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कब खत्म होगा शाहीन बाग का धरना-प्रदर्शन

डाॅ. श्रीनाथ सहाय
शाहीन बाग का धरना-प्रदर्शन आखिरकार कब खत्म होगा ये बड़ा सवाल है। प्रदर्शनकारी जिस तरह से सार्वजनिक रास्ता रोककर डेढ महीने से ज्यादा वक्त से बैठे हैं वो चिंता बढ़ाने वाला है। खास बात यह है कि सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच इस अवधि में कोई वार्तालाप नहीं हुआ है। ऐसे में ये सवाल स्वाभाविक तौर पर उभरता है कि ये धरना-प्रदर्शन कब तक चलता रहेगा। क्या दिल्ली की जनता धरना-प्रदर्शन की वजह से यूं ही परेशान होती रहेगी?
नागरिकता कानून के विरोध में शाहीन बाग में मुस्लिम महिलाएं बीच सड़क पर बाल-बच्चों सहित धरना दिये बैठी हैं। उसके कारण यातायात अवरुद्ध है। हजारों लोगों को रोज लम्बा चक्कर लगाकर अपने गन्तव्य तक पहुंचना पड़ रहा है। इस धरने का कारण सीएए का विरोध है। कुछ दिन पूर्व धरने पर बैठी महिला का चार महीने का शिशु सर्दी की वजह से जान गंवा बैठा। महिला अपने बच्चे के अंतिम संस्कार के बाद दोबारा धरने पर आ बैठी। आन्दोलन के समर्थकों ने उस महिला के जज्बे की तारीफ की तो विरोधियों ने उसे निर्मोही बताते हुए आलोचना कर डाली। इस घटना से व्यथित एक बालिका ने सर्वोच्च न्यायालय को पत्र भेजकर ये सवाल उठाया कि क्या एक नौनिहाल को भीषण सर्दी में इस तरह आन्दोलन में ले जाना उचित था? इस सवाल का न्यायालय ने भी संज्ञान लिया और गत दिवस चार महीने के बच्चे को आन्दोलन का हिस्सा बनाये जाने पर तीखे सवाल दागे। शाहीन बाग में सड़क रोककर बैठे रहने पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने पूछा कि आखिर कितने दिनों तक आप लोगों को परेशान कर सकते हैं? धरना देने के लिए आम सड़क और सार्वजनिक पार्क आदि के उपयोग पर भी अदालत ने ऐतराज जताया और पहले से पेश की गई एक याचिका पर दिल्ली और केंद्र दोनों सरकारों को नोटिस जारी करते हुए 17 फरवरी को सुनवाई रखी गई।
शाहीन बाग का धरना दिल्ली विधानसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बना रहा। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने जहां मुस्लिम मतों के लालच में धरने का समर्थन किया वहीं भाजपा ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए हिन्दू मतों को अपने पाले में खींचने की रणनीति पर काम किया। ये सवाल भी बार-बार उठा कि हजारों लोगों की परेशानी के सबब बने इस धरने को हटाने के लिए दिल्ली की पुलिस और प्रशासन ने कोई कदम क्यों नहीं उठाया? उल्लेखनीय है पुलिस केंद्र सरकार के अधीन होने से दिल्ली की सरकार ने इस मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया। ये आरोप भी लगा कि भाजपा जानबूझकर शाहीन बाग के धरने को खत्म नहीं करवा रही जिससे हिन्दू मतदाता गोलबंद हो सकें। लेकिन राजनीति से अलग हटकर देखें तो क्या इस मामले में न्यायपालिका भी अपनी भूमिका के प्रति उदासीन नहीं रही?
वो अलग बात है कि शाहीन बाग के धरने-प्रदर्शन का दिल्ली विधानसभाा चुनाव से कोई संबंध नहीं है। लेकिन अब चुनाव संपन्न हो चुके हैं। राजनीतिक दल क्या राजनीति से ऊपर उठकर आम दिल्लीवासी की परेशानी को समझेंगे। क्या अब शाहीन बाग का धरना-प्रदर्शन समाप्त होगा? क्या एक कानून के खिलाफ संघर्ष करने का आक्रोश शांत होगा? हालांकि इन सवालों का दिल्ली के जनादेश से कोई सीधा संबंध नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि शाहीन बाग और जामिया के इलाकों वाली ओखला विधानसभा सीट से ‘आप उम्मीदवार अमानतुल्लाह खान 77,000 से अधिक वोट हासिल कर जीते हैं। मत-प्रतिशत करीब 90 फीसदी है। इस तरह मुस्लिम समुदाय और ‘आप का एक नैतिक और भावनात्मक जुड़ाव सामने आया है। दिल्ली में मुस्लिम आबादी करीब 12 फीसदी है और 10 विधानसभा सीटों पर निर्णायक साबित होती रही है। ऐसी सभी सीटें केजरीवाल की ‘आप के पक्ष में गई हैं। यही नहीं, सभी 12 आरक्षित सीटें भी ‘आप को मिली हैं। झुग्गी बस्तियों से प्रभावित 18 में से 17 सीटें भी ‘आप ने जीती हैं।
