विचार मित्र

रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक सार्थक प्रयास

डिफेंस एक्सपो

आशीष वशिष्ठ
एशिया के सबसे बड़े डिफेंस एक्सपो का लखनऊ में आयोजन मोदी सरकार की रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता की नीति की दिशा में एक सार्थक प्रयास है। रक्षा उपकरणों के कारोबारियों के इस चार दिवसीय समागम में 70 से ज्यादा देशों की 1028 कंपनियां अपने उत्पादों और तकनीकों का प्रदर्शन कर रही हैैं। इनमें 856 भारतीय और 172 विदेशी कंपनियां हैं। इस चार दिवसीय आयोजन में 39 देशों के रक्षा मंत्री भी शिरकत कर रहे हैं। इसी से आयोजन का महत्व जाहिर हो जाता है। सरकार का यह बयान भरोसा जगाता है कि पिछले दो सालों में 17000 करोड़ के रक्षा उत्पादों का निर्यात हुआ है और अगले पांच वर्षों में इसे 35 हजार करोड़ करने का लक्ष्य है। इससे पहले 2018 में चेन्नई में 10वें डिफेंस एक्सपो का आयोजन हुआ था। इसमें करीब देश-विदेश की 700 कंपनियों ने हिस्सा लिया था। डिफेंस एक्सपो का आयोजन हर दो साल में होता है।
यह विडंबना ही रही है कि आजादी से पहले रक्षा उत्पादन में अग्रणी रहा भारत सत्ताधीशों की काहिली से दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा खरीददार बन गया। भारत ने अपनी इस क्षमता का  उपयोग नहीं किया। न जाने क्यों देश की रणनीति और नीति हथियारों की खरीद पर केंद्रित होकर रह गई। यह अच्छी बात है कि राजग सरकार ने रक्षा अनुसंधान व विकास की उच्च क्षमता तथा रक्षा उत्पादों के देश में उत्पादन को अपनी प्राथमिकता बनाया है। इसके लिये देश में मूलभूत ढांचा तैयार करना भी जरूरी है ताकि स्वदेशी निर्माण से बहुमूल्य विदेशी मुद्रा बच सके और रोजगार के अवसर भी बढ़ सकें। निःसंदेह इससे देश में निवेश और नवोन्मेष का वातावरण बन सकेगा। लेकिन यह सिर्फ रक्षा निर्माण में लगी सरकारी संस्थाओं के भरोसे संभव नहीं है, इसमें निजी क्षेत्र की बड़ी भूमिका तलाशी जानी चाहिए। इतना ही नहीं, रक्षा साजो-सामान  उत्पादकों और उपयोगकर्ताओं के बीच भी सामंजस्य जरूरी है। तभी राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। बदलते वक्त के साथ रक्षा तकनीकों में भारी बदलाव आया है। आधुनिक युद्ध परंपरागत हथियारों के बूते नहीं लड़े जा सकते। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की उसमें निर्णायक भूमिका होने वाली है। यह अच्छी बात है कि सरकार ने इस दिशा में पहल की है और बजट में इस लक्ष्य हेतु संसाधन उपलब्ध कराये हैं।
स्वदेश में रक्षा उत्पादन अथवा रक्षा क्षेत्र से जुड़ा औद्योगिक आधार किसी भी देश के दीर्घकालिक सामरिक नियोजन का अभिन्न अवयव है। आयात पर काफी अधिक निर्भरता न केवल सामरिक नीति एवं इस क्षेत्र की सुरक्षा में भारत द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के नजरिए से अत्यंत नुकसानदेह है, बल्कि विकास एवं रोजगार सृजन की संभावनाओं के मद्देनजर आर्थिक दृष्टि से भी चिंता का विषय है। वैसे तो शक्ति से जुड़े तमाम स्वरूपों को हासिल करने पर ही कोई देश ‘सुपर पावर’ के रूप में उभर कर सामने आता है, लेकिन सही अर्थों में सैन्य शक्ति ही महान अथवा सुपर पावर के रूप में किसी भी राष्ट्र के उत्थान की कुंजी है।
