’ की श्रेणी में रखा गया है, लेकिन किसी को भी देशद्रोही के तौर पर सजा नहीं दी जा सकी है। अब शरजील इमाम की बारी है। शरजील ‘देशद्रोही’ है, तो सरकार और पुलिस कानूनन साबित करे, लेकिन किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने की जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए।

प्रचारित किया गया है कि वह ‘शाहीन बाग’ के ‘मास्टर माइंड’ लोगों में एक है, जबकि सच यह है कि प्रदर्शनकारियों ने उसका भाषण सुनने से इंकार कर दिया था, क्योंकि उसके शब्द उनके माकूल नहीं थे। शरजील ने साफ तौर पर यह कहा कि ‘शाहीन बाग’ कांग्रेस के लिए खुला मंच है, लिहाजा लगता है कि इस आंदोलन के पीछे वही राजनीतिक ताकत है! शरजील का असम को शेष भारत से काटने और मुसलमानों द्वारा 500 शहरों में ‘चक्का जाम’ करने वाले बयान बेशक आपत्तिजनक और घोर सांप्रदायिक हैं, लेकिन यह भी ध्यान रहे कि हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान दिल्ली का पानी रोका गया था। वह भी ‘चक्का जाम’ सरीखा ही था। बाद में अदालत के हस्तक्षेप से पानी की सप्लाई सामान्य की गई थी। उसके संदर्भ में ‘देशद्रोह’ का कोई केस नहीं बनाया गया। चक्का जाम की अपील पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू-कश्मीर में भी की जाती रही है, लेकिन उसे ‘देशद्रोह’ कभी नहीं माना गया। अब शरजील के चक्का जाम को नए सिरे से परिभाषित करना होगा, ताकि देशद्रोह की परिधि में आ सके।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नागरिकता संशोधन कानून पर स्थगन नहीं दिए जाने के बाद मुस्लिम समाज को उन राजनीतिक पार्टियों के षडयंत्र को समझना चाहिए जो उन्हें अग्रिम मोर्चे पर तैनात कर खुद दायें-बाएं हो गईं। बंगाल में ममता बैनर्जी सबसे ज्यादा इस कानून के विरोध में सक्रिय हैं लेकिन कांग्रेस और वामपंथी वहां भी आपनी अलग खिचड़ी पका रहे हैं। इसी तरह शाहीन बाग में बैठी मुस्लिम महिलाओं को धरना स्थल पर जाकर संबल देने की हिम्मत किसी भी विपक्षी पार्टी द्वारा इसलिए नहीं दिखाई जा रही क्योंकि दिल्ली विधानसभा के चुनाव में कहीं हिन्दू मतदाता उनसे छिटक न जाएं। मुस्लिम समाज को ये बात कम से कम अब तो समझ लेनी चाहिए कि वह जाने अनजाने एक बार फिर राजनीति के कुचक्र में फंसकर रह गया है।

आजादी के समय परिवर्तन, क्रांति और बदलाव की राजनीति ने युवाओं से जो उम्मीदें बांधी थीं उसका अंश आज भी कहीं ना कहीं हमारी राजनीतिक समझदारी में कायम है लेकिन ऐसा होने के बावजूद राजनीति में युवाओं की सक्रिय भागीदारी क्यों नहीं हो पा रही है, क्यों नहीं युवाओं से जुड़े सवाल चुनाव का एजेंडा बनते? ये अहम सवाल हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि युवा नेतृत्व से राजनीति की दशा और दिशा बदल सकती है। विषम परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता युवा वर्ग की पहचान कराती है।

युवा वर्ग में निर्णय लेने की क्षमता है। युवा वर्ग सही को सही एवं गलत को गलत कहने की क्षमता रखता है। लेकिन राजनीतिक दल जिस चालाकी से युवा शक्ति का प्रयोग अपने राजनीतिक हित साधने के लिये कर रहे हैं, वो चिंता का विषय है। सीएए के विरोध में जिस तरह छात्र और युवा बिना सोचे विचारे राजनीतिक दलों व तथाकथित संगठनों की कठपुतली बनकर नाच रहे हैं वो सोचने का विषय है।

युवाओं को देश को जोड़ने की बात करनी चाहिए। उन्हें देश निर्माण की और विकास की बात करनी चाहिए। उन्हें देश के सुनहरे भविष्य की कल्पना करनी चाहिए। तोड़ना, बांटना और चक्का जाम करना युवाओं की सोच में ही शामिल नहीं होना चाहिए। लेकिन अफसोस आज हमारे तमाम युवा साथी अलगाव और देश के बांटने वाली सोच के हिमायती दिखाई दे रहे हैं। जहां तक बात सीएए की है तो मामला सुप्रीम अदालत में है ऐसे में बेहतर होगा सीएए के विरोधी अब संयम से काम लेते हुए न्यायालयीन प्रक्रिया का इन्तजार करें क्योंकि जब मामला देश की सर्वोच्च अदालत के समक्ष लंबित हो तब सड़क पर संघर्ष करने का कोई औचित्य नहीं बच रहता। युवाओं का जोश के साथ होश का प्रयोग करना चाहिए। उन्हें चंद स्वार्थी और सत्ता के भूखे लोगों की मंशा को समझना चाहिए, इसी में सब का भला है और यही लोकतंत्र का रिवाज भी है।

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