दिल्ली देश की राजधानी है जहां न्यायपालिका की सर्वोच्च पीठ भी विराजमान है। शाहीन बाग का धरना एक राष्ट्रीय खबर बना रहा। समाचार माध्यमों में इसे लेकर खूब बहस और चर्चा भी हुई। ऐसे में ये आश्चर्य की बात है कि छोटी-छोटी बातों का संज्ञान लेकर शासन और प्रशासन को हड़का देने वाले सर्वोच्च न्यायालय ने भी शाहीन बाग मामले में पेश के गई याचिका पर इतनी सुस्ती दिखाई? जो न्यायपालिका किसी आतंकवादी की फांसी रोकने के लिए देर रात बैठकर सुनवाई कर सकती है उसने देश की राजधानी में चल रहे एक ऐसे आन्दोलन को रोकने के लिए अपनी जागरूकता और प्रभाव का उपयोग क्यों नहीं किया जिसकी वजह से दिल्ली के हजारों लोगों को डेढ़ माह से जबर्दस्त परेशानी हो रही है। ये सवाल भी उठ सकता है कि दिल्ली का प्रशासन चला रही केजरीवाल सरकार और पुलिस का नियंत्रण करने वाली केंद्र सरकार ने भी शाहीन बाग में सड़क रोककर बैठी मुस्लिम महिलाओं को हटाने के लिए क्या किया? इसका जवाब ये है कि एक तो दिल्ली में चुनाव हो रहे थे और दूसरा धरने पर महिलाएं बैठी थीं जिन पर बल प्रयोग करना राजनीतिक दृष्टि से नुकसानदेह साबित होता। उससे भी बड़ी बात ये थी कि धरना स्थल पर बैठीं महिलाएं मुस्लिम थीं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय तो राजनीतिक हानि लाभ से उपर है। यदि वह शाहीन बाग के धरने का संज्ञान लेते हुए जनता को हो रही परेशानी के मद्देनजर दिल्ली और केंद्र दोनों सरकारों को निर्देशित करता तब आन्दोलनकारियों पर भी दबाव पड़ता।
शाहीन बाग का धरना केवल एक खबर नहीं अपितु एक नजीर बन गया। उसकी देखासीखी सीएए के विरोध में देश के अनेक शहरों में मुस्लिम महिलाओं द्वारा बीच सड़क या अन्य किसी सार्वजनिक स्थल पर धरना शुरू कर दिया गया। जहां-जहां पुलिस और प्रशासन ने रोकने की कोशिश वहां-वहां आन्दोलन के नाम पर हिंसा की गयी। जैसा शुरू में कहा गया चूंकि मामला महिलाओं और वह भी मुस्लिमों का था इसलिए सरकार में बैठे राजनेता तो बचते रहे लेकिन न्यायपालिका को तो खुलकर ऐसे प्रकरणों में अपना मत रखना चाहिए। इस बारे में ये सवाल भी स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या लुटियंस की दिल्ली कहे जाने वाले वीआईपी इलाकों में और सर्वोच्च न्यायालय के करीब शाहीन बाग जैसा नजारा होता तब क्या उसे इतने लम्बे समय तक बर्दाश्त किया जाता?
हालांकि शाहीन बाग के प्रकरण पर सर्वोच्च अदालत ने कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया है, लेकिन इतना जरूर कहा है कि किसी सार्वजनिक स्थान पर अनंतकाल तक विरोध-प्रदर्शन नहीं किया जा सकता। धरना-प्रदर्शन किसी निर्धारित और अधिकृत जगह पर ही करें। कोई भी आंदोलन आम आदमी और जनता का रास्ता ब्लॉक नहीं कर सकता। बेशक प्रदर्शन करना आपका अधिकार है। विरोध करें, लेकिन सार्वजनिक जगह का इस्तेमाल न करें। ऐसी टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार तथा दिल्ली पुलिस को नोटिस भेजकर सात दिन का समय दिया है। संभवतरू 17 फरवरी को न्यायिक पीठ जानना चाहेगी कि शाहीन बाग से धरना-प्रदर्शन कैसे समाप्त किया जा सकता है? शीर्ष अदालत लोगों को जबरन उठाने के पक्ष में नहीं हो सकती, क्योंकि इंसाफ उन्हें भी चाहिए और अदालत मानवाधिकारों की पहली संरक्षक है।
नागरिकता कानून की समीक्षा सर्वोच्च अदालत अलग से कर रही है, लिहाजा जिज्ञासापूर्ण सवाल है कि क्या मुख्यमंत्री केजरीवाल शाहीन बाग वालों से कोई अपील कर सकते हैं? या नए चुने गए विधायक अमानतुल्लाह खान कोई भूमिका निभा सकते हैं? बुनियादी सवाल तो यह है कि विरोध की जिद और हद को क्या शाहीन बाग वाले समझेंगे और उसकी टूट की पहल करेंगे? बहरहाल 17 फरवरी की प्रतीक्षा रहेगी, लेकिन जनादेश को परोक्ष समर्थन देते हुए शाहीन बाग की औरतों ने मुंह पर काली पट्टी बांध कर ‘मूक विरोध्य जताया। मीडिया से संवाद तक नहीं किया। लाउड स्पीकर खामोश रखा गया, लिहाजा कोई भाषण या नारेबाजी भी सुनाई नहीं दी। शाहीन बाग की ऐसी प्रतिक्रिया देखते हुए उन्हें आंदोलन वापस लेने का आग्रह किया जा सकता है। जितनी जल्दी हो ये गतिरोध टूटना चाहिए।

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