इतिहास के पन्ने पलटने पर हम पाते हैं कि भारतीय रक्षा उद्योग 200 वर्षों से भी अधिक समय का गौरवमयी इतिहास अपने-आप में समेटे हुए है। ब्रिटिश काल के दौरान बंदूकें और गोला-बारूद तैयार करने के लिए आयुध कारखानों की स्थापना की गई थी। प्रथम आयुध कारखाने की स्थापना वर्ष 1801 में काशीपुर में की गई थी। देश की आजादी से पहले कुल मिलाकर 18 कारखानों की स्थापना की गई थी। वर्तमान में भारत के रक्षा क्षेत्र से जुड़े औद्योगिक आधार में भौगोलिक दृष्टि से देश भर में फैले 41 आयुध कारखाने, 9 रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (डीपीएसयू), 200 से अधिक निजी क्षेत्र लाइसेंस धारक कंपनियां और बड़े निर्माताओं एवं रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (डीपीएसयू) की जरूरतें पूरी करने वाले कुछ हजार छोटे, मझोले एवं सूक्ष्म उद्यम शामिल हैं। यही नहीं, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की 50 से अधिक रक्षा प्रयोगशालाएं भी देश में रक्षा विनिर्माण की पूरी व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि 2014 में एनडीए की सरकार बनने के बाद हमने मेक इन इंडिया पर बल दयिा, जिससे भारत अब हथियार निर्यातक बनकर उभर रहा है। मोदी सरकार ने देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश को रक्षा उत्पादों का हब बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इससे पहले भी रूस की मदद से हथियार उत्पादन इकाई का विस्तार किया गया था। लखनऊ में ग्यारहवें डिफेंस एक्सपो का आयोजन इसी कड़ी का विस्तार है जो कि रक्षा निर्माण गलियारा योजना का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दावा कर रहे हैं कि इस आयोजन के बाद उत्तर प्रदेश में ं पचास हजार करोड़ का निवेश होगा और तीन लाख लोगों को रोजगार मिलेगा। हालांकि यह आंकड़ा कब हकीकत में बदलेगा, कहना कठिन है मगर इसे एक अच्छी शुरुआत तो कहा ही जा सकता है।
वर्ष 2000 के आसपास यह आलम था कि हमारे ज्यादातर प्रमुख रक्षा उपकरणों और हथियार प्रणालियों का या तो आयात किया जाता था या लाइसेंस प्राप्त उत्पादन के तहत आयुध कारखानों अथवा रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों द्वारा उन्हें भारत में ही तैयार किया जाता था। देश में एकमात्र रक्षा अनुसंधान एवं विकास एजेंसी होने के नाते डीआरडीओ ने प्रौद्योगिकी विकास में सक्रिय रूप से योगदान दिया और स्वदेशीकरण के प्रयासों को काफी हद तक पूरक के तौर पर आगे बढ़ाया। अनुसंधान एवं विकास तथा विनिर्माण क्षेत्र में डीआरडीओ और डीपीएसयू के प्रयासों के परिणामस्वरूप देश अब एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है, जहां हमने लगभग सभी प्रकार के रक्षा उपकरणों और प्रणालियों के निर्माण की क्षमताएं भली-भांति विकसित कर ली हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में असीमित संभावनाएं हैं। यहां टैलेंट है और टेक्नोलॉजी भी है। यहां इनोवेशन है और इन्फ्रास्ट्रक्चर भी है। प्रधानमंत्री ने डिफेंस एक्सपों में अपने संबोधन में हथियारों के मामलों में आयात पर निर्भरता घटाने पर जोर दिया।
