विचार मित्र

समय की मांग है न्यायिक प्रक्रिया में संस्थागत मध्यस्थता

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
देश की सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायाधीश शरद अरविन्द बोबड़े ने अदालतों में मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए संस्थागत मध्यस्थता की जरुरत जताई है। देश की राजधानी दिल्ली में फिक्की की और से आयोजित एक समारोह में अदालतों में मुकदमों के अंबार पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने यह सुझाव दिया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि मुकदमों के बोझ तले दबी न्यायिक व्यवस्था को लेकर न्यायालय, सरकार, गैरसरकारी संगठन और आमजन सभी गंभीर है। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने अनावश्यक पीएलआर दाखिल करने की प्रवृति पर सख्त संदेश देकर आए दिन लगने वाली पीएलआर पर कुछ हद तक अंकुश लगाने में सफल रहे हैं। यह सही है कुछ पीएलआर अपने आपमें मायने रखती हो पर इस पीएलआर दाखिल करने की सुविधा का दुरुपयोग भी जगजाहिर है और इसी कारण से सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश महोदय द्वारा तल्ख टिप्पणी करनी पड़ी थी और उसका असर भी देखने को मिल रहा है। लोक अदालतों के माध्यम से भी आपसी समझाइश से मुकदमों को कम करने के प्रयास जारी है। लोकअदालतों का आयोजन अब तो नियमित होने लगा है। इस दिशा में लोकअदालत के आयोजन से पूर्व राजस्थान की सरकार द्वारा मोटर व्हीकल एक्ट से जुड़े करीब दस हजार मुकदमों को लोकअदालत के माध्यम से समाप्त करने का निर्णाय भी इस मायने में महत्वपूर्ण हो जाता है कि इससे लंबे समय तक चलने वाले इस तरह के मुकदमें कम हो जाएंगे। हांलाकि मोटर व्हीकल एक्ट के तहत विचाराधीन मुकदमों को सरकार द्वारा वापिस लेने का संदेश गलत नहीं जाना चाहिए व दोषियों को भी यह समझ लेना चाहिए कि उन्हें एक सभ्य नागरिक होने का दायित्व उठाते हुए कानून पालना के अपने कर्तव्य की पालना करनी ही चाहिए।
देश के न्यायालयों में लंबित मुकदमों के गणित को लोकसभा में पिछले दिनों लिखित उत्तर में प्रस्तुत आंकड़ों से समझा जा सकता है। राष्ट्र्र्ीय न्यायिक डाटा ग्रीड के आंकडों के अनुसार 3 करोड़ 14 लाख न्यायिक प्रकरण देश की निचली एवं जिला अदालतों में ही लंबित चल रहे हैं। एक जानकारी के अनुसार देश की सर्वोच्च अदालत में ही 59 हजार 867 मामलें लंबित चल रहे हैं। आंकड़ों की माने तो देश की अदालतों में करीब एक हजार मामलें 50 साल से लंबित चल रहे है तो करीब दो लाख मामलें 25 साल से लंबित हैं। 44 लाख 76 हजार से अधिक मामलें देश के 24 हाईकोर्टों में लंबित चल रहे हैं। करीब करीब पोने तीन करोड़ मामलें देश की निचली अदालतों में विचाराधीन है। देश में वर्तमान व पूर्व मुख्य न्यायाधीश द्वारा ना केवल इसके लिए चिंता व्यक्त की जाती रही हैं अपितु पुराने मामलों के निपटारें के लिए कार्ययोजना भी बनी है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने पुराने मामलों के लंबित होने की गंभीरता को समझा और सर्वोच्च न्यायालय में प्रतिदिन 10 पुराने मामलों को सुनवाई के लिए विशेष बैंच के सामने रखने के निर्देश निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश ने दिए थे।
कुल लंबित तीन करोड़ से अधिक मामलों में से 14 प्रतिशत के करीब मामलें गत दस सालों से लंबित चल रहे हैं। जारी रिपोर्ट के अनुसार 10 साल से अधिक बकाया मामलों में सर्वाधिक 9 लाख 43 हजार से अधिक मामलें अकेले उत्तर प्रदेश में बकाया है तो बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र्, गुजरात, ओडिसा आदि ऐसे प्रदेश है जहां दस साल से अधिक पुराने मामलें लाखों की संख्या में हैं। हांलाकि सर्वोच्च न्यायालय की विभिन्न बैंचों में अब 34 न्यायाधीपतियों द्वारा मुकदमों का निस्तारण किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय देश में लंबित मुकदमों के प्रति काफी गंभीर है। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को पुराने मामलों को प्राथमिकता से निस्तारित करने के निर्देश दिए हैं तो पांच साल से पुराने मामलों की सूची तैयार कर इन्हें शीघ्र निस्तारित करने को कहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने तो यहां तक सुझाव दिया है कि मुकदमों के अंबार को कम करने के लिए बहुत ही इमरजेंसी को छोड़कर न्यायालय को कार्य दिवस को छुट्टी ना ले।
मुख्य न्यायाधीश शरद अरविन्द बोबडे ने संस्थागत मध्यस्थता की जो आवश्यकता महसूस की है उसको इस मायने में भी समझा जा सकता है कि हमारी सनातन परंपरा और ग्रामीण व्यवस्था में पंच परमेश्वरांे की जो भूमिका थी आज उस भूमिका को पुनस्र्थापित किए जाने की आवश्यकता है। इसी तरह से मोटर व्हीकल एक्ट की पालना नहीं करने, यातायात नियमों की अवहेलना, मामूली कहासुनी, मामूली बातों के आपसी विवाद आदि इस तरह के प्रकरणों को चिन्हित कर लिया जाए और यह तय कर लिया जाए कि भले ही सख्ती कहा जाए पर फास्ट ट्र्ेक की तरह इन प्रकरणों की सुनवाई कर तत्काल निर्णय कर लिए जाये और अनावश्यक अपील की व्यवस्था ना हो तो पूरे देश में लाखोें की संख्या में इस तरह के मुकदमों का अंबार कम किया जा सकता है। इसी तरह से राजस्व मामलें जो सर्वाधिक संख्या में आने लगे हैं उनकी भी पंच परमेश्वरों या अन्य दूसरी तरह का मैकेनिज्म बनाकर निस्तारण की ठोस रणनीति बन जाए तो मुकदमों का कुछ हद तक अंबार कम किया जा सकता है। कुल मिलाकर जिस तरह से सर्वोच्च न्यायालय और हमारे न्यायाधीपतिगण और सरकार गंभीर होने लगी है उससे एक सोच विकसित होने लगा है और यह मानकर चला जाना चाहिए कि मुकदमों के अंबार में कमी आने के साथ ही जल्द न्याय की उम्मीद भी जगेगी।

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