एक मोटे विश्लेषण के अनुसार, हमारी कुल रक्षा खरीद में से 40 प्रतिशत खरीदारी तो स्वदेशी उत्पादन की ही की जाती है। कुछ प्रमुख प्लेटफॉर्मों पर स्वदेशीकरण का एक बड़ा हिस्सा बाकायदा हासिल किया जा चुका है। उदाहरण के लिए, टी-90 टैंक में 74 प्रतिशत स्वदेशीकरण, पैदल सेना से जुड़े वाहन में 97 प्रतिशत स्वदेशीकरण, सुखोई 30 लड़ाकू विमान में 58 प्रतिशत स्वदेशीकरण और कॉनकुर्स मिसाइल में 90 प्रतिशत स्वदेशीकरण हासिल हो चुका है। लाइसेंस प्राप्त उत्पादन के तहत निर्मित किए जा रहे प्लेटफॉर्मों में हासिल व्यापक स्वदेशीकरण के अलावा हमने अपने स्वयं के अनुसंधान एवं विकास के जरिए कुछ प्रमुख प्रणालियों को स्वदेश में ही विकसित करने में भी सफलता पा ली है। इनमें आकाश मिसाइल प्रणाली, उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर, हल्के लड़ाकू विमान, पिनाका रॉकेट और विभिन्न प्रकार के रडार जैसे केंद्रीय अधिग्रहण रडार, हथियारों को ढूंढ निकालने में सक्षम रडार, युद्ध क्षेत्र की निगरानी करने वाले रडार इत्यादि शामिल हैं। इन प्रणालियों में भी 50 से 60 प्रतिशत से अधिक स्वदेशीकरण हासिल किया जा चुका है।
‘डिजिटल ट्रांसफॉरमेशन  ऑफ डिफेंस’ थीम पर  आधारित इस आयोजन में रक्षा कंपनियों ने जैसा उत्साह दिखाया है, वह उम्मीद जगाता है। मोदी सरकार ने जिस तरह भारतीय आयुध निर्माता कंपनियों के लिये इंडस्ट्रियल लाइसेंसिंग प्रणाली को उदार बनाया है, उससे देश में रक्षा उत्पादन में निजी कंपनियों की बड़ी भूमिका आने वाले दिनों में हो सकती है। सरकार ने रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों में ढील दी है। इससे अब रक्षा क्षेत्र में सौ फीसदी विदेशी निवेश का रास्ता साफ हुआ है। जिसके चलते पिछले पांच सालों में रक्षा  और एयरोस्पेस सेक्टर में तकरीबन सत्रह हजार करोड़ रुपये का विदेशी निवेश संभव हो पाया है।
डिफेंस एक्सपो में स्वदेशी-विदेशी रक्षा उत्पादों व सुरक्षा प्रणालियों का प्रदर्शन निःसंदेह स्वदेशी उत्पादकों को प्रेरित करेगा। इस आयोजन में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ के अलावा अस्सी से अधिक स्वदेशी कंपनियों के उत्पादों का प्रदर्शन हमारी प्रगति की गाथा को दर्शाता है जो मौजूदा दौर में रक्षा उत्पादों में आत्मनिर्भरता के साथ ही आतंकवाद व साइबर अपराधों से निपटने की तैयारियों में मददगार साबित होगा। निःसंदेह मोदी सरकार की रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में प्राथमिकता समय की नब्ज पर हाथ रखने जैसा है। जो आतंकवाद से जूझने और सीमाओं की सुरक्षा के लिये बेहद जरूरी भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि दुनिया में रक्षा उत्पादकों का सबसे बड़ा खरीददार देश आने वाले दशकों में बड़े निर्यातक देशों में शुमार हो जाए। सुधारों की प्रक्रिया के साथ-साथ बिजनेस में आसानी या सुगमता सुनिश्चित करना भी एक सतत प्रक्रिया है और इसके साथ ही सरकार एवं उद्योग जगत को आपस में मिलकर एक ऐसा परितंत्र या सुव्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी, जो इस क्षेत्र के विकास एवं स्थिरता के लिए आवश्यक है और यह राष्ट्रीय सुरक्षा के हमारे दीर्घकालिक हित में होगा।

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